मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन
शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।
🙏 करो-करो जी, कन्या पूजन करो-करो जी – नवरात्रि कन्या पूजन भजन
(Karo Karo Ji Kanya Poojan Karo Karo Ji) – Lakhabir Singh Lakha | Navratri Kanya Pujan Geet
📝 भजन विवरण
📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)
॥ मुखड़ा ॥
करो-करो जी, कन्या पूजन करो-करो जी,
करो-करो जी, कन्या पूजन करो-करो जी।
सुख-सम्पत्ति, ऐश्वर्य दान दे, विजय-रूप यश-फल महान दे,
मन से ध्यान धरो जी।
करो-करो जी, कन्या पूजन करो-करो जी॥
॥ अंतरा १ ॥
आठ तरह की कन्याओं का पूजन महा सुखकारी है,
जिनकी आयु इस तरह है—
पहली कन्या तीन बरस की, जिसकी महिमा भारी है।
श्रद्धा-भाव से इन्हें बुलाकर आसन पर बैठाओ,
मोक्ष, अर्थ और काम इन्हीं की दया-दृष्टि से पाओ।
करो-करो जी...
॥ अंतरा २ ॥
दूजी कन्या ‘कल्याणी’ के नाम से जानी जाती है,
चार बरस की प्यारी-प्यारी, विद्या-विजय दिलाती है।
पाँच बरस की कन्या सुन्दर, इसके चरण धुलाओ,
रोग नष्ट हो जाएँगे, सब जीवन भर सुख पाओ।
करो-करो जी...
॥ अंतरा ३ ॥
जिसकी आयु छः वर्ष की, वो कन्या तो न्यारी है,
साक्षात काली का रूप है, शत्रु पे जो भारी है।
सात बरस की कन्या पावन, जिसके घर में आई,
लख्खा उसके घर में लक्ष्मी स्वयं है चलकर आई।
करो-करो जी...
॥ अंतरा ४ ॥
आठ बरस की जो है कन्या, भक्तों के मन भाती है,
जिस घर जाती उस घर के आँगन में सुख बरसाती है।
नव-दुर्गा का रूप वो कन्या, आयु नौ वर्ष वाली,
होती सिद्ध साधना उसकी, जिसने लगन लगा ली।
करो-करो जी...
॥ अंतरा ५ ॥
जिस कन्या की उम्र दस बरस, दुःख भक्तों के टाले,
नहीं भटकने दे जीवन में, हर पल यही संभाले।
इनका पूजन करके जो भी भोजन इन्हें कराए,
कहता लख्खा, सुनो बेधड़क—सुख-सम्पत्ति वो पाए।
करो-करो जी...
🎵 गायक/लेखक: लखबीर सिंह लक्खा | नवरात्रि कन्या पूजन भजन
🙏 भजन का अर्थ और संदेश
यह भजन लखबीर सिंह लक्खा द्वारा रचित और गाया गया है, जो नवरात्रि के पावन अवसर पर कन्या पूजन (कंजक) की महिमा का वर्णन करता है। "करो-करो जी, कन्या पूजन करो-करो जी" – आओ, कन्या पूजन करो। "सुख-सम्पत्ति, ऐश्वर्य दान दे, विजय-रूप यश-फल महान दे" – कन्या पूजन सुख, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, विजय और यश प्रदान करता है।
भजन में आठ प्रकार की कन्याओं (तीन से दस वर्ष तक) का वर्णन है और उनकी पूजा से होने वाले लाभ बताए गए हैं:
- तीन वर्ष की कन्या: महिमा भारी, श्रद्धा से पूजने पर मोक्ष, अर्थ और काम की प्राप्ति
- चार वर्ष की कन्या (कल्याणी): विद्या और विजय देने वाली
- पाँच वर्ष की कन्या: चरण धोने से रोग नष्ट होते हैं और सुख मिलता है
- छः वर्ष की कन्या: साक्षात काली का रूप, शत्रुओं पर भारी
- सात वर्ष की कन्या: पावन, घर में लक्ष्मी स्वयं आती है
- आठ वर्ष की कन्या: जिस घर जाती है, वहाँ सुख बरसाती है
- नौ वर्ष की कन्या: नवदुर्गा का स्वरूप, साधना सिद्ध होती है
- दस वर्ष की कन्या: दुःख दूर करती है, जीवन में सहारा देती है
अंत में कहा गया है कि जो कोई इन कन्याओं का पूजन करके भोजन कराता है, उसे सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। यह भजन कन्या पूजन की परंपरा और उसके आध्यात्मिक लाभों को विस्तार से समझाता है।
🌸 कन्या पूजन – नवरात्रि की विशेष परंपरा
कन्या पूजन (कंजक) नवरात्रि के अष्टमी या नवमी के दिन किया जाता है। आठ या नौ कन्याओं को भोजन कराया जाता है, उनके चरण धोए जाते हैं, तिलक लगाया जाता है, और उपहार दिए जाते हैं। इन कन्याओं में देवी शक्ति का वास माना जाता है।
इस भजन में वर्णित "आठ तरह की कन्याएँ" 3 से 10 वर्ष की आयु की होती हैं, जिनकी पूजा का विशेष फल बताया गया है। भजनकार लखबीर सिंह लक्खा ने इनके नाम, गुण और प्रभाव को बड़े सरल शब्दों में समझाया है।
🔍 भजन का विशेष महत्त्व
🌸 विभिन्न आयु की कन्याओं का महत्व
यह भजन कन्या पूजन की परंपरा को विस्तार से समझाता है। तीन से दस वर्ष की कन्याएँ अलग-अलग देवी स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं और उनकी पूजा के अलग-अलग लाभ हैं।
🎉 सरल और उल्लासपूर्ण भाषा
"करो-करो जी" की पुनरावृत्ति भक्तों को उत्साहित करती है। यह सामूहिक रूप से कन्या पूजन में भाग लेने का आह्वान है।
🎯 संदेश : कन्या पूजन महा सुखकारी है। तीन से दस वर्ष की कन्याएँ अलग-अलग देवी स्वरूप हैं। श्रद्धा-भाव से इनका पूजन करने से सुख-सम्पत्ति, ऐश्वर्य, विद्या-विजय, रोग-नाश, लक्ष्मी की प्राप्ति और सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ
यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "करो-करो जी, कन्या पूजन करो-करो जी – लखबीर सिंह लक्खा | Navratri Kanya Pujan Bhajan" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।
भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।
🔍 विशेष महत्त्व और लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।
🕒 साधना एवं गायन विधि
भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।
भजनों को गाने की सही विधि क्या है?
भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।
क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?
हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।
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