ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
कैवल्योपनिषद् अथर्ववेद से संबद्ध है। "कैवल्य" का अर्थ है मोक्ष, पूर्ण एकता। यह उपनिषद् संन्यास और अद्वैत साधना पर केंद्रित है। इसमें ब्रह्म को "सच्चिदानंद" के रूप में वर्णित किया गया है।
उपनिषद् के प्रारंभ में ब्रह्मचारी अश्वलायन ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिए परमेश्वर की आराधना करते हैं। इसमें योग, ध्यान, और ओंकार की साधना से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। प्रसिद्ध मंत्र "सोऽहम्" (मैं वह हूँ) का भाव यहाँ स्पष्ट है।
कैवल्योपनिषद् में "कैवल्य" अवस्था को ही परम लक्ष्य बताया गया है, जहाँ जीव और ब्रह्म का भेद नहीं रहता। यह उपनिषद् विशेष रूप से संन्यासियों और योग साधकों के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल संस्कृत मंत्रों के साथ सरल भाषा में अर्थ, पदच्छेद और विस्तृत व्याख्या दी गई है। यह संस्करण वेदांत के अध्ययन, आध्यात्मिक साधना और शोध के लिए अत्यंत उपयोगी है।