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अर्गला स्तोत्रम् लिरिक्स (Argala Stotram lyrics in Hindi And English) - ॐ जयन्ती मङ्गला काली Madhvi Madhukar Jha - Bhaktilok

76 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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अर्गला स्तोत्रम्: देवी की कृपा की प्रार्थना

सच्चे मन से अर्गला स्तोत्र का जाप करें, देवी की कृपा से सभी बाधाएं दूर होंगी।

ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥1॥ जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥2॥ मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥3॥ महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥4॥ रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥5॥ शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥6॥ वन्दिताङ्‌घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥7॥ अचिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥8॥ नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥9॥ स्तुवद्‌भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि१॥10॥ चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥11॥ देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥12॥ विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥13॥ विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥14॥ सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥15॥ विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥16॥ प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥17॥ चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्‍वरि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥18॥ कृष्णेन संस्तुते देवि शश्‍वद्भक्त्या सदाम्बिके। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥19॥ हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्‍वरि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥20॥ इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्‍वरि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥21॥ देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥22॥ देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥23॥ पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥24॥ इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः। स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥25॥ इति देव्या अर्गलास्तोत्रं सम्पूर्णम्

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

अर्गला स्तोत्रम् एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है जिसका अर्थ है देवी के प्रति प्रार्थना करना, जिसमें विभिन्न देवी रूपों की महिमा का वर्णन किया गया है। पहले श्लोक में, 'जयन्ती मङ्गला काली' आदि शब्द देवी के अनेक रूपों की पूजा का संकेत देते हैं। यह स्तोत्र भक्तों को विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों से मुक्ति और सुख की प्राप्ति का आश्वासन देता है। देवी चामुंडा, कालरात्रि, तथा अन्य रूपों की महिमा का उल्लेख करते हुए भक्त देवी से बल, यश और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। हर श्लोक में, 'रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि' कहकर भक्त ने देवी से आत्मिक और भौतिक रूप से समृद्धि की कामना की है। ये पंक्तियाँ भक्तों में साहस एवं आत्मविश्वास का संचार करती हैं।

अर्गला स्तोत्रम् का भावार्थ गहन और प्रेरणादायी है। इसमें देवियों के विभिन्न स्वरूपों की आराधना की जा रही है, जो भक्तों के जीवन में सुख और शांति लाने का आश्वासन देती है। भद्रकाली की भक्ति और 'महिषासुरनिर्णाषि' शब्द से यह प्रमाणित होता है कि देवी ने असुरों का नाश किया और भक्तों को सुख प्रदान किया। देवी से प्रार्थना करते हुए, भक्त अपने जीवन में आने वाले संकटों को दूर करने और उन्हें इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति की कामना करते हैं। जब भक्त सच्चे मन से इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो उनके मन में विश्वास और सच्ची भक्ति का संचार होता है।

अर्गला स्तोत्रम् के माध्यम से भक्तों का उपदेश मिलता है कि भक्ति मार्ग पर चलकर व्यक्ति अपनी सभी समस्याओं से मुक्त हो सकता है। इस उपासना में भक्ति की गहराई है, जो आत्मा के सर्वोच्च विकास की ओर ले जाती है। श्लोक में विभिन्न असुरों का उल्लेख, जैसे 'महिषासुर' और 'रक्तबीज', यह दर्शाता है कि बुराई पर अच्छाई की विजय होती है। यह भाव विश्वास दिलाता है कि देवी हमें निरंतर सुरक्षा करती हैं। स्तोत्र का एक महत्वपूर्ण फल यह है कि यह व्यक्ति को जागरूक करता है कि कठिनाइयों का सामना शक्ति और दृढ़ता से करना चाहिए, और देवी की कृपा से हर समस्या हल हो सकती है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

अर्गला स्तोत्रम् को देवी भागवत पुराण, देवी महात्म्य, और अन्य पौराणिक ग्रंथों में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यह स्तोत्र देवी दुर्गा के महान चमत्कारों और शक्तियों का वर्णन करता है। देवी महात्म्य में, देवी ने असुरों का नाश किया है और भक्ति को सर्वोच्च स्थान दिया है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन भक्तों के लिए महत्वपूर्ण है, जो देवी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं और कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। विभिन्न मंत्रों और स्तोत्रों में देवी की शक्तियों की विशेषताएँ और उनके भक्तों के प्रति प्रेम दर्शाया गया है। यह स्तोत्र समृद्धि, स्वास्थ्य, और सफलता की प्राप्ति में सहायता करता है।

प्रभु श्री राम के आदर्शों और मर्यादा पुरुषोत्तम के सम्पूर्ण चरित्र का रसास्वादन करने के लिए रामायण महाग्रंथ अन्वेषक का उपयोग करें। अर्गला स्तोत्रम् का जाप मानसिक शांति, शारीरिक स्वास्थ्य, और आध्यात्मिक प्रगति के लिए अत्यंत लाभकारी है। इससे मन में सकारात्मकता बढ़ती है, आत्मा की शुद्धता होती है, और जीवन में आ रही समस्याओं का समाधान होता है। नियमित पाठ से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और भक्तों को कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

अर्गला स्तोत्रम् का पाठ सुबह के समय करना श्रेष्ठ माना जाता है। पूजा के समय एक दीया जलाना, देवी को पुष्प अर्पित करना और उनके समक्ष नम्रता से बैठकर ध्यान लगाना आवश्यक है। सही स्थिति में बैठकर, भक्त को अपने मन को एकाग्र कर इस स्तोत्र का जाप करना चाहिए। सही मनोबल और श्रद्धा के साथ इसे पढ़ने से शीघ्र फल मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

अर्गला स्तोत्र का पाठ किस प्रकार किया जाता है?

अर्गला स्तोत्र का पाठ विधिपूर्वक सुबह के समय करना चाहिए। दीया जलाकर और फूलों की आराधना से पाठ आरंभ करें।

इस स्तोत्र का क्या महत्व है?

यह स्तोत्र देवी दुर्गा की विभिन्न शक्तियों का वर्णन करते हुए कठिनाइयों से मुक्ति और सुख की प्राप्ति का आश्वासन देता है।

क्या अर्गला स्तोत्र का नियमित पाठ लाभकारी है?

हां, नियमित रूप से अर्गला स्तोत्र का जाप मानसिक और शारीरिक लाभों के साथ-साथ आध्यात्मिक बल में वृद्धि करता है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 24 Aug 2026

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