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नरसिम्हा कवचम् (Narasimha Kavacham Lyrics in Hindi) - Narasimha Kavacha Mantra - Bhaktilok

142 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind | 2 मिनट पठन समय
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नरसिम्हा कवचम् (Narasimha Kavacham Lyrics in Hindi) - Narasimha Kavacha Mantra - Bhaktilok

नरसिम्हा कवचम् (Narasimha Kavacham Lyrics in Hindi) - 


नरसिम्हा-कवचं वक्षये प्रह्लादेनोदितं पुरा |

सर्व-रक्षा-कारं पुण्यं सर्वोपाद्रव-नाशनम् || 1 ||


सर्व-सम्पत-कारं चैव स्वर्ग-मोक्ष-प्रदायकम |

ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमा-सिंहासन-स्थितम् || 2 ||


वृत्तस्यं त्रि-नयनं शरद-इंदु-समा-प्रभम् |

लक्ष्मयालिङ्गित-वामंगम् विभूतिभिर उपाश्रितम् || 3 ||


चतुर-भुजं कोमलांगं स्वर्ण-कुंडल-शोभितम् |

श्रीयासु-शोभितोरस्कं रत्न-केयूर-मुद्रितम् || 4 ||


तप्त-कंचन-संकाशं पिता-निर्मला-वाससम् |

इन्द्रादि-सुर-मौलिष्ठ स्फुरन् माणिक्य-दीप्तिभिः || 5 ||


विराजित-पाद-द्वन्द्वं शंख-चक्रादि-हेतिभिः |

गरुत्मता चविनयत् स्तुयमानं मुदान्वितम् || 6 ||


स्व-हृत-कमला-संवासम् कृत्वा तु कवचम् पठेत |

नृसिंहो मे शिरः पातु लोक-रक्षात्म-संभवः || 7 ||


सर्वगोऽपि स्तम्भवसः फलम् मे रक्षतु ध्वनिम् |

नृसिंहो मे दृषौ पातु सोम-सूर्याग्नि-लोकनः || 8 ||


स्मृति मे पातु नृहरिः मुनि-वर्य-स्तुति-प्रियः |

नासं मे सिंह-नाश तू मुखं लक्ष्मी-मुख-प्रियः || 9 ||


सर्व-विद्याधिपः पातु नृसिंहो रसानां मम |

वक्त्रं पाटव इंदु-वदनाः सदा प्रह्लाद-वंदितः || 10 ||


नृसिंहः पातु मे कंठं स्कन्धौ भू-भरणन्त-कृत |

दिव्यस्त्र-शोभिता-भुजो नृसिंहः पातु मे भुजौ || 11 ||


करौ मे देव-वरदो नृसिंहः पातु सर्वतः |

हृदयं योगी-साध्यश्च च निवासं पातु मे हरिः || 12 ||


मध्यमं पातु हिरण्यक्ष-वक्षः-कुक्षि-विदारणः |

नाभिं मे पातु नृहरिः स्व-नाभि-ब्रह्म-संस्तुतः || 13 ||


ब्रह्माण्ड-कोटयः कात्यां यस्यसौ पातु मे कटिम |

गुह्यं मे पातु गुह्यनाम मंत्रणाम गुह्य-रूप ध्रक || 14 ||


उरु मनोभव: पातु जनुनि नर-रूप-ध्रक |

जंघे पातु धरा-भार-हर्ता यो सौ नृ-केशरी || 15 ||


सुरा-राज्य-प्रदः पातु पदौ मे नृहरीश्वरः |

सहस्र-शीर्ष-पुरुषः पातु मे सर्वशस तनुम || 16 ||


महोग्रह: पूर्वत: पातु महा-विराग्रजो 'ग्नित: |

महा-विष्णुः दक्षिणे तु महा-ज्वालास् तु नैरृतौ || 17 ||


पश्चिमे पातु सर्वेशो दिशि मे सर्वतोमुखः |

नृसिंहः पातु वायव्याम् सौम्यम् भीषण-विग्रहः || 18 ||


ईशान्यं पातु भद्रो मे सर्व मंगल दायकः |

संसार-भयदः पातु मृत्योर मृत्युर नृ-केशरी || 19 ||


इदं नृसिंह-कवचं प्रह्लाद-मुख-मंडितम् |

भक्तिमान् यः पथेन्नित्यं सर्व-पापैः प्रमुच्यते || 20 ||


पुत्रवान् धन्वान् लोके दीर्घायुर् उपजायते |

यम यम कामयते काम तम तम प्राप्नोति असंशयम् || 21 ||


सर्वत्र जयं आप्नोति सर्वत्र विजयि भवेत |

भूमि अंतरिक्ष-दिव्यानां ग्रहणं विनिवारणम् || 22 ||


वृषिकोर्ग-संभूत-विशापहरणम् परम् |

ब्रह्म-राक्षस-यक्षाणां दुरोत्सारण-कारणम् || 23 ||


भूर्जे वा तलपत्रे वा कवचं लिखितं शुभम् |

कर-मूले धृतं येन सिध्येयुः कर्म-सिद्धयः || 24 ||


देवासुर-मनुष्येषु स्वं स्वं एव जयं लभेत |

एक-संध्याम् त्रि-संध्याम् वा यः पथेन नियतो नरः || 25 ||


सर्व-मंगल-मांगल्यं भुक्तिं मुक्तिं च विंदति |

द्वा-त्रिंशति-सहस्रानी पत्थेच्छुद्धात्मभिर नृभिः || 26 ||


कवचस्यस्य मंत्रस्य मंत्र-सिद्धिः प्रजायते |

अनेना मंत्र-राजेण कृत्वा भस्मभि मंत्रणम् || 27 ||


तिलकं बिभ्रियाद यस तु तस्य गृह-भयं हरेत |

त्रिवरं जपमानस तु दत्तं वार्याभिमंत्र्य च || 28 ||


प्रशये दयम नरं मन्त्रं नृसिंह-ध्यानमाचरेत् |

तस्य रोगः प्रणश्यन्ति ये च स्युः कुक्षि-सम्भवः || 29 ||


किमात्रा बहुनोक्तेन नृसिंह सदृशो भवेत् |

मनसा चिन्तितं यत्तु स तच्छाप्नोत्या संशयम् || 30 ||


गर्जन्तं गर्जयन्तं निज-भुज-पातालम् स्फोयन्तं हतन्तं

दीप्यन्तं तपयन्तं दिवि भुवि दितिजं क्षेपयन्तं क्षिपन्तम् |

क्रंदंतं रोशयंतं दिशि दिशि सततं

विक्षन्तं घूर्णयन्तं कार-निकारा-शतयः दिव्य-सिंहं नमामि ||


इति श्री-ब्रह्माण्ड-पुराणे प्रह्लादोक्तम् श्री-नृसिंह-कवचम् सम्पूर्णम् ||


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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 19 Aug 2026

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