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Mahadev Bhajan

रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने भजन लिरिक्स ( Racha Hai Srishti Ko Jis Prabhu Ne Lyrics in Hindi ) - Pujya Shri Devendra Ji Maharaj - Bhaktilok

107 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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प्रभु की सृष्टि: भक्ति का गीत

इस भजन के माध्यम से प्रभु की सृष्टि और जीवन के चक्र को समझें, प्रेम से गाएँ और आत्मिक शांति पाएं।

 रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने भजन लिरिक्स ( Racha Hai Srishti Ko Jis Prabhu Ne Lyrics in Hindi ) -रचा है सृष्टि को जिस प्रभु नेरचा है सृष्टि को जिस प्रभु नेवही ये सृष्टि चला रहे हैजो पेड़ हमने लगाया पहलेउसी का फल हम अब पा रहे हैरचा है सृष्टि को जिस प्रभु नेवही ये सृष्टि चला रहे है ॥इसी धरा से शरीर पाएइसी धरा में फिर सब समाएहै सत्य नियम यही धरा काहै सत्य नियम यही धरा काएक आ रहे है एक जा रहे हैरचा है सृष्टि को जिस प्रभु नेवही ये सृष्टि चला रहे है ॥जिन्होने भेजा जगत में जानातय कर दिया लौट के फिर से आनाजो भेजने वाले है यहाँ पेजो भेजने वाले है यहाँ पेवही तो वापस बुला रहे हैरचा है सृष्टि को जिस प्रभु नेवही ये सृष्टि चला रहे है ॥बैठे है जो धान की बालियो मेंसमाए मेहंदी की लालियो मेंहर डाल हर पत्ते में समाकरहर डाल हर पत्ते में समाकरगुल रंग बिरंगे खिला रहे हैरचा है सृष्टि को जिस प्रभु नेवही ये सृष्टि चला रहे है ॥रचा है सृष्टि को जिस प्रभु नेवही ये सृष्टि चला रहे हैजो पेड़ हमने लगाया पहलेउसी का फल हम अब पा रहे हैरचा है सृष्टि को जिस प्रभु नेवही ये सृष्टि चला रहे है ॥Mahadev Shiv Bhajanएक लोटा जल सारी समस्या का हल (Ek Lota Jal Saari Samasya Ka Hal Lyrics in Hindi) - Mahadev Bhajan Nagesh-Kamleshमहाकाल की शादी है गौरी मैया बनी दुल्हनिया (Mahakaal Ki Shadi Hai Gauri Maiya Bani Dulhaniya Lyrics in Hindi) - by Lakshya gupta Shiv Bhajan मोहे लागी रे लगन महाकाल की लगन (Mohe Lagi Re Lagan Mahakaal Ki Lagan Lyrics in Hindi) - by Shubham Sen Shiv Bhajan

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन का मुख्य विषय सृष्टि के सृजन और प्रभु के द्वारा चलाए जाने वाले जीवन चक्र को समर्पित है। 'रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने', इस पंक्ति के माध्यम से भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया गया है। यह दर्शाता है कि सारे ब्रह्मांड का सृजन एक उच्चतर शक्ति (प्रभु) द्वारा किया गया है, जो सभी जीवों का पालन कर रही है। यह उन पेड़ों और फलों की ओर संकेत करता है जो हमने पहले लगाए थे और अब उनके फल भोग रहे हैं। इसलिए सृष्टि और जीवन के निर्बाध चक्र को पहचानना और स्वीकारना ही इस भक्ति का सार है। इस भजन में यह भी दर्शाया गया है कि जो वास्तविकता सत्य और नियम के अनुरूप है, वह ही हमारी धरा है।

भावार्थ के दृष्टिकोण से, यह भजन जीवन के अनिवार्य चक्र को दर्शाता है जहाँ जन्म से लेकर मृत्यु तक सब कुछ एक चक्र में समाहित है। 'ईसी धरा से शरीर पाए' यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि सभी प्राणी इसी धरती पर आते हैं और इसे ही अपना स्थान बनाते हैं। एक आना और एक जाना, यह जीवन का सत्य है। यहाँ, भक्ति की मानसिकता के अंतर्गत, भक्त स्वीकारते हैं कि सब कुछ भगवान की कृपा से है, और सब कुछ उसी में लय हो जाता है। यह प्रति क्षण हमें स्वयं को उनके प्रति समर्पित करने का प्रेरणा देती है।

इस भजन का तात्पर्य भक्ति मार्ग (Bhakti marg) के अनिवार्य सिद्धांतों को समझने में भी है। भक्त का यह कार्य केवल प्रभु के प्रति श्रद्धा और निष्ठा व्यक्त करने का माध्यम है। जब भक्त प्रभु की सृष्टि का ध्यान करते हैं, तब वे भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ते हैं जो आत्मा और परमात्मा के मिलन की ओर ले जाता है। यह भजन केवल एक साधारण स्तोत्र नहीं बल्कि एक गहरी धार्मिक समझ और वास्तविकता के प्रति जागरूकता का प्रतीक है। यही कारण है कि भक्त इसे गाते हैं ताकि वे आत्मिक अनुग्रह प्राप्त कर सकें।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

इस भजन का संदर्भ भारतीय पौराणिक कथाओं और धार्मिक ग्रंथों से गहरा जुड़ा हुआ है। उपनिषदों में ब्रह्म सृष्टि के सिद्धांत का उल्लेख मिलता है, जहाँ यह बताया गया है कि ईश्वर ने सृष्टि की, और इस सृष्टि में सब कुछ उसकी इच्छा का परिणाम है। भगवद गीता में भी इसे विस्तृत रूप से बताया गया है कि हर प्राणी एक समय पर आता है और अंत में लौट जाता है। इस दृष्टि से, यह भजन महाभारत और रामायण के सिद्धांतों से भी संबंधित है, जहाँ जीवन के शाश्वत चक्र का उल्लेख है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का नियमित पाठ मानसिक शांति, आत्मिक बल और जीवन में सकारात्मकता लाता है। यह भक्ति का एक साधन है, जिससे भक्त अपने मन को शुद्ध कर सकते हैं एवं आत्मा का परमात्मा से मिलन कर सकते हैं। इसके द्वारा तनाव और चिंता का तनाव कम होता है और आंतरिक संतुलन बना रहता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का पाठ सुबह-सुबह सूर्योदय से पहले या शाम को पूजा के समय करना उत्तम माना जाता है। पूजा के दौरान, एक दीपक जलाना, पुष्प अर्पित करना, और पवित्रता बनाए रखना आवश्यक है। भजन का पाठ करते समय एकदम शांत मन से बैठना चाहिए, जिससे प्रभु के प्रति भक्ति की भावना प्रखर हो सके।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन का अर्थ और महत्व क्या है?

भजन 'रचा है सृष्टि को जिस प्रभु ने' सृष्टि के सृजन और जीवन के चक्र को समझता है, और प्रभु के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण का भाव व्यक्त करता है।

इस भजन को गाने का सही समय क्या है?

सुबह सूर्योदय से पहले या संध्याकाल में इस भजन का पाठ करना सबसे श्रेष्ठ होता है। यह समय मानसिक शांति और ध्यान के लिए उपयुक्त माना जाता है।

क्या इस भजन का पाठ करने से कोई विशेष लाभ होता है?

इस भजन का नियमित पाठ मानसिक शांति, आत्मिक बल को बढ़ाने और जीवन में सकारात्मकता लाने में सहायक होता है। यह भक्तों के मन को शुद्ध करता है और उन्हें प्रभु का निकटता अनुभव कराता है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 03 Sep 2026

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