🙏 नन्दी पे हो के सवार भोला जी चले दुल्हा बनके – भोलेनाथ की बारात
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(Nandi Pe Ho Ke Sawaar Bhole Ji Chale Dulha Ban Ke) – शिव भजन
📖 परिचय – भोलेनाथ के विवाह की मधुर झाँकी
“नन्दी पे हो के सवार भोला जी चले दुल्हा बनके” – यह लोकप्रिय शिव भजन भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य विवाह (शिव विवाह) के उल्लास, आनंद और भक्ति भाव को चित्रित करता है। इसमें भोलेनाथ अपने वाहन नन्दी पर सवार होकर दूल्हे के रूप में कैलास से मंडप की ओर प्रस्थान करते हैं। हर पंक्ति में बम-बम भोले के जयकारों के साथ देवाधिदेव के रूप, उनकी सादगी, उन्मुक्तता और करुणा की झलक मिलती है।
यह भजन विशेष रूप से सावन मास, महाशिवरात्रि और विवाह के अवसरों पर गाया जाता है। इसकी धुन और बोल श्रोताओं को सीधे भोलेनाथ की बारात में ले जाते हैं – जहाँ नन्दी के घुँघरू छम-छम करते हैं, डमरू डम-डम बजता है, भूत-प्रेत बराती बन जाते हैं, और माता गौरा (पार्वती) अपने मायके में स्वागत को आतुर हैं।
इस लेख में हम इस भजन की सम्पूर्ण लिरिक्स (हिंदी लिपि में), हर पंक्ति का भावार्थ, इससे जुड़ी पौराणिक कथा, नैतिक शिक्षा, और आध्यात्मिक संदेश प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही FAQ सेक्शन में Google FAQ Schema भी जोड़ा गया है। आइए, भोले के इस भक्ति भजन में रमते हैं।
📜 शिव भजन लिरिक्स – नन्दी पे हो के सवार भोला जी चले दुल्हा बनके
नन्दी पे हो के सवार भोला जी चले दुल्हा बनके
नन्दी पे हो के सवार
नन्दी पे, हो के सवार,
भोला जी, चले दुल्हा बनके ॥
भोला जी, चले दुल्हा बनके
भोला जी, चले दुल्हा बनके ॥
खा के, धतुरा और भांग... ( बम भोले ) ॥
भोले जी, चले दुल्हा बनके...
नन्दी पे, हो के सवार...
अंतरा १
नन्दी, का घूंघरू, छम-छम बोले ॥
भोले, जी का डमरू, डम डम बोले ॥
कांधे पे, नाचे काला नाग़... ( बम भोले ) ॥
भोला जी, चले दुल्हा बनके...
नन्दी पे, हो के सवार...
अंतरा २
भूत, प्रेतों का, देख बराती ।
सारे, नगर में, भगदड़ मची ॥
मच गया, हा हा कार... ( बम भोले ) ॥
भोला जी, चले दुल्हा बनके...
नन्दी पे, हो के सवार...
अंतरा ३
गौरां, की माता, स्वागत को आई ॥
देख के, भोले को, वोह घबराई ॥
हाथों से, छुट गयो थाल... ( बम भोले ) ॥
भोला जी, चले दुल्हा बनके...
नन्दी पे, हो के सवार...
अंतरा ४
गौरां, री तेरी, किस्मत खोटी ।
दूल्हा, सौ बर्ष, तेरी आयु छोटी ॥
कैसे, निभाएगी साथ... ( बम भोले ) ॥
भोला जी, चले दुल्हा बनके...
नन्दी पे, हो के सवार...
अंतरा ५
गौरां ने, माँ को, समझाया ।
तीन, लोक का, नाथ है आया ॥
भरे, सब के वो भंडार... ( बम भोले ) ॥
भोला जी, चले दुल्हा बनके...
नन्दी पे, हो के सवार...
अंतरा ६
नारद, जी उठ, बोले माता ।
भोले, हैं सारे, जग के विधाता ॥
गौरां के, खुल गयो भाग... ( बम भोले ) ॥
भोला जी, चले दुल्हा बनके...
नन्दी पे, हो के सवार...
अंतरा ७
भोला, जी पहुंचे, मंडप माहीं ।
लगन, की देखो, हुई तैयारी ॥
फेरे हुए, गौरां के साथ... ( बम भोले ) ॥
भोला जी, चले दुल्हा बनके...
नन्दी पे, हो के सवार...
✍️ रचनाकार :- लोक परंपरा – शिव भक्ति गीत
🔍 भजन का अर्थ (लाइन-बाय-लाइन व्याख्या)
- नन्दी पे हो के सवार भोला जी चले दुल्हा बनके: भगवान शिव (भोला) अपने वाहन नन्दी (बैल) पर सवार होकर दूल्हे के वेश में विवाह मंडप की ओर चल पड़े। यह पंक्ति शिव के सरल, निर्लेप और ग्रामीण रूप को दर्शाती है।
- खा के धतुरा और भांग (बम भोले): शिव को प्रिय धतूरा और भांग का उल्लेख – वे सहज भाव से यह सब ग्रहण करते हुए दुल्हा बनकर चलते हैं। ‘बम भोले’ उनके नाम का जयघोष है।
- नन्दी का घूंघरू छम-छम बोले, भोले जी का डमरू डम डम बोले: नन्दी के घुँघरुओं की मधुर ध्वनि और शिव के डमरू की गूंज से वातावरण दिव्य बन जाता है।
- कांधे पे नाचे काला नाग: शिव के गले में सर्प (काला नाग) लिपटा है जो उनके ऊपर नाचता हुआ प्रतीत होता है – यह मृत्यु और काल पर उनके नियंत्रण का प्रतीक है।
- भूत-प्रेतों का देख बराती: शिव की बारात में भूत-प्रेत भी शामिल हैं – यह दिखाता है कि प्रभु सभी के स्वामी हैं, कोई उनके द्वार से वंचित नहीं।
- गौरां की माता स्वागत को आई, देख के भोले को वो घबराई: पार्वती माता (गौरा) की माँ (मैनावती) शिव को देखकर घबरा जाती हैं क्योंकि उनका रूप वैरागी जैसा है – भस्म लगाए, सर्प धारी, जटाधारी।
- गौरां री तेरी किस्मत खोटी, दूल्हा सौ बर्ष तेरी आयु छोटी: माता मैनावती शंका करती हैं कि ऐसे दूल्हे के साथ पार्वती का सुखी जीवन कैसे बीतेगा? (यह लोक भावना का हिस्सा है, अंत में नारद जी समझाते हैं कि शिव तीन लोक के नाथ हैं।)
- गौरां ने माँ को समझाया – तीन लोक का नाथ है आया: पार्वती अपनी माँ को बताती हैं कि यह साधारण दूल्हा नहीं, बल्कि सारे ब्रह्मांड के स्वामी हैं।
- नारद जी उठ बोले माता – भोले हैं सारे जग के विधाता: देवर्षि नारद पुष्टि करते हैं कि भोलेनाथ ही सृष्टि के रचयिता, पालक और संहारक हैं।
- भोला जी पहुँचे मंडप माहीं, फेरे हुए गौरां के साथ: शिव मंडप पहुँचते हैं और माता पार्वती के साथ विवाह के फेरे लेते हैं – यह शिव-शक्ति के अभिन्न मिलन का प्रतीक है।
📖 भजन की प्रेरणा और पृष्ठभूमि
यह भजन उत्तर भारत विशेषकर हिमाचल, उत्तराखंड, पंजाब और बिहार के गाँवों में शिव-पार्वती विवाह के अवसर पर पीढ़ियों से गाया जाता रहा है। इसकी रचना किसी एक व्यक्ति ने नहीं, बल्कि यह लोक-परंपरा का हिस्सा है। मान्यता है कि जब भी कोई कन्या विवाह योग्य होती है और उसके परिवार वाले शिव विवाह का आयोजन करते हैं, तो इस गीत को गाने से घर में सुख-समृद्धि आती है और भगवान शिव की कृपा बनी रहती है।
विशेष रूप से महाशिवरात्रि की रात्रि में भक्त इस भजन को भाव-विभोर होकर गाते हैं और स्वयं को उस दिव्य बारात का हिस्सा मानते हैं। भजन की सरल भाषा और राग-युक्त धुन लोगों को झूमने पर मजबूर कर देती है।
🌟 पौराणिक कथा: शिव का दुल्हा बनकर आगमन और मैनावती का संदेह
पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता पार्वती (गौरा) ने कठोर तपस्या करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया, तो हिमालय राजा (गिरिराज) और उनकी पत्नी मैनावती ने शिव विवाह की तैयारी आरंभ की। लेकिन जब शिव अपने बारातियों (भूत, प्रेत, गण, योगी) और नन्दी पर सवार होकर बारात लेकर पहुँचे, तो मैनावती उनके वैरागी, भस्म-भूषित रूप को देखकर चिंतित हो गईं। उन्होंने सोचा कि क्या यह व्यक्ति मेरी बेटी पार्वती के योग्य है? तब पार्वती ने और फिर नारद मुनि ने उन्हें समझाया कि यही भगवान शिव हैं, जो तीनों लोकों के स्वामी हैं। अंततः मैनावती ने अपनी गलती मानी और हर्षोल्लास के साथ विवाह संपन्न हुआ।
नैतिक शिक्षा: बाहरी रूप-रंग को देखकर किसी के महत्व का आकलन नहीं करना चाहिए। सच्चा वैभव आंतरिक दिव्यता में होता है। शिव का सादा रूप भी समस्त ब्रह्मांड का आधार है।
🤝 इस भजन का वास्तविक जीवन में महत्व
आज के समय में भी यह भजन शिव भक्तों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है। महाशिवरात्रि के मेलों, शिव मंदिरों में भजन संध्या, और विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में विवाह के अवसर पर इसे बड़े चाव से गाया जाता है। यह गीत हमें सिखाता है कि समाज के तथाकथित ‘भूत-प्रेत’ या उपेक्षित वर्ग भी प्रभु की बारात में शामिल हैं – अतः किसी से भेदभाव न करें।
जब हम जीवन में मुश्किलों का सामना करते हैं, तो शिव के इस दुल्हा रूप का ध्यान करने से साहस और सकारात्मकता आती है। भजन में ‘बम भोले’ का उद्घोष हमारे मन के नकारात्मक विचारों को नष्ट करता है। यही कारण है कि लाखों लोग सावन मास में इस भजन को गाते हुए शिवालयों में जल चढ़ाते हैं।
🕉️ शिव श्लोक एवं नन्दी का महत्व
॥ ॐ नमः शिवाय ॥
कर्पूरगौरं करुणावतारं, संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे, भवं भवानीसहितं नमामि॥
अर्थ: हे करुणा के सागर, सफेद चंदन के समान गौर वर्ण, जिनके गले में सर्पों की माला है, जो हमेशा हृदय कमल में निवास करते हैं, उन भव (शिव) और भवानी (पार्वती) को नमन है।
नन्दी भगवान शिव के परम भक्त और वाहन हैं। वे धर्म, शक्ति और विश्वास के प्रतीक हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि जो भक्त नन्दी का पूजन करता है, उसकी मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं। इस भजन में नन्दी पर सवार होकर दुल्हा बनने का वर्णन भगवान के सहज स्वरूप और भक्तवत्सलता को दर्शाता है।
✨ इस भजन का आध्यात्मिक संदेश
- निर्विकारता में भी सम्पूर्णता: शिव भस्म लगाते हैं, सर्प धारण करते हैं, फिर भी वे देवाधिदेव हैं – यह सिखाता है कि बाहरी आवरण से कोई फर्क नहीं पड़ता, असली शक्ति आत्मा में है।
- हर प्राणी को समान मानना: भूत-प्रेतों को बारात में शामिल करना यह संदेश देता है कि परमात्मा के दर पर कोई छोटा-बड़ा नहीं होता।
- शिव-शक्ति का मिलन: शिव (चेतना) और पार्वती (शक्ति) का विवाह जीवन में संतुलन और सृजनात्मकता का प्रतीक है।
- व्याकुल प्रेम ही भगवान को बाँधता है: पार्वती के तप और प्रेम ने शिव को दुल्हा बनने पर विवश कर दिया – यह बताता है कि सच्ची भक्ति से ईश्वर भी साधारण हो जाते हैं।
🙏 बम भोले! हर हर महादेव! ॐ नमः शिवाय।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: यह भजन किस अवसर पर गाया जाता है?
उत्तर: यह भजन मुख्यतः महाशिवरात्रि, सावन मास, और शिव-पार्वती विवाह के अवसरों पर गाया जाता है। इसके अलावा किसी भी शुभ अवसर पर भोलेनाथ की भक्ति में इसे गाया जा सकता है।
प्रश्न 2: क्या इस भजन के बोल कहीं और उपलब्ध हैं?
उत्तर: हाँ, यह लोक भजन है, इसलिए इसके कई रूपांतर मिल जाएँगे। लेकिन हमने यहाँ सबसे प्रचलित और पूर्ण लिरिक्स प्रस्तुत किए हैं।
प्रश्न 3: “नन्दी पे हो के सवार” भजन का अर्थ क्या है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि भगवान शिव अपने वाहन नन्दी (बैल) पर सवार होकर दूल्हे के वेश में विवाह मंडप की ओर चल पड़े हैं। यह शिव के सरल, ग्रामीण एवं सहज रूप का चित्रण है।
प्रश्न 4: क्या यह भजन शास्त्रीय रूप से प्रमाणित है?
उत्तर: यह लोक भक्ति गीत है, पुराणों की कथा पर आधारित है, लेकिन इसे शास्त्रों का हिस्सा नहीं माना जाता। फिर भी शिवभक्तों में यह अत्यधिक श्रद्धा का पात्र है।
प्रश्न 5: क्या इस भजन को घर पर गा सकते हैं?
उत्तर: बिल्कुल! इसे पवित्रता और श्रद्धा के साथ घर पर गाने से सकारात्मक ऊर्जा आती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
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नोट: उपरोक्त लिंक Bhaktilok.in के वास्तविक पृष्ठों पर आधारित हैं, जो कि सक्रिय और सुरक्षित हैं।
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