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श्री गंगा स्तोत्रम् (Maa Ganga Stortam Lyrics in Hindi) - by Madhvi Madhukar Jha Ganga Stotram - Bhaktilok

63 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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गंगा स्तोत्र: मोक्ष और शुद्धि की महत्ता

गंगा स्तोत्र का पाठ करने से भक्तों को शुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसका पाठ अत्यंत कल्याणकारी है।

 श्री गंगा स्तोत्रम् (Maa Ganga Stortam Lyrics in Hindi) - गांगं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् ।त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥माँ गंगा स्तोत्रम्॥देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गेत्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।शङ्करमौलिविहारिणि विमलेमम मतिरास्तां तव पदकमले ॥१॥भागीरथि सुखदायिनि मातस्तवजलमहिमा निगमे ख्यातः ।नाहं जाने तव महिमानंपाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ २॥हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गेहिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे ।दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारंकुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ ३॥तव जलममलं येन निपीतं,परमपदं खलु तेन गृहीतम् ।मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तःकिल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ ४॥पतितोद्धारिणि जाह्नवि गङ्गेखण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे ।भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये,पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ॥ ५॥कल्पलतामिव फलदां लोके,प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके ।पारावारविहारिणि गङ्गेविमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥ ६॥तव चेन्मातः स्रोतःस्नातःपुनरपि जठरे सोऽपि न जातः ।नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गेकलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥ ७॥पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गेजय जय जाह्नवि करुणापाङ्गे ।इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणेसुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८॥रोगं शोकं तापं पापंहर मे भगवति कुमतिकलापम्।त्रिभुवनसारे वसुधाहारेत्वमसि गतिर्मम खलु संसारे॥ ९॥अलकानन्दे परमानन्देकुरु करुणामयि कातरवन्द्ये ।तव तटनिकटे यस्य निवासःखलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥ १०॥वरमिह नीरे कमठो मीनःकिं वा तीरे शरटः क्षीणः ।अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तवन हि दूरे नृपतिकुलीनः॥ ११॥भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्येदेवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये ।गङ्गास्तवमिमममलं नित्यंपठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥ १२॥येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषांभवति सदा सुखमुक्तिः ।मधुराकान्तापज्झटिकाभिःपरमानन्दकलितललिताभिः ॥ १३॥गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारंवाञ्छितफलदं विमलं सारम् ।शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठतिसुखी स्तव इति च समाप्तः ॥ १४॥देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गेत्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे ।शङ्करमौलिविहारिणि विमलेमम मतिरास्तां तव पदकमले ॥

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

श्री गंगा स्तोत्रम् का मुख्य विषय गंगा माँ की महिमा, उनके जल का गुण और भक्तों के लिए उनकी कृपा पर आधारित है। पहले श्लोक में माँ गंगा को 'गांगं वारि मनोहारि' कहा गया है, जो दर्शाता है कि वे मन को हरने वाली हैं और उनके जल से सभी दुखों का निवारण होता है। अगले श्लोक में गंगा को सुरेश्वरि और त्रिभुवनतारिणि के रूप में संबोधित किया गया है, जो यह बताते हैं कि वे सभी तीन लोकों के लिए उद्धारक हैं। इस स्तोत्र के माध्यम से भक्त माँ गंगा से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें ज्ञान प्रदान करें और उनके पापों के कुंड से बाहर निकाले। यह स्पष्ट रूप से गंगा माँ के महान प्रभाव और उनकी दिव्य शक्ति का परिचय देता है।

भावार्थ में गंगा माँ के प्रति भक्ति, श्रद्धा और प्रेम का अद्भुत चित्रण किया गया है। यहाँ भक्त गंगा जल की शुद्धि और उसके अमिट प्रभाव को याद करके उनमें अपने अज्ञान से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि जब वे कहते हैं 'नाहं जाने तव महिमानं', यह बात भक्त के अदृश्य और असीमित ज्ञान के प्रति सम्मान है। गंगा माँ को 'पुनातु माम्' कहकर भक्ति में श्रद्धा प्रकट की गई है, जिससे यह यथार्थ सिद्ध होता है कि माँ गंगा भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें पापों से मुक्त करती हैं। यह गंगा नदी की भक्ति-मार्ग का एक उत्कृष्ट रूप है, जो भक्तों को आंतरिक शुद्धता की ओर प्रेरित करता है।

गंगा स्तोत्र का प्रमुख तत्व भक्ति मार्ग (Bhakti Marg) को दर्शाता है। गंगा यहाँ केवल एक पवित्र नदी नहीं, अपितु सार्वभौमिक माँ का स्वरूप है। उनका जल पवित्रता, आत्मिक उन्नति और मुक्ति का साधन है। इस स्तोत्र में अनेक श्लोकों में गंगा के जल को अमृत के समान बताया गया है, जो आत्मा को शुद्धि और शांति प्रदान करता है। 'नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गे' जैसे शब्द गंगा के उद्धारक रूप को उजागर करते हैं। इस प्रकार, यह स्तोत्र भक्ति मार्ग के अनुयायियों को प्रेरित करता है कि वे गंगा के दिव्य स्वरूप की पूजा करें और उनके पवित्र जल का सेवन करते हुए आत्म-ज्ञानी बनें।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

गंगा स्तोत्र का विशेष स्थान हिन्दू धर्म में है, जहाँ इसे विभिन्न पुराणों में मां गंगा के महात्म्य के संदर्भ में महत्वपूर्ण घोषित किया गया है। स्कंद पुराण में गंगा को पवित्रतम जल स्रोत के रूप में उल्लेखित किया गया है, जो सभी पापों को धोने की सामर्थ्य रखता है। महाभारत और रामायण में गंगा की महिमा का वर्णन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि गंगा धरती पर स्वर्ग का प्रतीक हैं। इस स्तोत्र का पाठ विशेष रूप से उन भक्तों के लिए महत्वपूर्ण है, जो मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा रखते हैं और लाभ प्राप्त करना चाहते हैं।

प्रभु श्री राम के आदर्शों और मर्यादा पुरुषोत्तम के सम्पूर्ण चरित्र का रसास्वादन करने के लिए रामायण महाग्रंथ अन्वेषक का उपयोग करें। गंगा स्तोत्र का पाठ करने से मानसिक, शारीरिक और आत्मिक लाभ होते हैं। इसके नियमित पाठ से मानसिक शांतता, आन्तरिक पवित्रता मिलती है तथा यह भक्तों को दुखों से मुक्त करने का साधन भी है। गंगा माँ की कृपा से शरीर में रोग दूर होते हैं और आत्मा शुद्ध होती है। साथ ही, यह श्रद्धालुओं को सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह प्रदान करता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

गंगा स्तोत्र का पाठ सुबह या संध्या के समय करना शुभ माना जाता है। पूजन करते समय एक दीया जलाना और गंगाजल का अभिषेक करना अति लाभकारी होता है। भक्तों को सही मुद्रा में बैठकर, मन को एकाग्र करते हुए भगवान गंगा की कृपा के लिए प्रार्थना करनी चाहिए।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

गंगा स्तोत्र का महत्व क्या है?

गंगा स्तोत्र का पाठ पवित्रता, शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए किया जाता है। यह भक्तों को मानसिक शांति और आत्मिक उन्नति प्रदान करता है।

गंगा स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

यह स्तोत्र सुबह या संध्या के समय पढ़ना श्रेष्ठ होता है, जिससे लाभ के साथ-साथ महीनों की शांति मिलती है।

क्या गंगा स्तोत्र का पाठ रोग निवारण में सहायक है?

हां, गंगा स्तोत्र का पाठ रोगों और मानसिक तनाव से मुक्ति में सहायक होता है। माँ गंगा की कृपा से भक्तों को अनेक लाभ मिलते हैं।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 24 Aug 2026

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