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लीले की लीला न्यारी है (leele ki leela nyari hai yeh ghoome duniya sari hai Lyrics in Hindi) - Bhaktilok

68 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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लीले की लीला: अनंत कृपा का अनुभव

इस भजन के माध्यम से भगवान की लीला का गहन अनुभव प्राप्त करें और भक्ति की शक्ति का संचार करें।

लीले की लीला न्यारी है, ये घूमे दुनिया सारी है।इसका मालिक खाटू वाला देखो लीले का असवारी है, ये घूमे ...लीले की लीला न्यारी है, ये घूमे...ये पवन वेग से चलता है, इसकी कृपा से हमको मिलता है।इसकी पीठ पे श्याम बिहारी है, ये घूमे...लीले की लीला न्यारी है, ये घूमे...ये दाल चना किसमिस खाता, इसे और नहीं कुछ भी भाता।नहीं देता कोई पुजारी है, ये घूमे...लीले की लीला न्यारी है, ये घूमे...इसके बिन काम ना होता है, ये एक पल भी ना सोता है।ये लीला बड़ा उपकारी है, ये घूमे...लीले की लीला न्यारी है, ये घूमे...है दास रविन्दर दीवाना, है श्याम नाम का मस्ताना।इस लीले का आभारी है, ये घूमे...लीले की लीला न्यारी है, ये घूमे...

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

भजन "लीले की लीला न्यारी है" श्री कृष्ण के अनंत और अद्भुत लीलाओं का वर्णन करता है। इस भजन में यह बताया गया है कि कैसे भगवान की लीलाएं सम्पूर्ण सृष्टि पर व्याप्त हैं। 'ये घूमे दुनिया सारी है' का अर्थ है कि भगवान की लीला हर जगह फैली हुई है और सब कुछ भगवान की कृपा पर निर्भर करता है। यह भक्ति केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह ध्यान केंद्रित करने का एक साधन है, जो भक्त को भगवान के अनुग्रह का अनुभव कराता है। 'देखो लीले का असवारी है' पंक्ति में यह व्यक्त किया गया है कि भगवान स्वयं उस लीला का स्वामी हैं और उनकी महिमा तथा अद्भुतता का कोई पार नहीं है। लीलाओं के माध्यम से भक्त अपने सुख-दुख को समझते हुए भगवान की ओर अग्रसर होते हैं।

इस भजन में भगवान की कृपा की महत्ता को भी उजागर किया गया है। 'ये पवन वेग से चलता है, इसकी कृपा से हमको मिलता है' का तात्पर्य है कि भगवान द्वारा ही सब कुछ संचालित होता है और उनकी कृपा से ही जीवन में सफलता प्राप्त हो सकती है। कृष्ण की लीला महान और उपकारी मानी जाती है। भक्त जब इस भजन को गाते हैं, तब वो अपने मन में भक्ति भाव को जागृत करते हैं और अपनी आत्मा को भगवान के प्रति समर्पित करते हैं। यह एक प्रकार का मानसिक उत्सव है, जहाँ भक्त अपने दुःख-दर्द को भूलकर पूरी तरह से भगवान में खो जाता है।

इस भजन के माध्यम से भक्ति मार्ग (भक्तिरस) की महत्ता को भी समझा जा सकता है। यह दर्शाता है कि बिना भगवान का नाम लिए कोई कार्य अधूरा रहता है। 'इसके बिन काम ना होता है' यह दिखाता है कि भगवान ही सम्पूर्ण सृष्टि के कर्ता हैं। भक्ति मार्ग केवल भजन गाने या पूजा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक अनुभव है। 'है दास रविन्दर दीवाना' बताता है कि एक सच्चा भक्त अपने जीवन को पूरी तरह भगवान के चरणों में अर्पित कर देता है। इस प्रकार, यह भजन न केवल एक साधारण भक्ति गीत है, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक अनुभव का माध्यम है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

इस भजन की महत्ता भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपरा में गहरी है। श्री कृष्ण की लीलाओं का वर्णन अनेक पुराणों और ग्रंथों में किया गया है। भागवत पुराण में उनकी लीलाओं का उल्लेख किया गया है, जहाँ यह बताया गया है कि भगवान की लीलाएँ सृष्टि के लिए कितनी महत्वपूर्ण हैं। इस प्रकार के भजन भक्तों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं। यह लेखक रविन्दर द्वारा रचित भजन भक्तों को श्री कृष्ण के प्रति भावनात्मक एकता और समर्पण की भावना विकसित करने में सहायक है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन के नियमित पाठ से मानसिक तनाव कम होता है और भक्त का मन शांति की अवस्था में पहुँचता है। भजन गाने से भक्ति की ऊर्जा जागृत होती है, जिससे भक्त का जीवन सकारात्मकता से भर जाता है। यह आत्मा को ऊँचा उठाने का एक साधन है और ध्यान लगाने में मदद करता है, जिससे साधक को आध्यात्मिक रूप से प्रगति करने में सहायता मिलती है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का जाप सुबह या सायंकाल करना सर्वोत्तम होता है। जाप करते समय एक दीया जलाना और फुलों की माला अर्पित करना उचित रहता है। ध्यानपूर्वक और श्रद्धा भाव से बैठना चाहिए और मन को केवल भगवान की लीलाओं में केंद्रित करना चाहिए। यह ध्यान लोक का संचार करता है और आत्मा को परिपूर्णता का अनुभव कराता है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

क्या इस भजन का कोई विशेष उद्देश्य है?

इस भजन का उद्देश्य भक्तों को भगवान की लीलाओं और उनकी कृपा के महत्व को समझाना है। इसे गाने से श्रद्धा और भक्ति का संचार होता है।

क्या इस भजन की कोई पौराणिक संदर्भ है?

इस भजन का संदर्भ श्री कृष्ण की लीलाओं से जुड़ा हुआ है, जिन्हें विभिन्न पुराणों में विस्तृत रूप से बताया गया है, विशेषकर भागवत पुराण में।

इस भजन को गाने का सही समय क्या है?

इस भजन को सुबह के समय या शाम को गाना सबसे अच्छा माना जाता है, जब मन और आत्मा अधिकतर शांत होती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 22 Aug 2026

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