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नीलांजनसमाभासं - Neelanjana Samabhasam Shani Mantra Lyrics in Hindi (शनि देव भजन)

185 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

🙏 नीलांजनसमाभासं – शनि देव का प्रबल मंत्र

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

(Neelanjana Samabhasam Shani Mantra) – शनि देव भजन

📜 प्राचीन दशरथ शनि स्तोत्र से लिया गया

📖 परिचय – शनि देव के प्रति भक्ति और करुण पुकार

शनि देव, जिन्हें न्याय के देवता और कर्मफल के दाता के रूप में पूजा जाता है, हर व्यक्ति के जीवन में विशेष स्थान रखते हैं। वे सूर्य पुत्र, यम के बड़े भ्राता और छाया व मार्तण्ड से उत्पन्न हैं। ज्योतिष शास्त्र में शनि को कर्मों का फल देने वाला ग्रह माना गया है। जब व्यक्ति अपने किए गए कर्मों के अनुसार शनि की दशा, साढ़ेसाती या ढैया से गुजरता है, तो उसे कष्ट, बाधाएं और धैर्य की परीक्षाएं आती हैं। लेकिन शनि देव निर्मोही और न्यायप्रिय हैं – वे भक्तों पर तभी प्रसन्न होते हैं जब भक्त सच्चे मन से उनका स्मरण करता है।

नीलांजनसमाभासं” यह अत्यंत प्रभावशाली शनि मंत्र प्राचीन काल से चला आ रहा है। मान्यता है कि त्रेता युग में राजा दशरथ ने इसी मंत्र से शनि देव को प्रसन्न करके अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति पाई थी। यह मंत्र न केवल शनि के कोप को शांत करता है, बल्कि जीवन में साहस, धैर्य और सफलता का मार्ग भी प्रशस्त करता है। इस लेख में हम इस पवित्र शनि स्तोत्र के सम्पूर्ण लिरिक्स, प्रत्येक पंक्ति का अर्थ, इसके पीछे की पौराणिक कथा, वास्तविक जीवन में इसका महत्व और आध्यात्मिक संदेश प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों (FAQs) के उत्तर भी दिए गए हैं। आइए, शनि देव के इस अद्भुत भजन में डूब जाएँ और उनकी कृपा प्राप्त करें।

📜 शनि मंत्र लिरिक्स (मूल संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद)

॥ शनि देव स्तोत्र ॥

ॐ ॐ ॐ ॐ
नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥


नमो नमो शनैश्चरम्
नमो नमो शनैश्चरम्
नमो नमो शनैश्चरम्


नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥


नमो नमो शनैश्चरम्
नमो नमो शनैश्चरम्
नमो नमो


नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥


नमो नमो शनैश्चरम्
नमो नमो शनैश्चरम्
नमो नमो


नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥


नमो नमो नमो नमो शनैश्चरम् नमो नमो
नमो नमो नमो नमो शनैश्चरम् नमो नमो


नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥


नमो नमो नमो नमो शनैश्चरम् नमो नमो
नमो नमो नमो नमो शनैश्चरम् नमो नमो


नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥


नमो नमो नमो नमो शनैश्चरम् नमो नमो
नमो नमो नमो नमो शनैश्चरम् नमो नमो


नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥


नमो नमो नमो नमो शनैश्चरम् नमो नमो
नमो नमो नमो नमो शनैश्चरम् नमो नमो


नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥


नमो नमो नमो नमो शनैश्चरम् नमो नमो
नमो नमो नमो नमो शनैश्चरम् नमो नमो

🔍 शनि मंत्र का अर्थ (लाइन-बाय-लाइन व्याख्या)

  • नीलांजनसमाभासं: जो नील अंजन (काला सुरमा) के समान आभा वाले हैं – अर्थात शनि देव का रंग नीला-काला है, जो उनकी गंभीरता और शक्ति का प्रतीक है।
  • रविपुत्रं: जो सूर्य देव के पुत्र हैं। शनि, सूर्य और छाया के पुत्र हैं।
  • यमाग्रजम्: जो यमराज के बड़े भाई हैं। यमराज मृत्यु के देवता हैं, और शनि उनसे वरिष्ठ हैं।
  • छायामार्तण्डसंभूतं: जो छाया और मार्तण्ड (सूर्य) से उत्पन्न हुए हैं।
  • तं नमामि शनैश्चरम्: उन शनैश्चर (धीमी गति से चलने वाले) को मैं नमन करता हूँ।
  • नमो नमो शनैश्चरम्: बार-बार शनि देव को प्रणाम। यह आवर्तन भक्त के समर्पण और विनम्रता को दर्शाता है।

सम्पूर्ण भावार्थ: हे शनि देव, आप नीले अंजन के समान कांतिमान हैं, सूर्य के पुत्र हैं, यमराज के बड़े भाई हैं, और छाया तथा सूर्य से उत्पन्न हुए हैं। उन धीमी गति से चलने वाले शनि देव को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।

📖 भजन की प्रेरणा और पृष्ठभूमि – राजा दशरथ की कथा

यह मंत्र “शनि दशरथ स्तोत्र” या “दशरथ शनि स्तोत्र” के नाम से प्रसिद्ध है। त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था, लेकिन उसी समय शनि देव की दशा उन्हें परेशान कर रही थी। उनके गुरु वशिष्ठ ने इस मंत्र का उपदेश दिया। राजा दशरथ ने विधिवत इस स्तोत्र का जप किया, जिससे शनि देव प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा को अकाल मृत्यु के भय से मुक्त कर दिया। तभी से यह मंत्र शनि के कोप को शांत करने और जीवन में सुख-शांति लाने के लिए जपा जाने लगा।

🌟 एक प्रेरक कथा: शनि की परीक्षा और भक्त की विजय

एक नगर में एक सज्जन व्यक्ति रहते थे जिनकी साढ़ेसाती चल रही थी। उन्हें हर क्षेत्र में असफलता मिल रही थी। तब उनके गुरु ने उन्हें यह “नीलांजनसमाभासं” मंत्र प्रतिदिन 108 बार जपने को कहा। उन्होंने पूरी श्रद्धा और नियम से 40 दिनों तक जप किया। धीरे-धीरे उनकी परेशानियाँ कम होने लगीं और अंततः शनि देव ने स्वप्न में दर्शन देकर उन्हें आशीर्वाद दिया।

स्पष्टीकरण: शनि देव कर्मों के हिसाब से फल देते हैं, लेकिन जब भक्त सच्चे मन से उनकी स्तुति करता है, तो वह कष्टों को कम करके जीवन में सकारात्मकता लाते हैं।

नैतिक शिक्षा: विपत्ति के समय धैर्य न खोएं, बल्कि ईश्वर की भक्ति और स्तुति में लगे रहें। सच्ची आस्था और नियमित जप हर कष्ट को दूर कर सकता है।

🤝 इस मंत्र का वास्तविक जीवन में महत्व

आज के समय में करियर, स्वास्थ्य, वित्तीय समस्याएँ और पारिवारिक कलह आम हैं। शनि की साढ़ेसाती या ढैया के दौरान लोग अत्यधिक तनाव का सामना करते हैं। “नीलांजनसमाभासं” मंत्र का नियमित जप न केवल शनि के बुरे प्रभावों को कम करता है, बल्कि आत्मविश्वास, धैर्य और सकारात्मक सोच को भी बढ़ाता है। कई लोगों ने अनुभव किया है कि इस मंत्र के जप से कार्यों में बाधाएँ दूर होती हैं, ऋण से मुक्ति मिलती है और मानसिक शांति प्राप्त होती है। इसे शनिवार के दिन विशेष रूप से जपने का महत्व है, लेकिन प्रतिदिन इसका पाठ करने से जीवन में स्थिरता और समृद्धि आती है।

🕉️ शनि स्तोत्र और शास्त्रीय संदर्भ

॥ शनि देव स्तुति ॥

नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।
छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥

यह श्लोक ब्रह्म वैवर्त पुराण, स्कन्द पुराण और पद्म पुराण में भी उल्लेखित है।


शनि देव को “शनैश्चर” (धीमी गति से चलने वाला) कहा जाता है क्योंकि उनकी गति अन्य ग्रहों की तुलना में मंद होती है। वे न्याय के देवता हैं, और उनकी आराधना से व्यक्ति अपने कर्मों का फल भोगकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता है। इस मंत्र का जप करते समय काले तिल, लोहा, या उड़द की दाल का दान करना विशेष फलदायी माना जाता है।

✨ इस मंत्र का आध्यात्मिक संदेश

यह मंत्र हमें सिखाता है कि जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन न्याय के देवता के प्रति समर्पण और भक्ति से हर कठिनाई को पार किया जा सकता है। शनि देव कर्मों का फल देते हैं – इसलिए हमें अच्छे कर्म करने चाहिए। इस मंत्र का नियमित जप हमें निम्नलिखित आध्यात्मिक गुण प्रदान करता है:

  • धैर्य: कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना।
  • विनम्रता: अपने कर्मों की जिम्मेदारी लेना और ईश्वर के प्रति विनम्र रहना।
  • साहस: बाधाओं का सामना करने की शक्ति।
  • आत्मविश्वास: सकारात्मक परिणाम में विश्वास।

ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः ॥

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: नीलांजनसमाभासं मंत्र क्या है?

उत्तर: यह शनि देव का एक प्राचीन और अत्यंत प्रभावशाली मंत्र है जो राजा दशरथ द्वारा जपा गया था। यह मंत्र शनि के अशुभ प्रभावों को शांत करता है और जीवन में सुख-समृद्धि लाता है।

प्रश्न 2: इस मंत्र का जप कब और कैसे करें?

उत्तर: इसे प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद या शनिवार के दिन विशेष रूप से जपना चाहिए। मंत्र का 108 बार जप करें, और काले तिल या लोहे का दान करें। शनि देव की तस्वीर या प्रतिमा के सामने दीपक जलाकर जप करने से अधिक लाभ होता है।

प्रश्न 3: क्या महिलाएं इस मंत्र का जप कर सकती हैं?

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। शनि देव किसी भी लिंग, जाति या धर्म के भक्तों पर समान कृपा करते हैं। महिलाएं पूरी श्रद्धा और नियम से इस मंत्र का जप कर सकती हैं।

प्रश्न 4: इस मंत्र का जप करने से क्या लाभ होते हैं?

उत्तर: इसके जप से शनि की साढ़ेसाती, ढैया, और अशुभ दशाओं के दुष्प्रभाव कम होते हैं, करियर में उन्नति होती है, आर्थिक तंगी दूर होती है, स्वास्थ्य लाभ मिलता है, और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

प्रश्न 5: क्या यह मंत्र बिना दीक्षा के जपा जा सकता है?

उत्तर: हाँ, यह एक सार्वजनिक स्तोत्र है, जिसे बिना किसी विशेष दीक्षा के भी जपा जा सकता है। शुद्ध मन और श्रद्धा से जप करने पर यह तुरंत प्रभाव दिखाता है।

॥ इति शनि मंत्रम् ॥
॥ शनि देव की जय हो ।। आप सब पर शनि देव की कृपा बनी रहे ।।

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "नीलांजनसमाभासं - Neelanjana Samabhasam Shani Mantra Lyrics in Hindi (शनि देव भजन)" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 13 Aug 2026

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