ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
बृहदारण्यकोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से संबद्ध सबसे बड़ी उपनिषद् है। इसमें छह अध्याय हैं, जिनमें याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी, गार्गी आदि के संवाद अत्यंत प्रसिद्ध हैं। यह उपनिषद् ब्रह्मज्ञान, आत्मा का स्वरूप, और संन्यास के मार्ग का विस्तृत विवेचन करती है।
इस उपनिषद् में "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ब्रह्म हूँ) और "अयमात्मा ब्रह्म" (यह आत्मा ब्रह्म है) जैसे महावाक्य आते हैं। याज्ञवल्क्य ने अपनी दोनों पत्नियों – मैत्रेयी और कात्यायनी – को ज्ञान और कर्म का भेद समझाया। गार्गी ने याज्ञवल्क्य से ब्रह्म के संबंध में गहन प्रश्न किए।
बृहदारण्यकोपनिषद् में अश्वमेध यज्ञ का प्रतीकात्मक अर्थ भी बताया गया है। यह उपनिषद् वेदांत दर्शन का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। इसमें ब्रह्म को "सत्यस्य सत्यम्" कहकर सर्वोच्च सत्य के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल संस्कृत मंत्रों के साथ सरल भाषा में अर्थ, पदच्छेद और विस्तृत व्याख्या दी गई है। यह संस्करण वेदांत के अध्ययन, आध्यात्मिक साधना और शोध के लिए अत्यंत उपयोगी है।