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एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि लिरिक्स ( Ekdantay Vakrtunday Gouritanyay Lyrics in Hindi ) - भक्ति लोक

200 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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गणेश स्तुति: एकदंताय वक्रतुण्डाय

भगवान गणेश की कृपा पाने के लिए यह मंत्र को भक्ति से गाएं और अपने मन को शुद्ध करें।

एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥गणनायकाय गणदेवताय गणाध्यक्षाय धीमहि ।गुणशरीराय गुणमण्डिताय गुणेशानाय धीमहि ।गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥गानचतुराय गानप्राणाय गानान्तरात्मने ।गानोत्सुकाय गानमत्ताय गानोत्सुकमनसे ।गुरुपूजिताय गुरुदेवताय गुरुकुलस्थायिने ।गुरुविक्रमाय गुह्यप्रवराय गुरवे गुणगुरवे ।गुरुदैत्यगलच्छेत्रे गुरुधर्मसदाराध्याय ।गुरुपुत्रपरित्रात्रे गुरुपाखण्डखण्डकाय ।गीतसाराय गीततत्त्वाय गीतगोत्राय धीमहि ।गूढगुल्फाय गन्धमत्ताय गोजयप्रदाय धीमहि ।गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥ग्रन्थगीताय ग्रन्थगेयाय ग्रन्थान्तरात्मने ।गीतलीनाय गीताश्रयाय गीतवाद्यपटवे ।गेयचरिताय गायकवराय गन्धर्वप्रियकृते ।गायकाधीनविग्रहाय गङ्गाजलप्रणयवते ।गौरीस्तनन्धयाय गौरीहृदयनन्दनाय ।गौरभानुसुताय गौरीगणेश्वराय ।गौरीप्रणयाय गौरीप्रवणाय गौरभावाय धीमहि ।गोसहस्राय गोवर्धनाय गोपगोपाय धीमहि ।गुणातीताय गुणाधीशाय गुणप्रविष्टाय धीमहि ।एकदंताय वक्रतुण्डाय गौरीतनयाय धीमहि ।गजेशानाय भालचन्द्राय श्रीगणेशाय धीमहि ॥

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन का मुख्य विषय भगवान गणेश की स्तुति है, जिन्हें 'एकदंत' और 'वक्रतुण्ड' के रूप में संबोधित किया गया है। 'एकदंत' का अर्थ है एक दांत वाले, जो उनका पहचान चिह्न है और 'वक्रतुण्ड' का अर्थ है गोल-गोल आकार वाला, जो कि उनके सौम्य और विशाल व्यक्तित्व को दर्शाता है। भजन के आरम्भ में ही संगति दी जाती है 'गौरीतानयाय धीमहि', जिसका तात्पर्य है माता पार्वती के पुत्र गणेश की स्तुति करना। इस भजन में गणेश जी को 'गणनायक' और 'गणाध्यक्ष' कहा गया है, जो दर्शाता है कि वह समस्त प्राणियों के कार्यों के नेतृत्वकर्ता और गाइड हैं। यह इस बात का सूचक है कि श्रद्धालु उनके मार्गदर्शन में चलना चाहते हैं। भजन में 'गुणशरीराय' का उल्लेख उनके नैतिक और आध्यात्मिक गुणों को प्रदर्शित करता है। यह हमें निर्देशित करता है कि गुणवान व्यक्तित्व विकसित करना अत्यंत आवश्यक है।

भावार्थ के रूप में, यह भजन हमें गणेश जी के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। इसमें गायक की भावनाओं को गहनता से समर्पित किया गया है। 'गानचतुराय' और 'गानप्राणाय' जैसे पद गाने की कला और इसकी प्रेरणा को दर्शाते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि संगीत के माध्यम से हम भगवान के नजदीक जा सकते हैं। गुरु की महिमा भी इस भजन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। 'गुरुपूजिताय' और 'गुरुविक्रमाय' जैसी पंक्तियाँ गुरु की क्षमता और उनके प्रति श्रद्धा का बखान करती हैं। इस प्रकार, भजन में भक्ति और संगीत की मिलन को लेकर गहन विचार किया गया है, जो भक्तों को मानसिक शांति और समर्पण की अनुभूति कराता है।

इस भजन में भक्ति मार्ग का अत्यधिक महत्व है। भक्तों को यह संदेश दिया गया है कि भगवान से जुड़ना और उनकी स्तुति करना अत्यंत आवश्यक है। 'गुणातीताय' और 'गुणाधीशाय' उनके अद्भुत गुणों की व्याख्या करते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि भगवान से जुड़कर हम अपनी कमियों को दूर कर सकते हैं। भक्ति मार्ग से हम अपनी आत्मा की शुद्धि कर सकते हैं और अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यह भजन हमें यह सिखाता है कि हमें अपनी समस्याओं का समधान ढूंढने के लिए गणेश जी की स्वरूप में श्रद्धा रखनी चाहिए। भक्ति की शक्ति हमें मानसिक और आत्मिक मजबूती प्रदान करती है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

भगवान गणेश का महत्व हिन्दू धर्म में अत्यधिक है। स्कंद पुराण और गणेश पुराण में गणेश जी के स्वरूप और उनके अनुग्रह के बारे में वर्णन मिलता है। उन्हें समस्त विघ्नों का नाशक माना जाता है और भक्त उनसे शक्ति प्राप्त करते हैं। गणेश जी का पूजन हर शुभ कार्य की शुरुआत में किया जाता है। उनका चित्रण विभिन्न पौराणिक कथाओं में मिलता है, जैसे कि महाभारत में जब पांडवों ने अपने कार्यों में सफलता के लिए गणेश जी का ध्यान किया। इस भजन के मंत्रों में गणेश जी के गुण और उनकी करूणा का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है, जिससे भक्तजन अपने मन में गणेश जी के प्रति गहरी श्रद्धा का अनुभव कर सकें।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का उच्चारण मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और समस्याओं से मुक्ति प्रदान करने में सहायक होता है। यह भक्तों को सकारात्मक ऊर्जा से भर देता है और जीवन में सुख-शांति के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। नियमित रूप से इसे गाने से आत्मबल में वृद्धि होती है और सृजनात्मकता को भी बढ़ावा मिलता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का सही समय प्रातः या संध्या काल है। पूजा करने से पहले एक दीया प्रज्वलित करें और भगवान गणेश को मिठाई या फल अर्पित करें। उचित आसन में बैठकर ध्यानपूर्वक मंत्र का उच्चारण करें। मन को नियंत्रित कर भगवान के प्रति भक्ति और श्रद्धा से सर्वे करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन का प्रमुख उद्देश्य क्या है?

इस भजन का मुख्य उद्देश्य भगवान गणेश की स्तुति करना है, ताकि उनके आशीर्वाद से सभी विघ्नों का नाश हो और जीवन में सुख-शांति आए।

क्या इस भजन का पाठ विशेष समय पर करना चाहिए?

हाँ, इस भजन का पाठ सुबह या संध्या समय करना उचित माना जाता है, क्योंकि यह समय ध्यान और साधना के लिए अनुकूल होता है।

इस भजन का जप करने से क्या लाभ होते हैं?

इस भजन का जप करने से मानसिक शांति, आध्यात्मिक विकास और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होता है, जिससे व्यक्तित्व में सुधार होता है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 29 Aug 2026

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