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गुरा नू याद करेया कर | Gura Nu Yaad Kariya Kr | New Guruji Bhajan | Paridhi Pari | Jai Guru Ji - BhaktiLok

66 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

गुरा नू याद करेया कर, गुरा नू याद करेया कर गुरा नू याद करेया कर, मेरा प्राण बसेया कर गुरु बिना ज्ञान न मिले, गुरु बिना ज्ञान न मिले गुरु बिना ज्ञान न मिले, भटकते रहो संसार में गुरु की शरण में आ जाओ, गुरु की शरण में आ जाओ गुरु की शरण में आ जाओ, पार हो जाओ भव सागर में गुरु के चरण सरण गहूँ, गुरु के चरण सरण गहूँ गुरु के चरण सरण गहूँ, सुख शांति मिले मन को जय गुरु जय गुरु जय गुरु, जय गुरु जय गुरु जय गुरु जय गुरु जय गुरु जय गुरु, गुरु ही ईश्वर है

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह भजन 'गुरा नू याद करेया कर' गुरु की महिमा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का गहन संदेश प्रस्तुत करता है। भजन की मूल पंक्ति 'गुरा नू याद करेया कर' का अर्थ है गुरु को हृदय में स्मरण करना और उनके चिंतन में तल्लीन रहना। यह भजन भक्तों को यह बोध कराता है कि गुरु ही जीवन के सच्चे मार्गदर्शक हैं और उनके प्रति स्मरण व भक्ति ही मोक्ष का द्वार खोलती है। 'गुरु बिना ज्ञान न मिले' पंक्ति स्पष्ट करती है कि सांसारिक शिक्षा से परे आत्मज्ञान और परमज्ञान केवल गुरु के माध्यम से ही संभव है। भजन का संदेश यह है कि जो व्यक्ति गुरु की शरण नहीं लेता वह संसार के चक्र में भटकता रहता है और उसे कभी आध्यात्मिक शांति नहीं मिलती।

इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहरा और हृदयस्पर्शी है। 'गुरा नू याद करेया कर, मेरा प्राण बसेया कर' में भक्त की आर्त पुकार है कि गुरु उसके प्राणों में बस जाएँ, उसके हर विचार और कर्म में गुरु की उपस्थिति रहे। 'गुरु की शरण में आ जाओ, पार हो जाओ भव सागर में' से भक्त को यह बोध मिलता है कि जन्म-मरण के भवसागर से पार होने का एकमात्र उपाय गुरु की शरणागति है। 'गुरु के चरण सरण गहूँ, सुख शांति मिले मन को' में भक्त गुरु के चरणों में पूर्ण समर्पण की चाह प्रकट करता है और इस विश्वास के साथ कि गुरु-भक्ति से मन को सच्ची शांति और आनंद की प्राप्ति होगी।

भक्ति मार्ग के संदर्भ में यह भजन 'गुरु-भक्ति' की परिभाषा को स्पष्ट करता है। हिंदू दर्शन में गुरु को ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। यह भजन गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता को रेखांकित करता है जो भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। 'जय गुरु जय गुरु जय गुरु, गुरु ही ईश्वर है' - यह अंतिम पंक्ति अद्वैत दर्शन की घोषणा करती है जहाँ गुरु को साक्षात् परमात्मा का रूप माना जाता है। भक्ति मार्ग में गुरु ही साधक को तत्त्वज्ञान प्रदान करते हैं, उनकी आध्यात्मिक यात्रा को निर्देशित करते हैं और मुक्ति का पथ प्रशस्त करते हैं। इसलिए गुरु स्मरण और गुरु-भक्ति ही साधना का सर्वोच्च रूप है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

गुरु-भक्ति हिंदू धर्म की परंपरा में सर्वोच्च स्थान रखती है। कठोपनिषद् में गुरु को ब्रह्म-ज्ञान का प्रदाता बताया गया है और कहा गया है कि 'तमेव विदित्वा अभिमन्यते' - गुरु के ज्ञान से ही आत्मज्ञान संभव है। रामायण में राम-गुरु सम्बंध के माध्यम से वशिष्ठ की महत्ता प्रदर्शित की गई है। महाभारत में द्रोणाचार्य और कृष्ण की भूमिका गुरु-शिष्य परंपरा को प्रतिष्ठित करती है। शांकर भाष्य में आदि शंकराचार्य ने गुरु को साक्षात् ब्रह्म कहा है। यह भजन उसी परंपरा को आधुनिक युग में जीवंत करता है और भक्तों को गुरु-स्मरण के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। गुरु-भक्ति भजन का नियमित चिंतन-मनन मन को शांत, स्थिर और केंद्रित करता है। इसके गायन से मानसिक चिंताएँ दूर होती हैं और मन में दिव्य शांति का अनुभव होता है। आध्यात्मिक दृष्टि से इस भजन का जाप साधक के अहंकार को नष्ट करता है और गुरु के प्रति निष्ठा व समर्पण को गहरा करता है। शारीरिक स्तर पर इसका गायन श्वास नियंत्रण में सहायक है। मानसिक स्तर पर यह अवसाद, चिंता और भय को दूर करता है तथा आत्मविश्वास बढ़ाता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4-6 बजे) है। पूर्व की ओर मुँह करके कमल आसन या सुखासन में बैठें। गुरु या इष्ट देव का ध्यान करते हुए इस भजन का गायन करें। यदि संभव हो तो दीप प्रज्ज्वलित करें और फूल, फल, जल अर्पित करें। माला से 108 बार या कम से कम 11 बार इस भजन का जाप करें। मन में पूर्ण श्रद्धा और समर्पण का भाव रखते हुए गायन करें। शाम को भी इसका गायन लाभकारी है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन में 'गुरा नू याद करेया कर' का वास्तविक अर्थ क्या है?

'गुरा नू याद करेया कर' का अर्थ है गुरु को निरंतर अपने हृदय में स्मरण करना, उनके ज्ञान और शिक्षाओं पर ध्यान केंद्रित रखना और उनके प्रति पूर्ण भक्ति व समर्पण का भाव रखना। यह मन और बुद्धि को गुरु के चरणों में पूर्णतः लगाने की प्रक्रिया है।

गुरु-भक्ति से क्या आध्यात्मिक लाभ मिलते हैं?

गुरु-भक्ति से साधक का अहंकार नष्ट होता है, मन शांत और केंद्रित होता है। गुरु के ज्ञान से आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है, जीवन में सत्य का बोध होता है, और अंततः मोक्ष की ओर पथ प्रशस्त होता है। आंतरिक शांति और आनंद स्वरूप निर्वाण की ओर यात्रा शुरू होती है।

क्या इस भजन को किसी विशेष गुरु के लिए ही गाना चाहिए या किसी भी गुरु के लिए?

यह भजन सार्वभौमिक है और किसी भी गुरु-परंपरा, धर्म या मत के लिए गाया जा सकता है। चाहे आपके गुरु कोई भी हों - दिव्य गुरु, आध्यात्मिक गुरु या कोई महान संत - इस भजन से गुरु-भक्ति का सार्वभौमिक संदेश व्यक्त होता है। मुख्य बात गुरु के प्रति निष्ठा और भक्ति है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 25 Aug 2026

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