ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
कल्प वेदों का छठा अंग है, जो यज्ञों, अनुष्ठानों और धार्मिक कृत्यों के विधि-विधान का प्रतिपादक है। कल्पसूत्र ग्रंथ श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र और शुल्बसूत्र – इन चार भागों में विभक्त हैं। श्रौतसूत्रों में वैदिक यज्ञों की विस्तृत प्रक्रिया है; गृह्यसूत्रों में गृहस्थ के षोडश संस्कारों से लेकर दैनिक कर्मकांड तक का वर्णन है; धर्मसूत्रों में सामाजिक और नैतिक कर्तव्यों का निरूपण है; और शुल्बसूत्रों में यज्ञ-वेदियों के निर्माण हेतु ज्यामिति के सूत्र दिए गए हैं।
कल्पसूत्रों में सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध बौधायन, आपस्तम्ब, कात्यायन, और गोभिल के सूत्र हैं। ये ग्रंथ वैदिक काल से लेकर उत्तर-वैदिक काल तक की सामाजिक, धार्मिक और वैज्ञानिक चेतना के दर्पण हैं। इनमें वर्णित शुल्बसूत्रों में पाइथागोरस प्रमेय से भी पूर्व पाई-थैगोरस संबंधी सूत्र मिलते हैं, जो प्राचीन भारतीय ज्यामिति की उच्चता दर्शाते हैं।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में कल्पसूत्रों के प्रमुख अंशों – विशेषकर गृह्यसूत्रों और शुल्बसूत्रों – को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। यह पुस्तक संस्कार विधि, यज्ञ प्रक्रिया, और प्राचीन भारतीय ज्यामिति के अध्ययन के लिए उपयोगी है।