ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
अष्टांगहृदय आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसकी रचना वाग्भटाचार्य ने की थी। यह ग्रंथ आयुर्वेद के आठ अंगों (अष्टांग) – कायचिकित्सा, बालरोग, ग्रहचिकित्सा, ऊर्ध्वांगरोग, शल्य, दंष्ट्रारोग, जराचिकित्सा, और वाजीकरण – का संक्षिप्त एवं सारगर्भित विवरण देता है। अष्टांगहृदय में छह स्थान हैं – सूत्रस्थान, शारीरस्थान, निदानस्थान, चिकित्सास्थान, कल्पस्थान, और उत्तरस्थान। कुल १२० अध्यायों में रोग-निदान, चिकित्सा, औषधि-योग, और स्वस्थवृत्त का सुव्यवस्थित वर्णन है।
वाग्भट ने अपने ग्रंथ को सरल, संक्षिप्त और प्रयोग-प्रधान बनाया है। अष्टांगहृदय की विशेषता है – दोष-प्रकोप के अनुसार चिकित्सा का वर्गीकरण, पंचकर्म की सरल विधियाँ, और सामान्य रोगों के लिए प्रभावी औषधि-योग। यह ग्रंथ आयुर्वेद के व्यावहारिक पक्ष को सामने रखता है और आज भी चिकित्सकों द्वारा सर्वाधिक प्रयोग किया जाता है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल संस्कृत श्लोकों के साथ सरल भाषा में अर्थ और व्याख्या दी गई है। यह पुस्तक आयुर्वेद के छात्रों, चिकित्सकों और सामान्य जन के लिए समान रूप से उपयोगी है।