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Chhath Puja Geet

बांझिनिया पुकारे हे छठी मईया (Banjhiniya Pukare He Chhathi Maiya) - Ritika Pandey Chhath Puja Geet - BhaktiLok

66 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

बांझिनिया पुकारे हे छठी मईया बांझिनिया पुकारे हे छठी मईया माई तू करुणा की सागर माई तू करुणा की सागर तेरे चरणों में शरण पाऊं तेरे चरणों में शरण पाऊं बांझिनिया की पीड़ा सुनो माई बांझिनिया की पीड़ा सुनो माई संतान का वरदान दे दे संतान का वरदान दे दे हे छठी माता भुलक्कड़ी हे छठी माता भुलक्कड़ी व्रत रखती हूं दिन रात व्रत रखती हूं दिन रात तेरी भक्ति में मन लगाई तेरी भक्ति में मन लगाई बांझिनिया की इच तुम पूरो बांझिनिया की इच तुम पूरो हे छठी माई हे छठी माई हे छठी माई हे छठी माई

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह भजन छठी माता को समर्पित एक अत्यंत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी रचना है, जिसमें एक बांझ स्त्री अपनी व्यथा और आशा को व्यक्त करती है। 'बांझिनिया पुकारे हे छठी मईया' की पंक्ति में संतान की कामना से व्यथित एक माता छठी देवी से विनती करती है। छठी माता को 'करुणा की सागर' कहकर गायिका उन्हें सर्वोच्च शक्ति और दयालुता का प्रतीक माना है। भजन में 'तेरे चरणों में शरण पाऊं' का उल्लेख उस परम विश्वास को दर्शाता है कि देवी ही संतान और सुख की वरदान देने में समर्थ हैं। 'व्रत रखती हूं दिन रात' और 'तेरी भक्ति में मन लगाई' जैसी पंक्तियां समर्पण और निष्ठा का प्रमाण हैं। गायिका छठी माता की कृपा से 'इच पूरो' होने की आशा करती है, अर्थात् संतान का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहती है।

इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहन और मानवीय संवेदनशीलता से परिपूर्ण है। एक बांझ स्त्री का दर्द, जो समाज में अपने अस्तित्व को सिद्ध नहीं कर पाती, यह भजन उसी पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति है। 'बांझिनिया की पीड़ा सुनो माई' पंक्ति में भक्त देवी से आह्वान करता है कि वह उसकी आंतरिक पीड़ा को समझें और स्वीकार करें। छठी माता को 'भुलक्कड़ी' कहना एक प्रेमपूर्ण खिन्नता है, जैसे कि वह कह रही है कि देवी अन्य भक्तों की पुकार तो सुनती हैं, किंतु उसे भूल गईं। यह भजन विश्वास और संदेह के बीच का द्वंद्व दर्शाता है। भक्त पूरी श्रद्धा से व्रत रखता है, पर साथ ही यह भी कहना चाहता है कि देवी का दिव्य हस्तक्षेप कब होगा। यह भावात्मक संघर्ष और अपेक्षा की भाषा है जो लाखों भक्तों के हृदय में गूंजती है।

छठी माता की भक्ति परंपरा भारतीय आध्यात्मिकता में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह भजन 'भक्ति मार्ग' का एक शुद्ध उदाहरण है, जहां भक्त पूर्ण समर्पण और विश्वास के साथ अपनी मनोकामना देवी के सामने रखता है। 'करुणा की सागर' विशेषण छठी माता की दिव्य स्वरूप को दर्शाता है जो जीवन, प्रजनन और पोषण की शक्ति हैं। दैवीय शक्ति के रूप में वह पृथ्वी और आकाश दोनों में विद्यमान हैं। यह भजन सकाम भक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, जहां भक्त अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए देवी की आराधना करता है। किंतु इसमें निहित दर्शन यह है कि सच्चा भक्त देवी के चरणों में सर्वस्व समर्पित कर देता है, और यही समर्पण ही उसका मुक्ति का मार्ग बन जाता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

छठी माता की पूजा भारत की सबसे प्राचीन और पवित्र परंपराओं में से एक है, विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वी भारत में। वेद और पुराणों में छठी देवी को प्रजनन शक्ति, बाल रक्षा और जीवन की सृजनकारी शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। मार्कंडेय पुराण और देवी भागवत में छठी माता को पृथ्वी की शक्ति और मातृत्व की देवी के रूप में उल्लेख किया गया है। छठ पूजा, जिसे महापर्व माना जाता है, सूर्य और छठी माता दोनों की पूजा का एक संयुक्त महोत्सव है। प्राचीन काल से ही, जो स्त्रियां संतान के लिए व्याकुल थीं, वे छठी माता की आराधना करती थीं। यह भजन उसी परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्ति है, जो पीढ़ियों के विश्वास और प्रेम को एक सूत्र में बांधता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का नियमित पाठ और गायन मानसिक शांति, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक जागरण प्रदान करता है। भक्ति गीत गायन से अवसाद और चिंता में कमी आती है, और हृदय में प्रेम और करुणा का विकास होता है। माता की पूजा से महिलाओं में आत्म-सम्मान और जीवन में सकारात्मकता आती है। नियमित गायन से शारीरिक स्वास्थ्य में भी सुधार होता है, और ग्रंथियों का सक्रियकरण होता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, यह भजन भक्त को अपने कर्मों को समर्पित करने और दिव्य इच्छा में विश्वास रखने की शिक्षा देता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का आदर्श समय प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (चार से छः बजे तक) है, जब मन शांत और ग्रहणशील होता है। माता के समक्ष एक दीप जलाएं, हल्दी और चावल से आरती करें। गायन से पूर्व पवित्र जल से हाथ-पैर धोएं और स्वच्छ वस्त्र पहनें। पद्मासन या सुखासन में बैठकर, पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ भजन गाएं। माता के सामने एक पवित्र व्रत रखें। ध्यान रहे कि मन की शुद्धता और समर्पण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। संध्या समय भी गायन उत्तम है। नियमितता और एकाग्रता से यह साधना अधिक फलप्रद होती है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

छठी माता कौन हैं और वे संतान से क्यों संबंधित हैं?

छठी माता पृथ्वी की शक्ति और प्रजनन की देवी हैं, जो प्राचीन वेद और पुराणों में वर्णित हैं। वे गर्भ, प्रसव और शिशु के स्वास्थ्य की रक्षिका माना जाती हैं। उनकी पूजा से संतान प्राप्ति और बाल कल्याण का वरदान मिलता है। विशेषकर उत्तर भारत में महिलाएं संतान के लिए छठी माता की आराधना करती हैं।

छठ पूजा के समय इस भजन को गायन का क्या महत्व है?

छठ पूजा एक महान पर्व है जहां सूर्य और छठी माता दोनों की पूजा की जाती है। इस भजन को गायन से भक्त की श्रद्धा गहन होती है और मनोकामनाएं छठी माता तक पहुंचती हैं। प्रत्येक भजन में निहित शक्ति और आवृत्ति से मन और शरीर दोनों में सकारात्मक परिवर्तन होता है। यह पूजा के समय भक्ति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।

एक बांझ महिला को इस भजन से कैसे लाभ मिल सकता है?

यह भजन विशेषकर संतान की कामना करने वाली महिलाओं के लिए रचा गया है। नियमित गायन से मन में आशा, विश्वास और सकारात्मकता आती है, जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को सुधारती है। भक्ति से तनाव कम होता है और हार्मोनल संतुलन में सुधार होता है। माता की कृपा और दिव्य शक्ति पर विश्वास ही सच्चा सहारा है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 31 Aug 2026

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