ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
गौडपादकारिका आचार्य गौडपाद द्वारा रचित अद्वैत वेदांत का प्राचीनतम और प्रथम व्यवस्थित ग्रंथ है। यह माण्डूक्य उपनिषद् पर आधारित है। इसमें चार अध्याय (प्रकरण) हैं – आगमप्रकरण, वैतथ्यप्रकरण, अद्वैतप्रकरण, और अलातशान्तिप्रकरण। कुल २१५ कारिकाएँ हैं।
गौडपाद ने इस ग्रंथ में अद्वैत वेदांत के मूल सिद्धांत – अजातिवाद (जगत का अनुत्पन्न होना), माया, ब्रह्म और आत्मा की अभिन्नता, और उपनिषदों के महावाक्यों (तत्त्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि) का सूक्ष्म विवेचन प्रस्तुत किया है। चौथे अध्याय (अलातशान्ति) में योग और अद्वैत का समन्वय दिखता है।
गौडपादकारिका अद्वैत वेदांत की आधारशिला है। शंकराचार्य ने इस पर भाष्य लिखकर अद्वैत दर्शन को सुस्थापित किया।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल कारिकाओं के साथ सरल भाषा में अर्थ और व्याख्या दी गई है। यह ग्रंथ अद्वैत दर्शन के अध्ययन, साधना, और शोध के लिए अनिवार्य है।