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श्री दक्षिणामूर्ति नवरत्नमाला स्तोत्रम (Dakshinamurthy Navaratna Mala Stotram Lyrics in Hindi) - Saraswathi Agasthiyar - Bhaktilok

93 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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श्री दक्षिणामूर्ति नवरत्नमाला स्तोत्र: ज्ञान और भक्ति का स्रोत

श्री दक्षिणामूर्ति की महिमा का गायन करें, उनके द्वारा ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति के लिए शुद्ध हृदय से प्रार्थना करें।

 श्री दक्षिणामूर्ति नवरत्नमाला स्तोत्रम (Dakshinamurthy Navaratna Mala Stotram Lyrics in Hindi) - मूलेवटस्य मुनिपुङ्गवसेव्यमानंमुद्राविशेषमुकुलीकृतपाणिपद्मम् ।मन्दस्मितं मधुरवेषमुदारमाद्यंतेजस्तदस्तु हृदये तरुणेन्दुचूडम् ॥ १ ॥शान्तं शारदचन्द्रकान्तिधवलं चन्द्राभिरामाननंचन्द्रार्कोपमकान्तिकुण्डलधरं चन्द्रावदातांशुकम् ।वीणां पुस्तकमक्षसूत्रवलयं व्याख्यानमुद्रां करै-र्बिभ्राणं कलये हृदा मम सदा शास्तारमिष्टार्थदम् ॥ २ ॥कर्पूरगात्रमरविन्ददलायताक्षंकर्पूरशीतलहृदं करुणाविलासम् ।चन्द्रार्धशेखरमनन्तगुणाभिराम-मिन्द्रादिसेव्यपदपङ्कजमीशमीडे ॥ ३ ॥द्युद्रोरधस्स्वर्णमयासनस्थंमुद्रोल्लसद्बाहुमुदारकायम् ।सद्रोहिणीनाथकलावतंसंभद्रोदधिं कञ्चन चिन्तयामः ॥ ४ ॥उद्यद्भास्करसन्निभं त्रिणयनं श्वेताङ्गरागप्रभंबालं मौञ्जिधरं प्रसन्नवदनं न्यग्रोधमूलेस्थितम् ।पिङ्गाक्षं मृगशाबकस्थितिकरं सुब्रह्मसूत्राकृतींभक्तानामभयप्रदं भयहरं श्रीदक्षिणामूर्तिकम् ॥ ५ ॥श्रीकान्त द्रुहिणोपमन्यु तपन स्कन्देन्द्र नन्द्यादयःप्राचीनागुरवोऽपि यस्य करुणालेशाद्गतागौरवम् ।तं सर्वादिगुरुं मनोज्ञवपुषं मन्दस्मितालङ्कृतंचिन्मुद्राकृतिमुग्धपाणिनलिनं चित्तं शिवं कुर्महे ॥ ६ ॥कपर्दिनं चन्द्रकलावतंसंत्रिणेत्रमिन्दु प्रतिमाक्षिताज्वलम् ।चतुर्भुजं ज्ञानदमक्षसूत्र-पुस्ताग्निहस्तं हृदि भावयेच्छिवम् ॥ ७ ॥वामोरूपरिसंस्थितां गिरिसुतामन्योन्यमालिङ्गितांश्यामामुत्पलधारिणीं शशिनिभां चालोकयन्तं शिवम् ।आश्लिष्टेन करेण पुस्तकमथो कुम्भं सुधापूरितंमुद्रां ज्ञानमयीं दधानमपरैर्मुक्ताक्षमालं भजे ॥ ८ ॥वटतरु निकटनिवासं पटुतर विज्ञान मुद्रित कराब्जम् ।कञ्चन देशिकमाद्यं कैवल्यानन्दकन्दलं वन्दे ॥ ९ ॥इति श्री दक्षिणामूर्ति नवरत्नमाला स्तोत्र ।

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस स्तोत्र में श्री दक्षिणामूर्ति की महिमा का विवरण दिया गया है, जो ज्ञान और मोक्ष के प्रदाता हैं। 'मूलेवटस्य मुनिपुङ्गव' से उनका स्वरूप स्पष्ट होता है, जहाँ मुनियों के प्रति उनकी सेवा की चर्चा की गई है। विशेषकर उनकी शांति और ज्ञान का प्रतीक चंद्रमा, जो साधकों के हृदय में स्थित होता है, का वर्णन किया गया है। 'वीणां पुस्तकमक्षसूत्र' द्वारा ज्ञान की साधना को दर्शाया गया है। ये सभी भावनाएँ और प्रतीक इस बात की ओर संकेत करते हैं कि दक्षिणामूर्ति अपनी उपस्थिति से ज्ञान और सुख के मार्ग को दर्शाते हैं। हर श्लोक में उनके विशेष गुणों का वर्णन किया गया है जैसे कि शांती, करुणा और त्याग। इन गुणों के माध्यम से हम उत्तमता की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

इस स्तोत्र में भावनाओं का एक गहरा प्रवाह है। यहाँ 'शान्तं' और 'मन्दस्मितं' जैसे शब्दों से हमें शांति और प्रेम की भावना से भर दिया जाता है। यह दर्शाता है कि दक्षिणामूर्ति केवल ज्ञान के अवतार नहीं, बल्कि करुणा और प्रेम के प्रतीक भी हैं। उनके प्रति भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करके भक्ति की एक नई ऊँचाई को प्राप्त किया जा सकता है। 'प्रसन्नवदनं' इस बात का प्रतीक है कि सच्चे भक्त की मुस्कान और खुशी केवल ज्ञान की प्राप्ति से ही नहीं, बल्कि दक्षिणामूर्ति के अनुग्रह से भी आती है। सब कुछ मिलाकर, यह भजन भक्त को उन्नति, आंतरिक शांति, और अज्ञानता के अंधकार को दूर करने का संदेश देता है।

इस स्तोत्र का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह भक्ति मार्ग को निर्देशित करता है। दक्षिणामूर्ति ज्ञान के अद्वितीय स्रोत हैं और उन्होंने अपने अनुयायियों को सिखाया है कि कैसे सही ज्ञान से अज्ञानता को समाप्त किया जा सकता है। 'ज्ञानदं' और 'अक्षसूत्र' जैसे शब्द इस बात की पुष्टि करते हैं कि वे तत्त्वज्ञान के स्रोत हैं। यह भजन हमें प्रेरित करता है कि हमें भी उनकी भक्ति और ज्ञान के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए। जो भक्ति से भरा है, वही वास्तविकता को समझ सकता है और जीवन की सत्यता को पहचान सकता है। इसलिए, यह भजन केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि आत्मज्ञान का एक महत्वपूर्ण स्त्रोत है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

इस स्तोत्र का महत्व न केवल इसकी भक्ति में, बल्कि इसकी गहन ज्ञान की प्राप्ति में भी निहित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, दक्षिणामूर्ति को भगवान शिव का रूप माना जाता है, जो अपने ज्ञान के माध्यम से अज्ञानता के अंधकार को दूर करने का कार्य करते हैं। उपनिषदों में भी उनकी महिमा का वर्णन मिलता है, जहाँ वे ज्ञान और तत्त्वज्ञान के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। इस स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को आत्मज्ञान और शाश्वत सुख प्राप्त होता है। सांस्कृतिक और धार्मिक संदर्भ में, यह स्तोत्र एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है और इसे नियमित रूप से गाने या पढ़ने का महत्व है।

प्रभु श्री राम के आदर्शों और मर्यादा पुरुषोत्तम के सम्पूर्ण चरित्र का रसास्वादन करने के लिए रामायण महाग्रंथ अन्वेषक का उपयोग करें। दक्षिणामूर्ति नवरत्नमाला स्तोत्र का नियमित पाठ करने से मानसिक शांति, आंतरिक संतोष और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। यह आत्मा को शुद्ध करने और उच्चतम आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए बहुत ही लाभकारी है। भक्तों में नकारात्मक भावनाओं को कम करने और मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने में यह स्तोत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस स्तोत्र का पाठ सुबह का समय सबसे उपयुक्त होता है, जब मन शुद्ध और ताजगी से भरा होता है। पूजा स्थल पर एक दीप जलाकर, फूलों और फलां का समर्पण करने से पूजा की ऊर्जा बढ़ती है। ध्यान मुद्रा में बैठकर, दृढ़ता से इस स्तोत्र का पाठ करने पर, मानसिक और spiritual शांति प्राप्त होती है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

श्री दक्षिणामूर्ति नवरत्नमाला स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

यह स्तोत्र सुबह के अद्भुत समय में पाठ करना चाहिए, जिससे मन और आत्मा की शुद्धता बनी रहे।

इस स्तोत्र के द्वारा किस प्रकार के लाभ होते हैं?

इसका पाठ मानसिक शांति, आध्यात्मिक विकास, और ज्ञान की प्राप्ति में सहायक होता है, जो भक्तों में सकारात्मक ऊर्जा भरता है।

क्या इस स्तोत्र का पाठ केवल दक्षिणामूर्ति की पूजा के लिए किया जाता है?

यह स्तोत्र ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी उपयोग किया जाता है और इसे सभी प्रकार की आध्यात्मिक साधना में शामिल किया जा सकता है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 18 Aug 2026

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