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एकाम्रक क्षेत्र क्या है? ब्रह्म पुराण से जानें (What is Ekamra Kshetra? Know from Brahma Purana)

70 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

🛕 एकाम्रक क्षेत्र: भुवनेश्वर का प्राचीन स्वरूप

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

ब्रह्म पुराण से जानें इसकी महिमा (Ekamra Kshetra in Brahma Purana)

भगवान शिव की नगरी का दिव्य माहात्म्य

🌟 एकाम्रक क्षेत्र क्या है? (परिचय)

एकाम्रक क्षेत्र वह पवित्र भूमि है जिसे आज हम भुवनेश्वर के नाम से जानते हैं – उड़ीसा (ओडिशा) की राजधानी। यह क्षेत्र भगवान शिव को समर्पित है और यहाँ स्थित लिंगराज मंदिर विश्व प्रसिद्ध है। 'एकाम्रक' का अर्थ है 'एक आम का वृक्ष'। पौराणिक कथा के अनुसार, यहाँ एक आम के वृक्ष के नीचे स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ था, जिसके कारण इस क्षेत्र का नाम एकाम्रक पड़ा।

ब्रह्म पुराण में इस क्षेत्र का विस्तृत वर्णन मिलता है। 'एकाम्र पुराण' के नाम से भी जाना जाने वाला यह ग्रंथ ब्रह्म पुराण का ही एक भाग है, जिसमें एकाम्रक क्षेत्र के माहात्म्य, तीर्थों, मंदिरों और पौराणिक घटनाओं का वर्णन है। यह क्षेत्र सदियों से शैव भक्तों का प्रमुख केंद्र रहा है।

📖 ब्रह्म पुराण में एकाम्रक क्षेत्र

ब्रह्म पुराण के अंतर्गत 'एकाम्रक क्षेत्र माहात्म्य' नामक एक विशेष खंड है। इसमें बताया गया है कि कैसे भगवान शिव ने इस स्थान को अपनी निवासभूमि बनाया। पुराण के अनुसार, जब देवताओं और राक्षसों ने समुद्र मंथन किया, तब निकले विष को भगवान शिव ने ग्रहण किया। उसके बाद वे इस क्षेत्र में विश्राम करने आए और यहाँ तपस्या की।

ब्रह्म पुराण में उल्लेख है कि एकाम्रक क्षेत्र में पाँच कोस (लगभग 10 मील) के दायरे में स्थित सभी तीर्थ, सरोवर और मंदिर अत्यंत पुण्यदायी हैं। यहाँ की प्रत्येक भूमि शिवमय है। विशेष रूप से बिंदुसागर सरोवर का उल्लेख मिलता है, जिसकी उत्पत्ति भगवान विष्णु के पसीने की बूंदों से हुई थी।

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ब्रह्म पुराण
एकाम्र क्षेत्र माहात्म्य

📌 श्लोक: "एकाम्रकं समासाद्य शिवलोकं स गच्छति।" अर्थात् एकाम्रक क्षेत्र में आकर मनुष्य शिवलोक को प्राप्त होता है।

🛕 लिंगराज मंदिर: एकाम्रक का हृदय

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लिंगराज मंदिर एकाम्रक क्षेत्र का प्रमुख मंदिर है, जो भगवान शिव को 'लिंगराज' (लिंग के राजा) के रूप में समर्पित है। यह मंदिर 11वीं शताब्दी में सोमवंशी राजाओं द्वारा बनवाया गया था, लेकिन इसका धार्मिक महत्व उससे भी प्राचीन है। ब्रह्म पुराण के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ था।

मंदिर की वास्तुकला कलिंग शैली का उत्कृष्ट नमूना है। यहाँ का मुख्य शिवलिंग पार्थिव (मिट्टी) का न होकर चट्टान से निर्मित माना जाता है। मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिर भी हैं, जिनमें पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और अन्य देवी-देवता विराजमान हैं।

"यहाँ का शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है – सुबह सूर्य के समान लाल, दोपहर काले और शाम को सुनहरे रंग का हो जाता है।" – यह स्थानीय मान्यता है।

💧 बिंदुसागर: पवित्र सरोवर

बिंदुसागर एक विशाल मानव निर्मित सरोवर है, जो लिंगराज मंदिर के पश्चिम में स्थित है। ब्रह्म पुराण के अनुसार, इस सरोवर की उत्पत्ति भगवान विष्णु के पसीने की बूंदों से हुई थी। एक अन्य कथा के अनुसार, सभी तीर्थों का जल यहाँ एकत्रित है, इसलिए इसे 'बिंदुसागर' (बूंदों का सागर) कहा जाता है।

🚩 धार्मिक मान्यता

बिंदुसागर में स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। कहा जाता है कि यहाँ डुबकी लगाने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह सरोवर कई छोटे मंदिरों से घिरा हुआ है, जिनमें अनंत वासुदेव मंदिर प्रमुख है।

🌊 पर्व और उत्सव

शिवरात्रि, अशोकाष्टमी, और कार्तिक पूर्णिमा पर बिंदुसागर के घाटों पर भव्य आयोजन होते हैं। अशोकाष्टमी के दिन भगवान लिंगराज की रथयात्रा निकलती है, जो बिंदुसागर के चारों ओर घूमती है।

🥭 पौराणिक कथा: एकाम्र (आम) की उत्पत्ति

एकाम्रक क्षेत्र के नामकरण की पौराणिक कथा बहुत रोचक है। एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने विवाह करने का निश्चय किया। लेकिन विवाह के लिए उचित स्थान की खोज में देवता चिंतित थे। तब भगवान ब्रह्मा ने एक आम के वृक्ष का निर्माण किया और उसके नीचे यज्ञ वेदी बनाई। इसी स्थान पर शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के उपलक्ष्य में वहाँ एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ, जिसे 'लिंगराज' के नाम से जाना गया।

एक अन्य कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने इस स्थान पर घोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अपना अर्धांग (अर्धनारीश्वर) बना लिया। यह स्थान आज भी 'एकाम्रक' कहलाता है क्योंकि यहाँ प्राचीन काल में एक विशाल आम का वृक्ष था, जिसके नीचे शिवलिंग विराजमान था।

यह वृक्ष आज भी मंदिर परिसर में स्थित है, हालाँकि अब वह प्राचीन वृक्ष नहीं रहा, लेकिन उसकी स्थान पर नया वृक्ष लगा दिया गया है, जिसे श्रद्धालु पूजते हैं।

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पवित्र आम वृक्ष

🔱 एकाम्रक क्षेत्र का धार्मिक महत्व

  • मोक्षदायिनी नगरी: ब्रह्म पुराण में एकाम्रक को 'मोक्षदा' (मोक्ष देने वाली) कहा गया है। यहाँ मृत्यु के पश्चात मुक्ति निश्चित है।
  • पंचक्रोशी यात्रा: लिंगराज मंदिर से शुरू होकर आसपास के पवित्र स्थानों की परिक्रमा, जिसे 'पंचक्रोशी यात्रा' कहते हैं, का विशेष महत्व है। यह यात्रा पाँच कोस की दूरी तय करती है और इसमें कई तीर्थों का समावेश होता है।
  • शैव और वैष्णव समन्वय: एकाम्रक क्षेत्र में शैव और वैष्णव दोनों परंपराओं के मंदिर हैं, जो धार्मिक सद्भाव का प्रतीक हैं। लिंगराज मंदिर में भगवान विष्णु को भी स्थान दिया गया है (अनंत वासुदेव)।
  • तीर्थराज: यहाँ बिंदुसागर के अलावा कोटितीर्थ, मार्कंडेय सरोवर, पापनाशिनी तालाब जैसे अनेक पवित्र जलाशय हैं।

⛩️ एकाम्रक क्षेत्र के अन्य प्रमुख मंदिर

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मुक्तेश्वर मंदिर

10वीं शताब्दी का यह मंदिर कलिंग वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है।

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राजारानी मंदिर

अपनी मूर्तिकला और सुंदरता के लिए प्रसिद्ध, इसे 'सौन्दर्य का मंदिर' कहा जाता है।

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ब्रह्मेश्वर मंदिर

9वीं शताब्दी में निर्मित, यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।

🏙️ आधुनिक भुवनेश्वर में एकाम्रक क्षेत्र

आज का भुवनेश्वर ओडिशा की राजधानी है और एक तेजी से विकसित होता शहर है। लेकिन पुराना शहर, जहाँ लिंगराज मंदिर स्थित है, आज भी अपनी प्राचीनता और पवित्रता को संजोए हुए है। एकाम्रक क्षेत्र को अब 'ओल्ड टाउन' (पुराना शहर) कहा जाता है।

राज्य सरकार और निजी संस्थाओं द्वारा 'एकाम्र क्षेत्र विकास परियोजना' के तहत इस क्षेत्र को संरक्षित और विकसित किया जा रहा है, ताकि तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को बेहतर सुविधाएँ मिल सकें।

❓ एकाम्रक क्षेत्र से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: एकाम्रक क्षेत्र कहाँ स्थित है?

उत्तर: यह ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित है, जो लिंगराज मंदिर के आसपास का क्षेत्र है।

प्रश्न 2: एकाम्रक क्षेत्र का वर्णन किस पुराण में मिलता है?

उत्तर: ब्रह्म पुराण (एकाम्र पुराण) में इसका विस्तृत वर्णन है।

प्रश्न 3: लिंगराज मंदिर का निर्माण कब हुआ?

उत्तर: वर्तमान मंदिर 11वीं शताब्दी में सोमवंशी राजाओं द्वारा बनवाया गया, लेकिन इस स्थान का महत्व उससे भी पुराना है।

प्रश्न 4: बिंदुसागर में स्नान का क्या महत्व है?

उत्तर: ऐसी मान्यता है कि बिंदुसागर में डुबकी लगाने से सभी पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

प्रश्न 5: यहाँ कौन-कौन से प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं?

उत्तर: महाशिवरात्रि, अशोकाष्टमी (रथयात्रा), कार्तिक पूर्णिमा, और संक्रांति के अवसर पर विशेष आयोजन होते हैं।

📝 एकाम्रक क्षेत्र की आध्यात्मिक यात्रा

एकाम्रक क्षेत्र न केवल भुवनेश्वर का प्राचीन नाम है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता का जीवंत केंद्र है। ब्रह्म पुराण में वर्णित इस क्षेत्र की महिमा आज भी उतनी ही अटल है। हज़ारों वर्षों से श्रद्धालु यहाँ आते हैं और भगवान लिंगराज के दर्शन से कृतार्थ होते हैं।

यदि आप कभी ओडिशा जाएँ, तो एकाम्रक क्षेत्र के दर्शन अवश्य करें। बिंदुसागर के घाटों पर बैठकर सूर्यास्त देखना, मंदिरों की वास्तुकला को निहारना, और उस पवित्र मिट्टी में अपने आपको खो देना – यह अनुभव अविस्मरणीय रहेगा।

🙏 ॐ नमः शिवाय ।। हर हर महादेव ।।

🛕 एकाम्रक क्षेत्र: ब्रह्म पुराण के अनुसार
जहाँ शिव बसते हैं सदा

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "एकाम्रक क्षेत्र क्या है? ब्रह्म पुराण से जानें (What is Ekamra Kshetra? Know from Brahma Purana)" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 21 Aug 2026

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