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भक्ति रस काव्य व भजन

मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे गुरूदेव (Mera Koi Na Sahara Bin Tere Lyrics in Hindi) - Bhaktilok

68 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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गुरूदेव की कृपा: जीवन का आधार

इस भजन में गुरुदेव की असीम कृपा के लिए प्रार्थना की गई है, जिससे जीवन में सुख और शांति मिल सके।

मेरा कोई ना सहारा बिन तेरेगुरुदेव सावरिया मेरे गुरुदेव सावारियां मेरे, गुरुदेव सावारिया मेरे मेरा कोई ना सहारा बिन तेरेगुरुदेव सावरिया मेरे..तेरे बिना मेरा हैं कौन यहां प्रभु तुम्हें छोड़ मैं जाऊ कहामैं तो आन पड़ा हूं दर तेरेगुरुदेव सावरिया मेरेमेरा कोई ना सहारा बिन तेरेगुरुदेव सावरिया मेरे .....मैंने जनम लिया जग में आयातेरी कृपा से ये नर तन पायातूने किए उपकार घनेरेगुरुदेव सावरिया मेरेमेरा कोई ना सहारा बिन तेरेगुरुदेव सावरिया मेरे .....मेरे नैना कबसे तरस रहेंसावन भादों हैं बरस रहेंअब छाए घनघोर अंधेरेगुरुदेव सावरिया मेरेमेरा कोई ना सहारा बिन तेरेगुरुदेव सावरिया मेरे ......प्रभु आ जाओ प्रभु आ जाओअब और ना मुझको तरसाओ काटो जनम मरण के फेरेगुरुदेव सावरिया मेरेमेरा कोई ना सहारा बिन तेरेगुरुदेव सावरिया मेरे .....जिस दिन से दुनिया में आयामैने पल भर चैन नहीं पायासहे कष्ट पे कष्ट घनेरेगुरुदेव सावरिया मेरेमेरा कोई ना सहारा बिन तेरेगुरुदेव सावारिया मेरे ..... मेरा सच्चा मारग छूट गया मुझे पांच लुटेरे ने लूट लियामैंने यत्न किए बहुतेरेगुरुदेव सावरिया मेरेमेरा कोई ना सहारा बिन तेरेगुरुदेव सावरिया मेरे ..... मेरे सारे सहारे छूट गए तुम भी गुरु मुझसे रूठ गएआओ करने दूर अंधेरेगुरुदेव सांवरिया मेरेमेरा कोई ना सहारा बिन तेरेगुरुदेव सांवरिया मेरे ..... गुरुदेव सावारियां मेरे, गुरुदेव सावारिया मेरे मेरा कोई ना सहारा बिन तेरेगुरुदेव सावरिया मेरे..

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन का मुख्य विषय गुरुदेव की सहायता और कृपा की आवश्यकता पर केंद्रित है। पहले ही अंतरे में, भक्त कहता है, 'मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे', जो यह दर्शाता है कि जीवन में कठिनाइयों का सामना करते हुए वह केवल अपने गुरू पर निर्भर है। भगवान की उपस्थिति के बिना उसकी कोई भी पहचान या सुरक्षा नहीं है। 'तेरे बिना मेरा हैं कौन यहां' इस पंक्ति के माध्यम से भक्त ने यह समझाया है कि त्रिलोक में केवल भगवान ही वास्तविक शक्ति हैं, जो शरणागत वत्सल हैं। यहाँ गुरुदेव को 'सावरिया' के रूप में सम्बोधित किया गया है, यह संकेत देता है कि गुरु अपने शिष्य को हर कठिनाई से निकालने के लिए सदा तत्पर रहता है। भक्ति के माध्यम से स्वयं को समर्पित करने की भावना यहां प्रकट होती है कि भक्त ने संसार में जन्म लिया है और अब केवल गुरुदेव के पास शांति की खोज कर सकता है।

यह भजन भावनाओं का समुद्र प्रस्तुत करता है। भक्त अपने सच्चे मार्ग को छोड़ने और दुख के अंधेरों में गिरने का अनुभव कर रहा है। 'मेरे नैना कबसे तरस रहें' पंक्ति के द्वारा भक्त ने अपनी दीर्घ प्रतीक्षा और अपने अंतर्मन के अंधकार को व्यक्त किया है। उसमें यह यह गहरी भावना छुपी हुई है कि वह ईश्वर के साथ एकात्मता की तलाश कर रहा है, और जब तक गुरुदेव का सान्निध्य नहीं मिलता, तब तक वह न तो शांति पा सकता है और न ही मुक्ति। गंभीरता से प्रतीक्षा करते हुए वह कहता है, 'प्रभु आ जाओ', यह दर्शाता है कि उसकी भक्ति केवल संकट के समय में ही नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से पुकारने की भावना है। भक्ति यह सिखाती है कि दिव्यता की प्राप्ति एक निरंतर प्रक्रिया है, जो श्रवण, स्मरण और भक्ति के माध्यम से होती है।

इस भजन का भक्ति मार्ग और भक्ति का सारतत्त्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृति में, गुरु की त्याग और बलिदान की उच्चतम मूल्य माना जाता है। यह भजन बताता है कि सच्चा गुरु ही शिष्य के रेगिस्तान में जल की बूँद के समान होता है। 'मेरा कोई ना सहारा' इस तथ्य को दर्शाता है कि जब तक शिष्य अपने गुरु के प्रति अटूट विश्वास और भक्ति रखता है, तब तक वह अपने जीवन के उलझनों का सामना कर सकता है। यह स्पष्ट करता है कि भक्ति मार्ग में, पूर्ण आत्मसमर्पण आवश्यक है। गुरु के प्रति अर्पण की यही भावना भक्ति के गहरे रहस्य को उद्घाटित करती है, और यह बताती है कि सच्चे ज्ञान की प्राप्ति में व्यक्ति के हृदय की शुद्धता कितनी महत्वपूर्ण है। भक्ति में यही भावना एक साधक को परमात्मा के निकटतम पहुँचाती है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

इस भजन का महत्व भारतीय पौराणिक कथाओं में गहराई से निहित है। हर भक्त के लिए उसका गुरु आत्मा की पवित्रता और जीवन की राह दिखाने वाला होता है। उपनिषदों में गुरू-शिष्य परंपरा को अत्यधि महत्वपूर्ण माना गया है। इसका वर्णन करते हुए, भगवद गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि सच्चे गुरु का आशीर्वाद ही पूर्ण ज्ञान और मुक्ति के द्वार खोलता है। इस भजन की पंक्तियाँ हम सभी को प्रेरित करती हैं कि वास्तविक सुख और शांति केवल गुरुदेव की कृपा से ही संभव है, और यह हमारी आत्मा की गहराई को छूने की कोशिश करते हैं।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का संकीर्तन मानसिक शांति, आंतरिक संतुलन और भक्ति में गहराई लाने का कार्य करता है। इसे गाते समय भक्त को मानसिक तनाव से मुक्ति, आत्मिक बल और सकारात्मकता का अनुभव होता है। प्रार्थना के माध्यम से, व्यक्ति स्वयं को डिप्रेशन और नकारात्मक सोच से दूर रख सकता है, जो व्यक्ति की आध्यात्मिक वृद्धि और विकास में सहायक होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का जाप सुबह के समय शुभ माना जाता है। सुबह का समय मानसिक एकाग्रता और सकारात्मकता से भरा होता है। जाप के समय एक दीया जलाना और फूलों का अर्पण करना अनुकरणीय है। सही मुद्रा में बैठकर, मन को शांत करते हुए इस भजन का जाप विशेष लाभकारी माना जाता है। भक्त को भाव से भरा होकर ये भजन गाना चाहिए ताकि वह अपने गुरु की कृपा को अनुभव कर सके।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन की मुख्य भावना क्या है?

इस भजन में गुरुदेव की कृपा और सहायता की आवश्यकता की भावना व्यक्त की गई है, जो जीवन के दुखों से मुक्ति दिलाती है।

क्या इस भजन का पाठ सुबह या शाम में करना चाहिए?

यह भजन सुबह के समय का पाठ करना अति लाभकारी है, इससे मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

गुरुदेव का स्मरण करने का सही तरीका क्या है?

गुरुदेव का स्मरण करते समय एकाग्रता से मन में उनकी विशेषताओं और आशीर्वाद की यथार्थता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 22 Aug 2026

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