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Shri Shani Dev Arati

श्री शंकराची आरती(Shri Shankarachi Aarati)- Bhaktilok

66 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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श्री शंकराचार्य का दिव्य स्तुति पाठ

भगवान शिव की महिमा का गान करते हुए यह आरती संपूर्ण श्रद्धा के साथ गाने का अवसर देती है।

श्री शंकराची आरती(Shri Shankarachi Aarati)- Bhaktilok लवथवती विकारला ब्रह्माण्डी मालाविशेष कंठ काला त्रिनेत्री ज्वालालावण्यसुंदर मस्तकी भालातेथुनिया जल निर्मल वही झूलाझुलाजय देव जय देवीजय देव जय देवीजय श्री शंकर:हो स्वामी शंकर:आरती ओवालु तुज करपुरगौरजय देव जय देवीकरपुरगौरा भोला नयनी विशालअर्धांगी पार्वती सुमनंच्य मलविभूतिचे उधलाना शितिकांत नीलाऐसा शंकर शोभे उमावेलहलाजय देव जय देवीजय देव जय देव जय श्री शंकरहो स्वामी शंकर:आरती ओवालु तुझ करपुरगौरजय देव जय देवीदेवी दैत्य सागरमंथन पाई केलेत्यामाजी अवचिता हलाहल उथलेते तवा असुरपने प्रशन केलेनीलकंठ नाम प्रसिद्ध झलेजय देव जय देवीजय देव जय देव जय श्री शंकरहो स्वामी शंकर:आरती ओवालु तुझ करपुरगौरजय देव जय देवीव्याघरंबर फणीवरधर सुंदर मदनारीपंचानन मनमोहन मुनिजन सुखकरीशतकोटिचे बीज वाचे उच्चचारीरघुकुलतिलक रामदास अंतरीजय देव जय देवीजय देव जय देव जय श्री शंकरहो स्वामी शंकर:आरती ओवालु तुझ करपुरगौरजय देव जय देवी

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस आरती में भगवान शिव की अनंत महिमा और गुणों का गुणगान किया गया है। पहले पद में, 'लवथवती विकारला' की पंक्ति भगवान शिव के त्रिनेत्री स्वरूप का वर्णन करती है, जिन्हें जग से परे, सब प्रकार के विकारों से मुक्त माना जाता है। धारण किए गए कंठ काला, ज्वाला और लावण्य दर्शाता है कि शिव सृष्टि के रक्षक और भक्षक दोनों हैं। शिव का स्वरूप आसानी से मनमोहक और डरावना दोनों हो सकता है, जो भौतिक जगत की वास्तविकता को दर्शाता है। आगे, आरती में पार्वती जी का उल्लेख होता है, जो शिव की आधांगिनी हैं, यह दर्शाने के लिए कि शिव और शक्ति का संबंध बड़ी गहराई से होता है। यहाँ, 'अर्धांगी पार्वती' का संबंध एकात्मता का भाव प्रकट करता है, जैसे शिव और शक्ति अविभाज्य हैं।

इस आरती में भावार्थ को समझना भी महत्वपूर्ण है। यह कविता भक्ति और सच्चे प्रेम का प्रतीक है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर की उपासना करता है। 'जय देव जय देवी' की भावनाएँ केवल साधारण स्तुति नहीं हैं, बल्कि पूजनीयता की गहराई को व्यक्त करती हैं। भक्त भगवान शिव को हर परिस्थिति में अपनी रक्षा के लिए पुकारता है। 'हलाहल उथलेते तवा' का संदर्भ, समुद्र मंथन के समय भगवान शिव द्वारा विष पीने की कथा को दर्शाता है। यह बताता है कि शिव जगत के कल्याण के लिए किसी भी कठिनाई को सहने के लिए तैयार रहते हैं। इस प्रकार, आरती में भक्ति और बलिदान का अद्वितीय मेल देखने को मिलता है।

आरती में दार्शनिकता और भक्ति मार्ग का गहरा तत्व है। शिव को 'भोला' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वह भक्तों की निस्वार्थ भक्ति को स्वीकार करते हैं। यह उनके सर्व-समर्थ होने का प्रतिक है। भक्ति मार्ग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जीवात्मा और परमात्मा के बीच के बंधन को मजबूत करती है। 'पंचानन मनमोहन' और 'रघुकुलतिलक' जैसे पदों से यह स्पष्ट होता है कि शिव को समस्त सृष्टि में अनंत शक्तियों का स्रोत मानना चाहिए। भगवान शिव का ध्यान, साधना के हर भाग में, ध्यान और शांति के लिए आवश्यक होता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्री शंकराची आरती का महत्व अनेक पुराणों में मिलता है, जैसे शिव पुराण, भागवत पुराण तथा महाभारत में। शिव की आराधना करना एवं उनकी उपासना में यह आरती भक्तों के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। शिव जी की कथा, समुद्र मंथन पर आधारित होती है, जिसमें उनके आत्म-त्याग और बलिदान का वर्णन है। रामायण में जब भगवान राम अयोध्या लौटते हैं, तो शिव की आरती का गीत गाया जाता है। इससे भक्तों को मानसिक शांति और संतोष की प्राप्ति होती है।

भगवान शिव की महिमा, लिंगोत्पत्ति और पवित्र तीर्थों के विवरण के लिए शिव पुराण का संपूर्ण अध्ययन करें। श्री शंकराची आरती का पाठ करने से मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति होती है। इसे नियमित रूप से गाने से मन में संयम और धैर्य का विकास होता है। इस आरती का उच्चारण नेगेटिव ऊर्जा को समाप्त करके भक्त को आशा और विश्वास की ओर ले जाता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

श्री शंकराची आरती का जाप सुबह या शाम को करना अत्यधिक प्रभावी होता है। इस अवसर पर, एक दीपक जलाना और भगवान शिव की तस्वीर के सामने फूल या फल चढ़ाना उचित होता है। शांत मन और अच्छे विचारों के साथ बैठकर आरती का पाठ करना चाहिए, जिससे मन को शांति और समर्पण का अनुभव हो।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

श्री शंकराची आरती का महत्व क्या है?

इस आरती का महत्व भगवान शिव की भक्ति और उनकी शक्तियों का गुणगान करना है। यह भक्तों को मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है।

क्या श्री शंकराची आरती को किसी खास समय पर करना चाहिए?

हाँ, सुबह या शाम के समय आरती का पाठ करना अधिक लाभदायक होता है। इस समय वातावरण भी शांति से भरा होता है।

इस आरती का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?

इस आरती का पाठ करने से मानसिक तनाव में कमी और सकारात्मकता का अनुभव होता है। यह भक्तों को महत्वपूर्ण जीवन मामलों में सद्गुण प्राप्त करने में मदद करती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 23 Aug 2026

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