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भक्ति रस काव्य व भजन

जगत के रंग क्या देखूं तेरा दीदार काफी है (Jagat Ke Rang Kya Dekhun Lyrics in Hindi) - Bhaktilok

126 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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भगवान श्री कृष्ण के प्रति भक्ति का अर्पण

इस भजन के माध्यम से श्री कृष्ण की महिमा को मन में उतारें और भक्ति भाव से भरे रहें।

 जगत के रंग क्या देखूं,तेरा दीदार काफी है ।क्यों भटकूँ गैरों के दर पे,तेरा दरबार काफी है ॥नहीं चाहिए ये दुनियां के,निराले रंग ढंग मुझको,निराले रंग ढंग मुझको ।चली जाऊँ मैं वृंदावन,तेरा श्रृंगार काफी है ॥॥जगत के रंग क्या देखूं...॥जगत के साज बाजों से,हुए हैं कान अब बहरे,हुए हैं कान अब बहरे ।कहाँ जाके सुनूँ बंशी,मधुर वो तान काफी है ॥॥जगत के रंग क्या देखूं...॥जगत के रिश्तेदारों ने,बिछाया जाल माया का ।तेरे भक्तों से हो प्रीति,श्याम परिवार काफी है ॥॥जगत के रंग क्या देखूं...॥जगत की झूटी रौनक से,हैं आँखें भर गयी मेरीहैं आँखें भर गयी मेरी ।चले आओ मेरे मोहन,दरश की प्यास काफी है ॥॥जगत के रंग क्या देखूं...॥जगत के रंग क्या देखूं,तेरा दीदार काफी है ।क्यों भटकूँ गैरों के दर पे,तेरा दरबार काफी है ॥

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन 'जगत के रंग क्या देखूं तेरा दीदार काफी है' का मुख्य विषय भगवान श्री कृष्ण की भक्ति और उनकी अनंत सुंदरता है। भक्त इस भजन में कहता है कि जीवन के विभिन्न रूप रंग और भौतिक वस्तुएं उसके लिए निरर्थक हैं। जब भक्त लिखता है, 'तेरा दीदार काफी है', तो इसका अर्थ है कि कृष्ण का दीदार या दर्शन इतना दिव्य और अर्थपूर्ण है कि वह सारी इच्छाओं और सांसारिक सुख-सुविधाओं से ऊपर है। भक्त का मन भगवान की कृपा में समर्पित है और वह भौतिक दुनिया की तमाम आकर्षणों को छोड़कर केवल उनके दिव्य रूप के दर्शन की आकांक्षा करता है। यहाँ तक कि जब वे वृंदावन जाने की इच्छा व्यक्त करते हैं, तो यह बताता है कि वृंदावन केवल भक्ति और प्रेम की धुन के लिए एक स्थान है, जहाँ भगवान श्री कृष्ण का प्रेम हर दिशा में बिखरा है।

भजन में वर्णित भावनाएँ मन की विलासी दृष्टि को हटाने और भक्ति में रत होने का संकेत देती हैं। 'जगत के साज बाजों से, हुए हैं कान अब बहरे' की पंक्ति दर्शाती है कि संसार की आवाज़ें, जो पहले हमें आकर्षित करती थीं, अब कुल मिलाकर मायबूझक और निर्थक लगती हैं। भक्त कृष्ण की बंशी की मधुर तान सुनने के लिए व्याकुल हैं। इस प्रकार का भाव भक्त और भगवान के बीच के गहरे संबंध को दर्शाता है। जब भक्त कहता है, 'तेरे भक्तों से हो प्रीति', तो यह भी स्पष्ट होता है कि आनंद की खोज आज़ादी में नहीं बल्कि भगवत प्रेम और भक्ति में है। इसलिए, अपने भक्तों से प्रेम तथा अपने अस्तित्व को भगवान में समर्पित करना ही यह भजन सिखाता है।

इस भजन की मुख्य theological और दर्शनिक बात ये है कि यह भक्ति मार्ग का अनुसरण करने के महत्व को उजागर करती है। भक्त वासना और भौतिक सुखों से दूर रहकर केवल भगवान श्री कृष्ण की कृपा की आकांक्षा करता है। यहाँ 'जगत की झूटी रौनक' का उल्लेख करते हुए यह बताया जाता है कि भौतिक सुख, जो अस्थायी और क्षणिक हैं, आत्मा की शांति को प्राप्त करने में व्यर्थ हैं। इसलिए भक्ति का मार्ग अपनाना, भगवान की भक्ति में लीन होना और उनके प्रति अटूट प्रेम करना ही सच्चा सुख है। यह पंक्ति भक्तों को जागरूक करती है कि सच्चा वैभव केवल कृष्ण के दर्शन में ही निहित है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

इस भजन का धार्मिक और पौराणिक महत्व गहन है। यह भगवान श्री कृष्ण पर आधारित है, जो कि भारतीय धार्मिक परंपराओं में अति महत्वपूर्ण हैं। भगवान कृष्ण का जीवन और शिक्षाएँ भक्ति और प्रेम का आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। महाभारत और भागवत पुराण में भगवान के विभिन्न लीला का वर्णन किया गया है, जिससे भक्तों को प्रेरणा मिलती है। विशेष रूप से, वृंदावन की यात्रा और वहां के अनुभव भक्तों को प्रेम और भक्ति की गहरी अनुभूति का मार्गदर्शन करते हैं। यही कारण है कि भजन में वृंदावन की सराहना की गई है, जो कृष्ण के प्रेम का प्रतीक है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का जाप करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतोष की प्राप्ति होती है। भक्त जब इसे गाता है, तो उनका ध्यान भगवान के प्रति निष्ठा में सरलता से केंद्रित होता है। इससे नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है और विचारों की एकाग्रता की अनुभूति होती है। साथ ही, यह भजन संतुलित भावनाओं और सूक्ष्म आध्यात्मिक विकास को भी प्रोत्साहित करता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का जाप सुबह सूर्योदय के समय या शाम को संध्या वेला में करना सर्वोत्तम है। इस दौरान, एक दीया जलाएं और भगवान श्री कृष्ण की तस्वीर या प्रतीक के सामने बैठकर ध्यान लगाएं। सरल व शांत बैठे और मन को एकाग्र करें। भाव भक्ति से भरे होकर भजन गाएं। इस समय भगवान के प्रति प्रेम और समर्पण से भूपूर्वक रुख करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?

इस भजन का मुख्य संदेश है कि भगवान श्री कृष्ण के दीदार और भक्ति ही सच्चा सुख है। भौतिक सुख और बाह्य रंग-रूप से ऊब कर, भक्त केवल कृष्ण की कृपा की तलाश करता है।

भजन के जाद में ब्रह्मा या विष्णु की कोई भूमिका है?

इस भजन में विशेष तौर पर भगवान श्री कृष्ण की भक्ति का वर्णन किया गया है। परंतु, ब्रह्मा और विष्णु भी कृष्ण के स्वरूप में समाहित हैं। इसलिए, वे सृष्टि के निर्माण और संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

क्या यह भजन किसी विशेष अवसर पर गाया जाता है?

यह भजन विशेष रूप से राधाष्टमी, जन्माष्टमी, और अन्य धार्मिक पर्वों पर गाया जाता है। फिर भी, भक्त इसे रोज़ाना अपनी भक्ति में शामिल कर सकते हैं।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 20 Aug 2026

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