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भक्ति रस काव्य व भजन

मोहन हमारे मधुबन में आया न करो (Mohan Hamare Madhuban Me Aaya Na Karo Lyrics in Hindi) - Bhakti lok

81 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मोहन का मधुबन: भक्ति का मधुर संदेश

यह भजन मोहन की मधुर बांसुरी और प्रेम की भक्ति का सुरीला वर्णन करता है।

मोहन हमारे मधुबन में आया न करो (Mohan Hamare Madhuban Me Aaya Na Karo Lyrics in Hindi)मोहन हमारे मधुबन में तुम आया न करोजादूभरी बांसुरी बजाया ना करोसूरत तुम्हारी देखकर सलोनी सांवरीसुनकर तुम्हारी बांसुरी मैं हो गयी बांवलीमाखन चुराने वाले दिल चुराया ना करोजादूभरी बांसुरी बजाया ना करोमाथे मुकुट गल माल कटी में काछनी सोहेकानो में कुण्डल झूम के मन मेरे को मोहेइस चन्द्रमा के रूप से लुभाया न करोजादूभरी बांसुरी बजाया ना करोअपनी यशोदा मात की सौगंध है तुमकोयमुना नदी की तीर पर तुम न मिलो हमकोइस बांसुरी की तान पे बिलखाया ना करोजादूभरी बांसुरी बजाया ना करोऐसी तुम्हारी बांसुरी ने मोहनी डारीचन्द्रसखी की विनती तुम सुनलो बनवारीदर्शन देने में सांवरे अब देर ना करोजादूभरी बांसुरी बजाया ना करोमोहन हमारे मधुबन में तुम आया न करोजादूभरी बांसुरी बजाया ना करो

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन में श्री कृष्ण को 'मोहन' कहा गया है, जो प्रेम, स्नेह और आकर्षण के प्रतीक हैं। 'मोहन हमारे मधुबन में आया न करो' में देवता की उपस्थिति की इच्छा, परंतु उनके प्रेम को पाने की चिंता प्रकट की गई है। यह दर्शाता है कि जब श्री कृष्ण मधुबन में आते हैं, तब उनकी सुंदरता और बांसुरी की तान के कारण भक्तों का मन व्याकुल हो जाता है। प्रेम में मुरली की धुन सुनकर भक्त दिव्य अनुभव करते हैं, जैसे कि यहां 'जादूभरी बांसुरी बजाया ना करो' के माध्यम से कहा गया है। भक्त श्री कृष्ण की मोहक लीला और माखन चुराने की वृत्ति को याद करते हैं, जो उनके अहंकार को चुराकर हर हृदय में प्रेम भर देता है। इस भजन के माध्यम से भक्तों की भीतर की दिव्यता जागृत होती है, जो श्री कृष्ण की करुणा और माया से ओतप्रोत होती है।

भावार्थ में, यह भजन हमारे मन की संवेदनाओं को स्पर्श करता है। यहाँ 'यमुना नदी की तीर पर तुम न मिलो हमको' का भाव यह बताता है कि श्री कृष्ण की अनुपस्थिति भक्तों के लिए असहनीय है। जब वे यशोदा माँ की सौगंध से युक्त होते हैं, तब वे और भी समर्पित और अनुग्रहित लगते हैं। 'बांसुरी की तान पे बिलखाया ना करो' यह उपहासात्मक भाव में भक्त की विनती है कि भगवान अपनी लीलाओं के द्वारा उन्हें विजित न करें, क्योंकि उस मोह में वे अपनी पहचान खो बैठते हैं। इस प्रकार, यह भजन भक्ति में गहराई, प्रेम, और ईश्वर से अपार अनुराग को उजागर करता है।

इस भजन में भक्ति मार्ग के गूढ़ तत्वों की व्याख्या की गई है। भक्त का मोहन के प्रति असाधारण प्रेम दर्शाता है कि ईश्वर से प्रेम एक आत्मा के लिए मोक्ष का मार्ग है। श्री कृष्ण की उपस्थिति उन्हें दिव्य आनंद अनुभूत कराती है। यह भजन उस प्रेम को समर्पित है जो संसार के सारे दर्द और विकृति को मिटा देता है। कृष्ण के प्रति समर्पण की इस भावना ध्यान, साधना, और ध्यान में गहरे समर्पण का संकेत देती है। यह भक्ति मार्ग की सिद्धि की ओर अग्रसर होने का मार्ग बताता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

भजन का संदर्भ पुराणों में गहरे पैठा हुआ है। विशेषकर, भागवत पुराण में श्री कृष्ण की लीलाएँ और उनके प्रति भक्तों का अनुभव इस भजन में व्यक्त किया गया है। यशोदा माँ, माखन चुराने की कथा, और मधुबन की उजाड़, सभी किस्से भक्तों को उनके प्रेम से जोड़ते हैं। श्री कृष्ण का मुरली वादन न केवल पीढ़ियों को एकजुट करता है बल्कि भक्तों के लिए सच्चे प्रेम का प्रतीक है। भजन का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह भक्तों को ईश्वर के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का जाप करने से मानसिक शांति, भक्ति, और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। भक्त इस भक्ति गीत को गाकर अपनी चिंताओं से मुक्ति पा सकते हैं, जिससे मन की स्थिरता आती है। नियमित जाप से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और भक्त को उच्चतम आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर प्रेरित किया जाता है। यह भजन मन में प्रेम और करुणा की भावना का संचार करता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का जाप सुबह-सवेरे या शाम को किया जाए, जब वातावरण शांत होता है। पूजा करते समय एक दीया जलाएं और फूलों का भोग अर्पित करें। उचित आसन बैठकर, शांत मन से भजन का ध्यान करें और श्री कृष्ण की मूर्ति के सामने बैठें। ध्यान में लीन होकर, शब्दों का उच्चारण करें, ताकि मन में भक्ति जगे।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन के किस तत्व का सबसे अधिक महत्व है?

इस भजन में 'मोहन' की प्रेममय छवि का वर्णन है। उनकी उपस्थिति और बांसुरी की धुन का प्रभाव भक्तों के हृदय में अतिप्रभावशाली है।

यह भजन कब गाना चाहिए?

इस भजन का गान सुबह या शाम को करना विशेष फलदायी होता है जब भक्त मन को शान्त करके प्रेम और भक्ति से भरते हैं।

क्या इस भजन का जाप करने से कोई विशेष लाभ होता है?

हाँ, इस भजन के जाप से मानसिक शांति, प्रेम की अनुभूति, और आध्यात्मिक उन्नति होती है। यह भक्तों को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 23 Aug 2026

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