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श्री गंगा स्तोत्रम् (Maa Ganga Stortam Lyrics in Hindi) - देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे Shankaracharya Ganga Stotra - Bhaktilok

71 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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श्री गंगा स्तोत्रम्: माँ गंगा की दिव्यता का प्रकटक

गंगा माता की महिमा का बखान करते हुए, भक्तों को आशीर्वादित करने का सुन्दर स्तोत्र。

 श्री गंगा स्तोत्रम् (Maa Ganga Stortam Lyrics in Hindi) - ( श्री गंगा जी की स्तुति )गांगं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् ।त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥माँ गंगा स्तोत्रम्॥देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गेत्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।शङ्करमौलिविहारिणि विमलेमम मतिरास्तां तव पदकमले ॥१॥भागीरथि सुखदायिनि मातस्तवजलमहिमा निगमे ख्यातः ।नाहं जाने तव महिमानंपाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ २॥हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गेहिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे ।दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारंकुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ ३॥तव जलममलं येन निपीतं,परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तःकिल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ ४॥पतितोद्धारिणि जाह्नवि गङ्गेखण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे ।भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये,पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ॥ ५॥कल्पलतामिव फलदां लोके,प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।पारावारविहारिणि गङ्गेविमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥ ६॥तव चेन्मातः स्रोतःस्नातःपुनरपि जठरे सोऽपि न जातः ।नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गेकलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥ ७॥पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गेजय जय जाह्नवि करुणापाङ्गे ।इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणेसुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८॥रोगं शोकं तापं पापंहर मे भगवति कुमतिकलापम्।त्रिभुवनसारे वसुधाहारेत्वमसि गतिर्मम खलु संसारे॥ ९॥अलकानन्दे परमानन्देकुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।तव तटनिकटे यस्य निवासःखलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥ १०॥वरमिह नीरे कमठो मीनःकिं वा तीरे शरटः क्षीणः ।अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तवन हि दूरे नृपतिकुलीनः॥ ११॥भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्येदेवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।गङ्गास्तवमिमममलं नित्यंपठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥ १२॥येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषांभवति सदा सुखमुक्तिः ।मधुराकान्तापज्झटिकाभिःपरमानन्दकलितललिताभिः ॥ १३॥गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारंवाञ्छितफलदं विमलं सारम् ।शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठतिसुखी स्तव इति च समाप्तः ॥ १४॥देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गेत्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।शङ्करमौलिविहारिणि विमलेमम मतिरास्तां तव पदकमले ॥|| श्री शङ्कराचार्य कृतं ||

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

श्री गंगा स्तोत्रम् मूर्तिमान गंगा के प्रति भक्ति और श्रद्धा का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस स्तोत्र में गंगा माता के जल की शुद्धता और पवित्रता का गुणगान किया गया है। 'गांगं वारि मनोहारि' पंक्ति में माँ गंगा के जल को जीवनदायिनी और मन को भाने वाला बताया गया है, जो भक्तों केलिए शुद्धता और उन्नति का प्रतीक है। इसके अन्य श्लोकों में गंगा के द्वारा पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति की बात की गई है। 'हरिपदपाद्यतरङ्गिणि' में गंगा के जल को हरि की मातृसार स्वरूप की तरह चित्रित किया गया है, जो भक्तों को भवसागर से पार करने में सहायता करती है। इस स्तोत्र में गंगा को त्रिभुवन की तारिणी और भक्तों का उद्धारक बताया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि गंगा के जल का पान करना आत्मा की उन्नति हेतु लाभकारी होता है।

भावार्थ में, यह स्तोत्र अज्ञानता का नाश करने और विश्व के समस्त तापों को हरने वाला बताया गया है। माँ गंगा की कृपा भक्तों पर सदैव रहती है। 'नाहं जाने तव महिमानं' की पंक्ति में दर्शाया गया है कि भक्त अपनी अल्पता का भान कराते हैं और माँ गंगा से कृपा की प्रार्थना करते हैं। 'नरकनिवारिणि' में यह स्पष्ट किया गया है कि जो भक्त गंगा के जल को पिते हैं, वे भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त कर सकते हैं। गंगा का जल केवल शारीरिक ही नहीं, अपितु आध्यात्मिक शुद्धता का भी प्रतीक है। इस प्रकार, माँ गंगा की स्तुति में यह स्तोत्र न केवल भक्ति का अपितु जीवन का सही मार्ग बताता है।

श्री गंगा स्तोत्रम् में भक्तिभाव का गहन संकेत छिपा हुआ है। यहाँ भक्ति मार्ग की महत्ता और इसके फलित होने की बात की गई है। भक्त, जो गंगा के प्रति विश्वास और श्रद्धा रखते हैं, उन्हें संसार के समस्त सुख प्राप्त होते हैं। 'गङ्गाभक्तिस्तेषांभवति सदा सुखमुक्तिः' में बताया गया है कि गंगा के प्रति भक्ति से सदैव सुख और मुक्ति की प्राप्ति होती है। यहाँ भक्त उन्नति की खोज में हैं और गंगा उनके लिए वह माध्यम है। गंगा की पवित्रता और शुद्धता का अनुसरण करके ही भक्त अपनी आत्मा को शुद्ध कर सकते हैं। इस स्तोत्र का सेवन केवल श्रवण और पाठ के माध्यम से ही नहीं, अपितु जीवन की सार्थकता के लिए भी आवश्यक है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यह स्तोत्र भारतीय पौराणिक कथाओं में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। गंगा का धरती पर अवतरण राजा भागीरथ के द्वारा हुआ था। पौराणिक ग्रंथों में इसे 'पितृनिधि' और 'मोक्षदायिनी' के रूप में वर्णित किया गया है। गंगा का जल सब पापों का नाशक है और यह धर्मशास्त्रों में नित्य सर्वाधिक पूजनीय मानी जाती है। गंगा के जल से स्नान करने से आत्मा को मुक्ति मिलती है और इस स्तोत्र का पाठ इसे सिद्ध करने का एक साधन है। इसका महत्व यहाँ तक है कि महाभारत और रामायण जैसे प्रमुख ग्रंथों से भी इसकी महिमा का बखान किया गया है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। श्री गंगा स्तोत्रम् का पाठ करने से मानसिक शांति, शारीरिक स्वास्थ्य, और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह भक्ति गीत भक्त को पापों से मुक्त करने, रोगों का नाश करने और मानसिक तनाव से राहत देने वाला माना जाता है। इसके नियमित जाप से भक्त की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और सुख-शांति का अनुभव होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

श्री गंगा स्तोत्रम् का पाठ प्रतिदिन प्रात:काल या संध्या के समय करना सर्वश्रेष्ठ होता है। साधक को चाहिए कि स्वच्छ स्थान पर बैठें, एक दिया जलाएँ और गंगा की मूर्ति या चित्र के सामने बैठकर ध्यान लगाएँ। ध्यान करते समय भक्त को पूर्ण मनोयोग के साथ गंगा माता की कृपा की कामना करनी चाहिए।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

श्री गंगा स्तोत्रम् का पाठ करने का सही समय क्या है?

यह स्तोत्र प्रात:काल और संध्या के समय पाठ करना उपयुक्त माना जाता है। विशेषकर गंगा स्नान के समय इसे करना श्रेयस्कर होता है।

क्या गंगा माता की कृपा प्राप्त करने के लिए विशेष साधना आवश्यक है?

गंगा माता की कृपा प्राप्त करने के लिए शुद्ध हृदय से भक्ति और सच्चे मन से इस स्तोत्र का जाप करना आवश्यक है। इससे भक्त की गंगा माता के प्रति आस्था और बढ़ती है।

श्री गंगा स्तोत्रम् के लाभ क्या हैं?

इस स्तोत्र के जाप से भक्त को मानसिक शांति, स्वास्थ्य लाभ, और पापों से मुक्ति की प्राप्ति होती है। गंगा माता की कृपा से भक्त जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Aug 2026

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