ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
लिङ्ग पुराण अट्ठारह महापुराणों में से एक है और शैव संप्रदाय का प्रमुख ग्रंथ है। इसमें भगवान शिव के लिङ्ग स्वरूप की महिमा का विस्तृत वर्णन है। यह पुराण दो भागों में विभक्त है – पूर्वभाग और उत्तरभाग। इसमें सृष्टि, लिङ्ग की उत्पत्ति, शिव के अवतार, व्रत, तीर्थ और मोक्ष का उपदेश है।
पूर्वभाग में सृष्टि की रचना, प्रजापतियों की वंशावली, और शिवलिङ्ग के प्राकट्य की कथा (स्तम्भेश्वर) है। इसमें शिव सहस्रनाम, रुद्राध्याय और शिव पूजा की विधियाँ दी गई हैं। उत्तरभाग में तीर्थों का माहात्म्य, योग, संन्यास और मोक्ष के सिद्धांत बताए गए हैं।
लिङ्ग पुराण की एक विशेषता यह है कि इसमें शिव और विष्णु के अभेद का उपदेश दिया गया है। इसे पढ़ने से शिवलोक की प्राप्ति होती है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल श्लोकों के साथ सरल भाषा में अर्थ दिया गया है। यह ग्रंथ शिव भक्तों, तीर्थयात्रियों और साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है।