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Parvati Stotram

Dharti gagan me hoti hai teri jai jai kar - BhaktiLok

59 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

धरती गगन में होती है तेरी जय जय कार धरती गगन में होती है तेरी जय जय कार हर दिशा में गूंजती है तेरी महिमा की बयार धरती गगन में होती है तेरी जय जय कार पर्वत नद नदी सरिता सब गाते हैं तेरा गीत वन वन में फूल पलाश तुम्हारे चरणों की प्रीत चाँद तारे सूरज रवि सब करते हैं तुम्हें पुकार धरती गगन में होती है तेरी जय जय कार देव दानव मुनि ऋषि सब तुम्हारी शक्ति के गुणगान ब्रह्मा विष्णु महेश भी तुम्हारे करते हैं ध्यान अनंत ब्रह्मांड सब में तेरा है अधिकार धरती ागन में होती है तेरी जय जय कार हे प्रभु हे परमात्मा तुम सर्वव्यापी हो सर्वज्ञ तुम्हारी शक्ति अपार है तुम हो सकल कल्याण हर जीव तुम्हारी सन्तान हर सांस में तेरा प्यार धरती गगन में होती है तेरी जय जय कार

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह भजन 'धरती गगन में होती है तेरी जय जय कार' एक सर्वव्यापी परमात्मा की महिमा और विश्वव्यापी प्रशंसा का गीत है। इस भजन में यह संदेश दिया गया है कि प्रभु की जय और प्रशंसा पृथ्वी और आकाश दोनों में हर जगह गूंजती रहती है। 'धरती गगन में होती है तेरी जय जय कार' - यह पंक्ति यह प्रदर्शित करती है कि सृष्टि का प्रत्येक कण, चाहे वह पृथ्वी हो या नभ, प्रभु की महिमा का गीत गाता है। पर्वत, नदियां, वनस्पतियां, चाँद, तारे और सूरज सभी प्रकृति के तत्व परमात्मा की स्तुति में निरत हैं। यह भजन इस मूल सत्य को प्रकट करता है कि परमेश्वर सर्वत्र व्याप्त है और सकल सृष्टि उनकी जय जयकार करती है।

इस भजन का भावार्थ अत्यंत गहन और संवेदनशील है। जब हम कहते हैं 'धरती गगन में होती है तेरी जय जय कार', तो इसका अर्थ केवल शाब्दिक नहीं है, बल्कि यह भाव है कि प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक वस्तु अपने अस्तित्व के माध्यम से प्रभु की प्रशंसा कर रही है। पर्वत अपनी विशालता से, नदियां अपने प्रवाह से, फूल अपनी सुगंध से, सूरज अपने प्रकाश से परमात्मा की महिमा प्रदर्शित करते हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि सृष्टि की हर चीज परमेश्वर का उपासना गीत है। देव, दानव, मुनि, ऋषि सब उनके भक्त हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी परमेश्वर के प्रति नमन करते हैं। इसलिए हर जीव को परमेश्वर की इस सार्वभौमिक महिमा को समझना चाहिए।

भक्ति मार्ग के दृष्टिकोण से यह भजन परमात्मा के साथ आंतरिक संबंध स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस भजन का दार्शनिक सार यह है कि परमेश्वर न केवल एक व्यक्तित्व हैं, बल्कि सार्वभौमिक चेतना हैं जो सकल सृष्टि में व्याप्त है। यह अद्वैत वेदांत का सिद्धांत प्रकट करता है - 'ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या'। भक्त को यह समझना चाहिए कि परमात्मा सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और सर्वव्यापी हैं। 'अनंत ब्रह्मांड सब में तेरा है अधिकार' - यह पंक्ति दर्शाती है कि ईश्वर का राज्य अनंत है। भक्ति की सर्वोच्च अवस्था में भक्त को यह भान होता है कि वह भी परमात्मा का अंश है, और प्रत्येक सांस परमेश्वर का प्रेम ही है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यह भजन वैदिक परंपरा और भक्ति साहित्य का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। ऋग्वेद में भी यह विचार मिलता है कि प्रभु सर्वव्यापी हैं - 'तत्त्वमसि' अर्थात् 'तुम वही हो'। उपनिषदों में परमात्मा को 'सर्वव्यापक ब्रह्म' के रूप में वर्णित किया गया है। रामायण में भी राम को भगवान के रूप में सकल सृष्टि में परिव्याप्त माना गया है। भागवत गीता में कृष्ण कहते हैं कि वे सभी प्राणियों के हृदय में विद्यमान हैं। यह भजन इसी सनातन सत्य का गायन है कि परमेश्वर की महिमा पृथ्वी से लेकर ब्रह्मांड तक व्याप्त है। महाभारत के विराट रूप दर्शन में भी कृष्ण की विश्वव्यापी सत्ता को दर्शाया गया है, जो इसी मूल सिद्धांत को रेखांकित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का नियमित गायन और ध्यान मन को शांत करता है और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करता है। भक्त का मन परमात्मा के सर्वव्यापी स्वरूप का चिंतन करके विशाल और समष्टिमुखी बन जाता है। इससे अहंकार का लोप होता है और सार्वभौमिक प्रेम का विकास होता है। नियमित गायन से तनाव, चिंता और आशंका दूर होती है। मन को परम शांति और आनंद की प्राप्ति होती है। शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है क्योंकि भजन गायन से श्वसन क्रिया सुदृढ़ होती है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का गायन प्रातःकाल सूर्योदय के समय सर्वोत्तम है। आसन पर सीधे बैठकर दीप्ति जलाएं और फूल अर्पित करें। पवित्र मन और स्वच्छ आचरण के साथ गायन करें। भजन गाते समय सभी विषयों को भूलकर परमात्मा पर ध्यान केंद्रित करें। प्रत्येक पंक्ति का अर्थ समझते हुए गायन करने से चेतना का उत्थान होता है। गायन के पश्चात कुछ क्षण मौन रहकर ध्यान करें। नियमित साधना से आध्यात्मिक प्रगति सुनिश्चित होती है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन में 'धरती गगन' का क्या विशेष अर्थ है?

'धरती गगन' अर्थात् पृथ्वी और आकाश संपूर्ण दृश्य सृष्टि का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि प्रभु की महिमा सर्वत्र व्याप्त है - ऊपर आकाश में भी और नीचे धरती पर भी। इसका अर्थ है कि परमात्मा अनंत और सर्वव्यापी हैं।

देव, दानव, मुनि, ऋषि और देवताओं का यहाँ उल्लेख क्यों किया गया है?

इसका अर्थ यह है कि चाहे कोई भी हो - देवता हों या दानव, मुनि हों या ऋषि - सभी परमेश्वर के भक्त हैं और उसकी महिमा करते हैं। यह यह सिद्धांत प्रदर्शित करता है कि परमात्मा सकल प्राणियों का पालक है और सभी उसके अधीन हैं।

'हर जीव तुम्हारी संतान हर सांस में तेरा प्यार' - इस पंक्ति का आध्यात्मिक संदेश क्या है?

यह पंक्ति यह संदेश देती है कि हर प्राणी परमेश्वर का संतान है और प्रत्येक जीवन क्षण परमात्मा के प्रेम से परिपूर्ण है। यह भक्त को यह समझाता है कि हम परमेश्वर से अलग नहीं हैं, बल्कि उसका अभिन्न अंश हैं।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 20 Aug 2026

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