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भक्ति रस काव्य व भजन

एक दिन वो भोले भंडारी बन कर के ब्रिज की नारी गोकुल में आ गये है लिरिक्स || Ek din vo bhole bhandaaree ban kar ke brige kee naaree gokul mein aa gayee hai lyrics in hindi || Bhaktilok

66 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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भोले भंडारी का गोकुल आगमन

इस भक्ति गीत के माध्यम से श्री कृष्ण के अनंत प्रेम और भक्ति का अनुभव करें।

एक दिन वो भोले भंडारी, बन कर के ब्रिज की नारी, गोकुल में आ गये हैं पारवती भी मना कर हारी, ना माने त्रिपुरारी, गोकुल में आ गये हैं पारवती से बोले मैं भी चालु गा तेरे संग में, राधा संग श्याम नाचे मैं भी नाचूगा तेरे संग में, रास रचे गा ब्रिज में भारी, हमें दिखो प्यारी ,गोकुल में आ गये हैं एक दिन वो भोले भंडारी, बन कर के ब्रिज की नारी, गोकुल में आ गये हैं ओ मेरे भोले स्वामी, कैसे ले जाओ तोहे साथ में, मोहन के सिवा वहा, कोई पुरस ना जाये रास में, हँसी करेंगी ब्रिज की नारी मान लो बात हमारी, गोकुल में आ गये हैं एक दिन वो भोले भंडारी, बन कर के ब्रिज की नारी, गोकुल में आ गये हैं ऐसा बनादो मुझे को कोई न जाने इस राज को, मैं हु सहेली तेरी इसा बताना ब्रिज राज को, बना के जुड़ा पेहन के साड़ी चाल चले मत वाली, एक दिन वो भोले भंडारी, बन कर के ब्रिज की नारी, गोकुल में आ गये हैं.

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह भजन भक्तों को श्री कृष्ण के प्रति उनकी अनन्य भक्ति और प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए प्रेरित करता है। इसकी आरंभिक पंक्तियाँ, 'एक दिन वो भोले भंडारी बन कर के ब्रिज की नारी, गोकुल में आ गये हैं', यह संकेत देते हैं कि भगवान शिव, जो भोलेनाथ के नाम से भी जाने जाते हैं, ने गोकुल में अपने प्रिय राधा-कृष्ण के साथ भक्ति की एक नई लीला में भाग लिया। यह प्रयोग दर्शाता है कि भगवान शिव अपने भक्तों के साथ गोकुल में आकर राधा-कृष्ण का नृत्य और रास में सम्मिलित होना चाहते हैं। यह भजन विचारशीलता और भक्ति का अद्वितीय संयोग है।

गीत में पार्वती का आध्यात्मिक संकेत है जो अपने पति भगवान शिव के अनुनय में प्रतीक है। उनके बीच का संवाद भक्ति के गहन अर्थ को दर्शाता है कि जब भक्त सच्चे दिल से अपने ईश्वर को पुकारते हैं, तो भगवान भी अपने भक्तों की पुकार सुनते हैं। यहाँ भगवान शिव ने न सिर्फ पार्वती की बातों को स्वीकार किया, बल्कि प्रेम में राधा और कृष्ण के साथ नाचने की इच्छा प्रकट की, जो यह दिखाता है कि ईश्वर खुद को भक्ति में डुबो देने में कभी संकोच नहीं करते। यह भाव भक्तों को अपने प्रेम से भर देता है।

इस भजन में भक्ति मार्ग का एक गहन अनुभव छिपा है। भगवान शिव की ब्रिज में नारी के रूप में प्रस्तुति दर्शाती है कि सभी देवता मानवता के साथ मधुर संबंध स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं। यह भक्ति मार्ग की उपलब्धता को भी दर्शाता है जहाँ भक्त गोकुल में गोपियों के संग राधा और कृष्ण के रास में शामिल हो सकते हैं। यद्यपि यह भक्ति का एक अनूठा मार्ग है, यह दर्शाता है कि सभी ईश्वर भक्ति का आदान-प्रदान करके अपने भक्तों के साथ मधुर संबंध बनाते हैं।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

इस भजन का महत्व हमारे शास्त्रों में गहरी धार्मिक कृतियों से जुड़ा हुआ है। विशेष रूप से, यह भजन महाभारत और पुराणों में वर्णित राधा-कृष्ण के लीला से संबंधित है। राधा-कृष्ण का प्रेम दर्शाता है कि सच्चे प्रेम और भक्ति से सभी विघ्नों का नाश होता है। यह गीत हमारे अंदर एक प्रेमानुभूति को जगाता है, जो हमें अपने जातीय संबंधों और ईश्वरीय प्रेम की ओर ले जाता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का पाठ करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है, साथ ही भक्ति और श्रद्धा का अनुभव होता है। नियमित रूप से इसे गाने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, औऱ भक्त का मन शांत और स्थिर रहता है। यह मन को एकाग्र करने में भी सहायता करता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का पाठ सुबह या शाम के समय करना सर्वोत्तम माना जाता है। पाठ करते समय एक दीया जलाएं और अपने मन में प्रेम और समर्पण का भाव रखें। सही मुद्रा में बैठकर ध्यान लगाना चाहिए ताकि भक्ति का अनुभव गहराई से हो सके।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन का मूल संदेश क्या है?

इस भजन का मूल संदेश भगवान शिव का राधा-कृष्ण के साथ प्रेम और भक्ति का अद्वितीय समर्पण है। यह भक्तों को अपने ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति की प्रेरणा देता है।

क्या भगवान शिव का राधा-कृष्ण से कोई विशेष संबंध है?

हां, भगवान शिव और राधा-कृष्ण का संबंध पारंपरिक भारतीय पौराणिक कथाओं में अत्यधिक महत्वपूर्ण है। शिव भक्तों को राधा-कृष्ण के प्रेम में शामिल होने का मार्ग प्रदान करते हैं।

भजन का पाठ कैसे किया जाना चाहिए?

भजन का पाठ ध्यान और श्रद्धा के साथ करना चाहिए, preferably सुबह या शाम के समय। दीया जलाने और सच्चे मन से भक्ति करने से इसका प्रभाव बढ़ता है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 23 Aug 2026

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