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Krishna Bhajan

हम तेरे प्यार में लूट गए सँवारे भजन लिरिक्स (Hum Tere Pyar Mein Lut Gaye Sanvare Lyrics in Hindi) - New Shyam Bhajan - Bhaktilok

74 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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कृष्ण प्रेम की अनन्य भक्ति: श्याम भजन

यह भजन श्रीकृष्ण की अनंत प्रेम भक्ति को दर्शाता है। इसे गाकर भक्त अपने हृदय में शांति और प्रेम का अनुभव करते हैं।

हम तेरे प्यार में लूट गए सँवारे हम तेरे प्यार में मिट गए सँवारे तू छिपा है कहा हम तो तरसे याहा बरसे कब से ये नैना मेरे सँवारे हम तेरे प्यार में लूट गए सँवारे हम तेरे प्यार में मिट गए सँवारे माना राधा के जैसी न हस्ती मेरी मीरा बाई सी न प्रीत सच्ची मेरी ना तो नरसी के जैसी है मस्ती मेरी न सुदामा के जैसी है भगति मेरी आधा घ्याल हु मैं आधा पागल हु मैं वो नज़र हमें मिल जाए तेरे दर्शन पा जाएँ एक बार तो कन्हैया हम जैसों से मिलो दास की सास हर इक तेरे नाम रे कब ये मैंने कहा है कन्हैया मेरे अपने हाथो की मुरली बना लो मुझे कब कहा मैंने ये मोर के पंख के जैसे अपने मुकट में सजा लो मुझे इक घुंगरू बना अपनी पैजनिया का चुम जो हर घडी मैं तेरे पाँव रे हम तेरे प्यार में लूट गए सँवारे हम तेरे प्यार में मिट गए सँवारे हमने सोचा था ये इक सहारे तेरे चार दिन जिंदगी के गुजर जायेगे प्रीत की रीत तुम निभाते सदाइक न इक दिन मेरे भाग खुल जायेगे एक भरोसे तेरे प्राण प्यारे मेरे हम ने दिल का लगाया था ये दाम रे हम तेरे प्यार में लूट गए सँवारे हम तेरे प्यार में मिट गए सँवारे जिया नहीं लागे कही तेरे बिन सँवारे

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन के मूल विषय में श्रीकृष्ण के प्रति गहरे प्रेम और भक्ति का वर्णन किया गया है। पहले दो चरण में कहा गया है, 'हम तेरे प्यार में लूट गए सँवारे', जो यह दर्शाता है कि भक्त ने अपने जीवन को श्रीकृष्ण के प्रेम में पूरी तरह समर्पित कर दिया है। आगे, 'तू छिपा है कहा, हम तो तरसे याहा' का स्वरूप, भक्त की अज्ञातता और अपने प्रियतम की खोज को दर्शाता है। भक्ति की इस अनन्य भावना में भक्त ने अपने पूर्वजन्मों के संतों जैसे राधा और मीरा से अपनी तुलना की है, यह दर्शाते हुए कि जीवन में पूर्णता और संतोष केवल श्रीकृष्ण के प्रेम से ही संभव है। ऐसा प्रतीत होता है कि भक्त इस प्रेम को पाने के लिए पागल हुआ जा रहा है।

भजन के भावार्थ में भक्त की मानसिक स्थिति को उजागर किया गया है। 'आधा घ्याल हु मैं आधा पागल हु मैं' से प्रतीत होता है कि भक्त प्रेम में इतना खो गया है कि वह अपने वास्तविकता से दूर है। यह पागलपन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा प्रेम कभी-कभी ज्ञान और साहस की सीमाओं को पार कर जाता है। 'अर्थ की खोज करने वाले रणनीतिकाचारी चुमते हैं जो केवल नैतिक शांति और प्रेम का अनुभव कर लेते हैं। भजन में यह संकेत भी है कि जब भक्त अपने प्राण प्रिय कन्हैया से मिलन की कामना करता है, तो इसका परिणाम उसके जीवन का मोड़ बन सकता है।

इस भजन में भक्ति मार्ग का गहन दर्शन उपलब्ध है। भक्त अपने दिल में सब कुछ श्रीकृष्ण को समर्पित करता है और यह भावनाएँ, 'मैंने सोचा था ये इक सहारे तेरे', की भावनाएँ दर्शाते हैं कि भक्त ने केवल प्रेम और भक्ति को अपने जीवन का आधार बनाया है। यह ध्यान देने की बात है कि भक्ति का मार्ग केवल व्यक्तिगत जानकारी और सिद्धांतों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक गहरा अनुभव है जो आत्मा की गहराइयों में जाकर श्रीकृष्ण के साथ एक साक्षात्कार की अनुमति देता है। ऐसा लगता है कि भक्त अपने जीवन की संपूर्णता को श्रीकृष्ण के प्रतीक में देखता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

इस भजन का महत्व पुराणों और भगवद गीता में अपने स्थान के अनुरूप है। कृष्ण के जीवन में राधा और मीरा जैसे भक्तों का उल्लेख संत जीवन की उच्चता का प्रतीक है। ये भजन स्पष्ट रूप से उस भक्ति के मूल तत्वों को दर्शाते हैं जो केवल मानसिक और भौतिक सुख की तलाश नहीं करते बल्कि प्रेम की सच्चाई की खोज में रहते हैं। भजन में किए गए उपदेश, 'एक भरोसे तेरे प्राण प्यारे मेरे', यह दर्शाते हैं कि भक्ति के माध्यम से व्यक्ति को उन उच्चतम आध्यात्मिक मूल्य को समझने की प्रेरणा दी जाती है जो अज्ञानता और अपराधों से उपर उठाते हैं।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन को गाने से भक्त के मन और आत्मा में अमिट शांति का अनुभव होता है। यह ध्यान और भक्तिपथ पर चलने वालों के लिए मानसिक बल और स्थिरता प्रदान करता है। इससे व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति होती है, जिससे उसके भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में संतुलन मिलता है। संकट के समय, भक्त इस भजन को गाकर अपने आप को सकारात्मक ऊर्जा से भरने का कार्य कर सकता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का जाप सुबह के समय सूर्योदय के बाद या संध्या समय करना विशेष फलदायी होता है। इसे गाने के समय एक दीया जलाना और पुष्प चढ़ाना चाहिए। सही मुद्रा में बैठकर मन को एकाग्र करके श्रीकृष्ण के नाम का जाप करने से मन की शुद्धता और ध्यान की गहराई बढ़ती है। ऐसे में भक्त को प्रेम और समर्पण भाव से श्रीकृष्ण की उपासना करनी चाहिए।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

क्या यह भजन केवल कृष्ण भक्तों के लिए है?

यह भजन सभी भक्तों के लिए है, जो प्रेम, भक्ति और आत्मा की शांति की खोज में हैं। चाहे भक्त किसी भी परंपरा से हो, इस भजन में उनका जुड़ाव महसूस होगा।

किस समय इस भजन को गाना चाहिए?

इस भजन को सुबह या संध्या काल में गाना उत्तम रहता है, जब मन एकाग्र और शांति में होता है।

इस भजन का प्रमुख उद्देश्य क्या है?

इस भजन का उद्देश्य भक्त के मन में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और भक्ति को जागृत करना है, जिससे वे अपने जीवन में सच्ची खुशी प्राप्त कर सकें।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 24 Aug 2026

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