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अथसूर्योपस्थानम् मन्त्र (AthSuryoPasthanam Mantra Sanskrit Me) - Bhaktilok

78 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind | 2 मिनट पठन समय
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अथसूर्योपस्थानम् मन्त्र (AthSuryoPasthanam Mantra Sanskrit Me) - 



अथसूर्योपस्थानम् मन्त्र (AthSuryoPasthanam Mantra Sanskrit Me) - Bhaktilok


अथसूर्योपस्थानम् मन्त्र (AthSuryoPasthanam Mantra Sanskrit Me) - 


प्रातःकाल दाहिना पैर अथवा एणी को उठाकर दोनों हाथों को सीथा रखते हुए एवं मध्याह्न में दोनों हाथों को ऊपर करके तथा संध्याकाल में बैठ कर दोनों हाथों को कमल के समान जोड़कर उपस्थान करें ।


अथसूर्योपस्थानम् विनियोग(AthSuryoPasthanam  Viniyog in Hindi):-


ॐ उद्वयमित्यस्य हिरण्यस्तूप ऋषिरनुष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता, ॐ उदुत्यमित्यस्य प्रस्कण्व-ऋषिर्गायत्री छन्दः सूर्यो देवता, ॐ चित्रमित्यस्य कौत्स ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दः सूर्यो देवता ॐ तञ्चक्षुरित्यस्य दध्यङ् अथर्वणऋषिरक्षरातीतपुर उष्णिक्-छन्दः सूर्यो देवता सूर्योपस्थाने विनियोगः । 


जल छोड़ें


अथसूर्योपस्थानम् मन्त्र (AthSuryoPasthanam Mantra Sanskrit Me):- 


ॐ उद्वयन्तमसस्परिस्वः पश्यन्त उत्तरम् । देवन्देवत्रा सूर्यमगन्मज्योतिरुत्तमम् । 

ॐ उदुत्यजातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ।।२

 ॐ चित्रन्देवानामुदगादनीकञ्चक्षुमित्रस्य वरुणस्याम्ने । 

आप्राद्यावापृथिवीऽअन्तरिक्ष १७ सूर्यऽआत्माजगतस्तस्त्युपश्च ।

ॐ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्कमुच्चरत् । 

पश्येम शरदः शतजीवेमशरदः शत १७ श्रृणुयामशरद; शतम्प्रघ्रवामशरदः शान्तमदीनाः स्यामशरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।। 






🙏 भजन का विस्तृत अर्थ और भावार्थ (Lyrics Meaning)

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "अथसूर्योपस्थानम् मन्त्र (AthSuryoPasthanam Mantra Sanskrit Me) - Bhaktilok" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व और आध्यात्मिक लाभ (Significance)

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि (Chanting Rules)

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 19 Aug 2026

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