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भक्ति रस काव्य व भजन

जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी देख तमाशा लकड़ी का लिरिक्स (jeet bhee lakadee marate bhee lakadee dekh tamaasha lakadee ka lyrics in hindi) - bhaktilok

68 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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लकड़ी का अद्भुत तत्त्व: जीवन और मरण का खेल

इस भजन में जीवन की अस्थायित्व को दर्शाते हुए, लकड़ी के माध्यम से एक गहन निहितार्थ प्रस्तुत किया गया है।

जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी,देख तमाशा लकड़ी का,क्या जीवन क्या मरण कबीरा,खेल रचाया लकड़ी का,जिसमे तेरा जनम हुआ,वो पलंग बना था लकड़ी का,माता तुम्हारी लोरी गाए,वो पलना था लकड़ी का,जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी,देख तमाशा लकड़ी का,पड़ने चला जब पाठशाला में,लेखन पाठी लकड़ी का,गुरु ने जब जब डर दिखलाया,वो डंडा था लकड़ी का,जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी,देख तमाशा लकड़ी का,जिसमे तेरा ब्याह रचाया,वो मंडप था लकड़ी का,जिसपे तेरी शैय्या सजाई,वो पलंग था लकड़ी का,जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी,देख तमाशा लकड़ी का,डोली पालकी और जनाजा,सबकुछ है ये लकड़ी का,जनम-मरण के इस मेले में,है सहारा लकड़ी का,जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी,देख तमाशा लकड़ी का,उड़ गया पंछी रह गई काया,बिस्तर बिछाया लकड़ी का,एक पलक में ख़ाक बनाया,ढ़ेर था सारा लकड़ी,जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी,देख तमाशा लकड़ी का,मरते दम तक मिटा नहीं भैया,झगड़ा झगड़ी लकड़ी का,राम नाम की रट लगाओ तो,मिट जाए झगड़ा लकड़ी का,जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी,देख तमाशा लकड़ी का,क्या राजा क्या रंक मनुष संत,अंत सहारा लकड़ी का,कहत कबीरा सुन भई साधु,ले ले तम्बूरा लकड़ी का,जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी,देख तमाशा लकड़ी का,

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन के माध्यम से कवि कबीर ने जीवन और मृत्यु के स्थायी तत्त्व को बड़े ही सरल और भावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया है। वह जीवन के हर पहलू का संबंध लकड़ी से जोड़ते हैं। 'जीते भी लकड़ी मरते भी लकड़ी' के मान से यह स्पष्ट होता है कि हमारे जीवन में लकड़ी का उपयोग एक प्रतीक के रूप में किया गया है। यह दर्शाता है कि जीवन का आधार भौतिक वस्तुओं पर निर्भर है, और जब हम जन्मते हैं, तो यह लकड़ी हमें सहारा देती है। जन्म से लेकर सम्मानित समारोहों, व्याह, और शोक की घड़ियों में लकड़ी की उपयोगिता का जिक्र किया गया है, जैसे पलंग, मंडप, डोली और जनाजा आदि। यह हमें यह भी समझाता है कि जीवन में सुख-दुख, समृद्धि और अव्यवस्था लकड़ी के समान अपरिवर्तनीय होते हैं।

इस भजन का भावार्थ गहन और प्रभावशाली है। कबीर कहते हैं कि जब मानव जीवन का अंत आता है, तो सारी भौतिक वस्तुएँ अर्थहीन बन जाती हैं। 'उड़ गया पंछी, रह गई काया' यह पंक्ति हमें यह समझाने का प्रयास करती है कि आत्मा की यात्रा एक अंतिम गंतव्य की ओर होती है, और इस जीवन में जो चीजें हमारे लिये मूल्यवान होती हैं, वे सच में अस्थायी हैं। इस संदर्भ में पाठशाला और गुरु का भी जिक्र किया गया है; यह बताने के लिए कि शिक्षा और ज्ञान भी लकड़ी के मानिंद हैं, जो हमें मार्गदर्शन देने का कार्य करते हैं। यह भजन जीवन की पर्यावरणीय अस्थाई पद्धति की ओर ईशारा करता है।

भक्ति मार्ग पर यह भजन एक विशेष महत्व रखता है। कबीर का यह संदेश न केवल भौतिकता पर निर्भरता को दर्शाता है, बल्कि आत्मिक जागरूकता की ओर भी ले जाता है। 'राम नाम की रट लगाओ' वाले संदेश के माध्यम से, कवि बताना चाहते हैं कि केवल भक्ति और भगवान का नाम जपने से मन की अशांति समाप्त होती है। यह भजन हमें सिखाता है कि भक्ति किसी भी परिस्थिति में मानसिक संतुलन बनाए रखने का और अंतिम मुक्ति का साधन हो सकता है। इस दृष्टिकोण से भक्ति मार्ग का अनुसरण करना मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

इस भजन का विशेष संदर्भ भारतीय दर्शन की अद्भुतता में छिपा हुआ है। कबीर द्वारा की गई रचनाएँ काव्य के माध्यम से गूढ़ संवेदनाओं को उजागर करती हैं। पौराणिक कथाओं में जीवन और मृत्यु के बीच का संबंध अक्सर कहा गया है। भगवद गीता में भी इसीलिए आत्मा की अमरता को दर्शाया गया है। जनम-मरण का यह चक्र हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है, और कबीर का संदेश हमें इस चक्र को समझने और स्वीकारने की आवश्यकता को उजागर करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का पाठ करने से मन को स्थिरता और शांति प्राप्त होती है। यह सकारात्मक ऊर्जा को संचारित करता है और जीवन में संतोष की भावना जगाता है। मानसिक तनाव और अवसाद को कम करने में सहायक हो सकता है। नियमित रूप से इस भजन का जाप आत्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का पाठ सुबह या शाम के समय करना सबसे उत्तम होता है। पूजा स्थल पर दीया जलाकर, फूलों का चढ़ावा देकर और एक सजग मन से इस भजन का पाठ करना चाहिए। बैठने का आसन सीधा और आरामदायक होना चाहिए, जिससे ध्यान केंद्रित किया जा सके। मानसिक साफ-सफाई और एकाग्रता से भजन का पाठ करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?

इस भजन का मुख्य संदेश जीवन और मृत्यु की अस्थायित्व को दर्शाना है, जिसमें लकड़ी का रूपक इस्तेमाल किया गया है।

कबीर के इस भजन को कब और कैसे गाना चाहिए?

इस भजन को सुबह या शाम के समय बैठकर, शांत मन से गाना चाहिए। पूजा में दीपक जलाकर, मानसिक एकाग्रता के साथ इसका जाप करना आवश्यक है।

यह भजन किस प्रकार के लाभ प्रदान करता है?

इस भजन का पाठ मानसिक शांति, सकारात्मकता और आत्मिक उन्नति के लिए लाभकारी है, जो तनाव और अवसाद को कम करने में सहायक है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 21 Aug 2026

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