ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
छन्दःशास्त्र वेदांगों में पाँचवाँ अंग है, जो वैदिक मंत्रों के छंदों (मीटर) का विज्ञान है। इसके प्रणेता आचार्य पिंगल माने जाते हैं, जिन्होंने "छन्दःसूत्र" की रचना की। इसमें गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती, अतिजगती आदि वैदिक छंदों के अक्षर-संख्या, गण, मात्रा और लय के नियम बताए गए हैं।
छन्दःशास्त्र केवल वैदिक छंदों तक सीमित नहीं है, बल्कि लौकिक संस्कृत काव्य के छंदों (जैसे श्लोक, वसंततिलका, मालिनी, शिखरिणी, मन्दाक्रान्ता आदि) का भी विस्तृत विवेचन करता है। पिंगल ने इस ग्रंथ में छंदों की गणना के लिए "प्रस्तार", "नष्ट", "उद्दिष्ट", "संख्यांक" आदि विधियाँ प्रतिपादित कीं, जो बाद में गणित और संगीत में भी उपयोगी सिद्ध हुईं।
छंद ही काव्य के प्राण हैं। उचित छंद का चयन करके कवि भाव और लय का समन्वय स्थापित करता है। प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में पिंगल के सूत्रों के साथ छंदों की पहचान, लक्षण और उदाहरण दिए गए हैं। यह पुस्तक कवियों, साहित्यकारों, और संस्कृत अध्येताओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।