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आनंद ही आनंद बरस रहा बलिहारी ऐसे सतगुरु की (Aanand Hi Aanand Baras Raha Lyrics in Hindi) - Sataguru Bhajan - Bhaktilok

83 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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सतगुरु की महिमा: आनंद स्वरूप भजन

सतगुरु की कृपा से परिपूर्ण इस भजन के माध्यम से अंतर्मुखी हो श्रद्धा और भक्ति का अनुभव करें।

आनंद ही आनंद बरस रहा बलिहारी ऐसे सतगुरु की बलिहारी ऐसे सतगुरु की आनंद ही आनंद बरस रहा बलिहारी ऐसे सतगुरु की तन भाग हमारे आज हुए शुभ दर्शन ऐसे सद्गुरु की शुभ दर्शन ऐसे सद्गुरु की पावन की मीन भारत भूमि बलिहारी ऐसे सतगुरु की आनंद ही आनंद बरस रहा बलिहारी ऐसे सतगुरु की क्या रूप अनुपम पायो है सो हे जिन तारों विच चंदासो हे जिन तारों विच चंदासूरत मुहूर्त मोहन कारी बलिहारी ऐसे सतगुरु की आनंद ही आनंद बरस रहा बलिहारी ऐसे सतगुरु की क्या प्रेम छटा क्या मधुर वाणी बरसत वाणी अमृत धाराबरसत वाणी अमृत धारावह मधुर मधुर अजब ध्वनि बलिहारी ऐसे सतगुरु की आनंद ही आनंद बरस रहा बलिहारी ऐसे सतगुरु की गुरु ज्ञानरूपी जल बरसा कर गुरु धर्म बगीचा लगा दियागुरु धर्म बगीचा लगा दियाखेल रही यह कैसी फुलवारी बलिहारी ऐसे सतगुरु की आनंद ही आनंद बरस रहा बलिहारी ऐसे सतगुरु की

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह भजन 'आनंद ही आनंद बरस रहा बलिहारी ऐसे सतगुरु की' हमारे गुरु की महिमा का अद्भुत वर्णन करता है। 'आनंद ही आनंद' के दोहराए जाने से यह स्पष्ट होती है कि सतगुरु की कृपा से भक्त के जीवन में आनंद की वर्षा हो रही है। 'तन भाग हमारे आज हुए शुभ दर्शन' यह दर्शाता है कि गुरु के दर्शन से हमारी आत्मा को जो दिव्यता प्राप्त होती है, वह असीम है। यहाँ भारत भूमि को 'पावन की मीन' समझाया गया है, जो गुरु के चरणों के स्पर्श से पवित्र होती है। जब हम गुरु के मार्ग का अनुसरण करते हैं, तब हमारा जीवन एक मधुर संगीत की भांति हो जाता है, जिसमें हर शब्द 'प्रेम', 'छटा' और 'मधुर वाणी' से भरा होता है।

भजन में गुरु की अद्भुत मुस्कान और उनके स्वरुप की अपार सुंदरता का भी वर्णन किया गया है। 'चंदा' और 'तारों' के माध्यम से गुरु का अनुपम रूप चित्रित किया गया है, जो हमें अपनी ओर आकर्षित करता है। 'क्या प्रेम छटा' इस पंक्ति के माध्यम से भक्त की भावनाओं का संकेत मिलता है कि गुरु का प्रेम उसके जीवन को कितनी मिठास और ज्ञान प्रदान करता है। भजन हमें यह भी याद दिलाता है कि गुरु ज्ञान के जल से जीवन के बगीचे को सजाता है, जहाँ ज्ञान और प्रेम के फूल खिलते हैं। यह सर्वत्र गुरु की महिमा और शक्ति को दर्शाता है, जिससे भक्तों में उत्साह और आस्था का संचार होता है।

इस भजन का आध्यात्मिक दृष्टिकोण हमें भक्ति मार्ग के महत्व को बताता है। गुरु की कृपा से ही मनुष्य आत्मज्ञान की ओर अग्रसर हो सकता है। 'गुरु ज्ञानरूपी जल' का बगीचा लगाना एक गहन आध्यात्मिक सत्य है, जो हमारे जीवन में ज्ञान और समर्पण का संचार करता है। जब भक्त गुरु की भक्ति में लीन होते हैं, तब वे आनंद की स्थायी अवस्था में प्रविष्ट होते हैं। इस भजन की धुन और शब्द हमें ध्यान और साधना की प्रेरणा देते हैं, जिससे हम अपने जीवन में संतुलन और शांति प्राप्त कर सकें।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

इस भजन का शास्त्रीय संदर्भ हमें उन ग्रंथों की याद दिलाता है जहाँ गुरु की महिमा का वर्णन किया गया है। उपनिषदों में गुरु को 'तत्त्व ज्ञान' का संवाहक बताया गया है और भगवद गीता में भी गुरु की कृपा के महत्व को इंगित किया गया है। यह भजन संप्रदायों में विशेष प्रिय है, खासकर संत तुकाराम और कबीर जैसे भक्तों की परंपरा में। इन भक्तों ने भी अपने भजनों के माध्यम से गुरु के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा व्यक्त की है। इस प्रकार, यह भजन उनकी चेतना से जुड़ता है और भक्ति के मार्ग में अग्रसर करने का कार्य करता है।

संतों और ऋषियों के आध्यात्मिक इतिहास की गहरी समझ के लिए संत एवं ऋषि ज्ञानकोश अवश्य पढ़ें। इस भजन का नियमित जाप करने से मानसिक शांति, सकारात्मकता और आध्यात्मिक उत्तेजना प्राप्त होती है। गुरुवाणी सुनने से मन में सिद्धांतों का ज्ञान बढ़ता है और एकाग्रता में सुधार होता है। इसे ध्यान करना हमारे भीतर की उथल-पुथल को शांत करता है और आत्मा में आनंद का संचार करता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

यह भजन सुबह के समय या संध्या में गाया जा सकता है, जब मन शांति में हो। पूजा के समय एक दीया जलाना और फूल चढ़ाना शुभ होता है। एक अच्छी मुद्रा में बैठकर, ध्यान लगाते हुए भजन गायन करने से गुरु कृपा की अनुभूति होती है। भक्तों को भावपूर्ण मन से गायन करने की सलाह दी जाती है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन 'आनंद ही आनंद बरस रहा बलिहारी ऐसे सतगुरु की' का मुख्य संदेश क्या है?

इस भजन का मुख्य संदेश गुरु की कृपा और उनकी महिमा का अनुभव कर आनंद की स्थिति में पहुंचना है। यह दर्शाता है कि गुरु के माध्यम से जीवन में खुशियों और ज्ञान की वर्षा होती है।

क्या इस भजन को नियमित रूप से गाना चाहिए?

हाँ, इस भजन को नियमित रूप से गाने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक विकास संभव है। यह भक्ति की भावना को जगाता है और आत्मा को आनंदित करता है।

इस भजन के लिए उचित समय और विधि क्या है?

इस भजन का समारोह सुबह या संध्या में करना उचित होता है। ध्यान लगाते हुए, एक दीया जलाकर और मन में श्रद्धा रखते हुए इसे गाना चाहिए।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 23 Aug 2026

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