यदा यदा ही धर्मस्य श्लोक का अर्थ सहित लिरिक्स (Yada Yada Hi Dharmasya Sloka Ka Arth Sahit Lyrics in Hindi) -
यदा यदा हि धर्मस्य
ग्लानीं भवति भरत
अभ्युत्थानम् अधर्मस्य
तदात्मनम् श्रीजाम्यहम्
अथार्त: जब भी धार्मिकता में गिरावट और पापाचार में वृद्धि होती है,
हे अर्जुन, उस समय मैं स्वयं को पृथ्वी पर प्रकट होता हूं।
परित्राणाय सौधुनाम्
विनशाय च दुष्कृताम्
धर्मसंस्था पन्नार्थाय
संभवामि युगे युगे
अथार्त: धर्मियों की रक्षा के लिए, दुष्टों का सफाया करने के लिए,
और इस धरती पर दिखने वाले धर्म के सिद्धांतों को फिर से स्थापित करने के लिए, युगों-युगों तक।
नैनम चिंदंति शास्त्राणि
नैनम देहाति पावकाः
न चैनम् केलदयंत्यपापो
ना शोषयति मारुताः
अथार्त: हथियार आत्मा को नहीं हिला सकते हैं, न ही इसे जला सकते हैं।
पानी इसे गीला नहीं कर सकता और न ही हवा इसे सुखा सकती है।
सुखदुक्खे समान कृतवा
लभलाभौ जयाजयौ
ततो युधाय युज्यस्व
निवम पापमवाप्स्यसि
अथार्त: कर्तव्य के लिए लड़ो, एक जैसे सुख और संकट, हानि और लाभ, जीत और हार का इलाज करो। इस तरह अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने से आप कभी पाप नहीं करेंगे।
अहंकारम बलम दरपम
कामम क्रोधम् च समश्रितः
महामातं परमदेषु
प्रदविष्णो अभ्यसुयाकः
अथार्त: अहंकार, शक्ति, अहंकार, इच्छा और क्रोध से अंधा, राक्षसी ने अपने शरीर के भीतर और दूसरों के शरीर में मेरी उपस्थिति का दुरुपयोग किया।
🙏 भजन का विस्तृत अर्थ और भावार्थ (Lyrics Meaning)
यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "यदा यदा ही धर्मस्य श्लोक का अर्थ सहित लिरिक्स (Yada Yada Hi Dharmasya Sloka Ka Arth Sahit Lyrics in Hindi) - Bhaktilok" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।
भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।
🔍 भजन का विशेष महत्त्व और आध्यात्मिक लाभ (Significance)
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।
🕒 साधना एवं गायन विधि (Chanting Rules)
भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।
भजनों को गाने की सही विधि क्या है?
भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।
क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?
हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।
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