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भक्ति रस काव्य व भजन

मैं हो गई वावरी श्यामा जी तेरे प्यार में भजन इन हिंदी

48 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

मैं हो गई वावरी श्यामा जी तेरे प्यार में,


 मैं हो गई वावरी श्यामा जी तेरे प्यार में,


सारा ज़माना झूठा लगदा तू ही है सच्चा

तेरे वाजो दिल देया श्यामा दुःख किह्नु दसा

|| मैं हो गई वनवारी श्यामा जी तेरे प्यार में ||


तेरे हथ है डोर मेरी श्यामा तू है रखवाला

सुबह शाम मैं फेरा श्यामा नाम तेरे दी माला

|| मैं हो गई वनवारी श्यामा जी तेरे प्यार में ||


जो कहंदे ने कहन दे लोकी दुनिया तो की लेना

तेरी आ मैं तेरी श्यामा तेरी होके रहना

|| मैं हो गई वनवारी श्यामा जी तेरे प्यार में ||



🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह भजन कृष्ण के प्रति संपूर्ण समर्पण और विश्वास की अभिव्यक्ति है। गायिका कहती है कि वह श्यामा के प्रेम में 'वावरी' (पागल) हो गई है और संसार को झूठा मानती है क्योंकि केवल कृष्ण ही सत्य हैं। 'तेरे वाजो दिल देया' कहकर वह अपने हृदय को पूर्णतः समर्पित करती है। यह भजन दिखाता है कि कैसे एक भक्त दुनिया के भ्रम से मुक्त होकर केवल ईश्वर के प्रेम में लीन हो जाता है और सांसारिक सुख-दुख को तुच्छ मानता है।

भजन का भावार्थ गहरी विरह और समर्पण की भावना को दर्शाता है। गायिका अपने आत्मसमर्पण को 'तेरे हथ है डोर मेरी' कहकर व्यक्त करती है, अर्थात् वह पूरी तरह कृष्ण के नियंत्रण में है। 'सुबह शाम मैं फेरा श्यामा नाम तेरे दी माला' के माध्यम से वह निरंतर नाम-स्मरण का प्रतिपादन करती है। यह भाव दर्शाता है कि सच्ची भक्ति में संसार की चिंता नहीं रहती और केवल प्रभु का चिंतन ही जीवन का लक्ष्य बन जाता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यह भजन भक्तिकाल की परंपरा में निहित है, जहाँ कृष्ण-प्रेम को सर्वोच्च साध्य माना जाता है। भागवत पुराण में वर्णित गोपियों का कृष्ण प्रेम इसी भावना का प्रतीक है। उपनिषदों में भी 'रस वै सः' (परमात्मा ही रस है) कहा गया है। कृष्ण की मधुर लीलाएं और उनका विरहमिश्रित प्रेम संसार के सभी भौतिक सुखों से परे एक दिव्य अनुभूति प्रदान करता है जो आत्मा को मुक्ति की ओर ले जाती है।

श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य उपदेशों को जानने के लिए भगवद्गीता खंड अवश्य पढ़ें और भगवान कृष्ण की लीलाओं के गहन अध्ययन के लिए ब्रह्म पुराण का पाठ करें। इस भजन का नियमित गायन और मनन करने से भक्त का मन श्यामा की स्मृति में केंद्रित रहता है, जिससे मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह सांसारिक मोह से मुक्ति और आंतरिक सुख की अनुभूति कराता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का गायन सूर्योदय के समय या संध्या काल में सर्वोत्तम है। पूजा स्थान को पवित्र करके घंटी बजाएं और कृष्ण की मूर्ति या चित्र के सामने दीप जलाएं। आसन पर बैठकर मन को केंद्रित करें और भजन को धीमी गति से गाएं। मणि-माला धारण करके नाम-जप करें। भजन के दौरान कृष्ण की लीला का ध्यान करें और भक्ति की भावना में पूर्णतः विलीन हो जाएं।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

'वावरी' शब्द से भजन में क्या तात्पर्य है?

'वावरी' का अर्थ पागल या बेसुध है। भजन में गायिका कहती है कि वह कृष्ण के प्रेम में इतनी आसक्त हो गई है कि संसार की सारी बातें उसे भूल गईं। यह पूर्ण समर्पण और आत्मविस्मृति की भावना को प्रकट करता है जो सच्ची भक्ति का लक्षण है।

भजन में 'तेरे हथ है डोर मेरी' का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

यह पंक्ति यह दर्शाती है कि भक्त पूरी तरह प्रभु के हाथों में अपने आपको समर्पित कर देता है। वह अपनी स्वतंत्र इच्छा को त्यागकर केवल कृष्ण की इच्छा का पालन करता है। यह समर्पण ही परम मुक्ति का मार्ग है और भक्ति का सार है।

इस भजन में 'सुबह शाम मैं फेरा श्यामा नाम तेरे दी माला' से क्या संदेश मिलता है?

यह पंक्ति निरंतर नाम-स्मरण और जप साधना का महत्व बताती है। भक्त दिन के प्रत्येक समय में कृष्ण का नाम लेता है, जिससे मन सदैव प्रभु में केंद्रित रहता है। माला फेरना ध्यान और भक्ति की प्रक्रिया है जो आत्मा को शुद्ध और परमात्मा के निकट ले जाती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 13 Aug 2026

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