मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
मेरी भावना जिसने राग द्वेष कामादिक ( Meri Bawana Jisne Raag Dwesh kamadik Lyrics in Hindi) - जैन पाठ Jain Path:-
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।
मेरी भावना जिसने राग द्वेष कामादिक ( Meri Bawana Jisne Raag Dwesh kamadik Lyrics in Hindi):-
जिसने राग-द्वेष कामादिक,
जीते सब जग जान लिया
सब जीवों को मोक्ष मार्ग का
निस्पृह हो उपदेश दिया,
बुद्ध, वीर जिन, हरि, हर
ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो
भक्ति-भाव से प्रेरित हो
यह चित्त उसी में लीन रहो||||1||
विषयों की आशा नहीं जिनके,
साम्य भाव धन रखते हैं
निज-पर के हित साधन में
जो निशदिन तत्पर रहते हैं,
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या,
बिना खेद जो करते हैं
ऐसे ज्ञानी साधु जगत के
दुख-समूह को हरते हैं||||2||
रहे सदा सत्संग उन्हीं का
ध्यान उन्हीं का नित्य रहे
उन ही जैसी चर्या में यह
चित्त सदा अनुरक्त रहे,
नहीं सताऊँ किसी जीव को,
झूठ कभी नहीं कहा करूं
पर-धन-वनिता पर न लुभाऊं,
संतोषामृत पिया करूं||||3||
अहंकार का भाव न रखूं,
नहीं किसी पर खेद करूं
देख दूसरों की बढ़ती को
कभी न ईर्ष्या-भाव धरूं,
रहे भावना ऐसी मेरी,
सरल-सत्य-व्यवहार करूं
बने जहां तक इस जीवन में
औरों का उपकार करूं||||4||
मैत्रीभाव जगत में मेरा
सब जीवों से नित्य रहे
दीन-दुखी जीवों पर मेरे
उरसे करुणा स्त्रोत बहे,
दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग रतों पर
क्षोभ नहीं मुझको आवे
साम्यभाव रखूं मैं उन पर
ऐसी परिणति हो जावे||||5||
गुणीजनों को देख हृदय में
मेरे प्रेम उमड़ आवे
बने जहां तक उनकी सेवा
करके यह मन सुख पावे,
होऊं नहीं कृतघ्न कभी मैं,
द्रोह न मेरे उर आवे
गुण-ग्रहण का भाव रहे
नित दृष्टि न दोषों पर जावे||||6||
कोई बुरा कहो या अच्छा,
लक्ष्मी आवे या जावे
लाखों वर्षों तक जीऊं या
मृत्यु आज ही आ जावे||
अथवा कोई कैसा ही
भय या लालच देने आवे||
तो भी न्याय मार्ग से मेरे
कभी न पद डिगने पावे||||7||
होकर सुख में मग्न न फूले
दुख में कभी न घबरावे
पर्वत नदी-श्मशान-भयानक
अटवी से नहिं भय खावे,
रहे अडोल-अकंप निरंतर,
यह मन, दृढ़तर बन जावे
इष्टवियोग अनिष्टयोग में
सहनशीलता दिखलावे||||8||
सुखी रहे सब जीव जगत के
कोई कभी न घबरावे
बैर-पाप-अभिमान छोड़
जग नित्य नए मंगल गावे,
घर-घर चर्चा रहे धर्म की
दुष्कृत दुष्कर हो जावे
ज्ञान-चरित उन्नत कर अपना
मनुज-जन्म फल सब पावे||||9||
ईति-भीति व्यापे नहीं जगमें
वृष्टि समय पर हुआ करे
धर्मनिष्ठ होकर राजा भी
न्याय प्रजा का किया करे,
रोग-मरी दुर्भिक्ष न फैले
प्रजा शांति से जिया करे
परम अहिंसा धर्म जगत में
फैल सर्वहित किया करे||||10||
फैले प्रेम परस्पर जग में
मोह दूर पर रहा करे
अप्रिय-कटुक-कठोर शब्द
नहिं कोई मुख से कहा करे,
बनकर सब युगवीर हृदय से
देशोन्नति-रत रहा करें
वस्तु-स्वरूप विचार खुशी से
सब दुख संकट सहा करें||||11||
🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ
यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "मेरी भावना जिसने राग द्वेष कामादिक ( Meri Bawana Jisne Raag Dwesh kamadik Lyrics in Hindi) - जैन पाठ Jain Path - Bhaktilok" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।
भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।
🔍 विशेष महत्त्व और लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।
🕒 साधना एवं गायन विधि
भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।
भजनों को गाने की सही विधि क्या है?
भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।
क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?
हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

पाठकों के विचार (0)
भक्ति रस चर्चा में भाग लें