ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
नारद पुराण अट्ठारह महापुराणों में से एक है। यह देवर्षि नारद द्वारा सनत्कुमार को दिए गए उपदेशों का संग्रह है। इस पुराण में धर्म, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष, मंत्र-तंत्र और भक्ति का अत्यंत विस्तृत वर्णन है। इसे "बृहन्नारदीय पुराण" भी कहा जाता है।
नारद पुराण दो भागों में विभक्त है – पूर्वभाग और उत्तरभाग। पूर्वभाग में व्रतों, त्योहारों, तीर्थयात्रा के महत्व और उनके करने की विधियाँ बताई गई हैं। इसमें गायत्री मंत्र, शिवलिंग पूजा, विष्णु सहस्रनाम, दुर्गा सप्तशती जैसे स्तोत्रों का उल्लेख भी है। उत्तरभाग अधिक दार्शनिक है – इसमें ज्ञान, योग, संन्यास और मोक्ष के सिद्धांतों का वर्णन है। विशेष रूप से "भक्ति विज्ञान" नामक अध्याय में नवधा भक्ति के लक्षण बताए गए हैं।
इस पुराण की एक अनूठी विशेषता यह है कि इसमें भगवान कृष्ण के गोलोक धाम का वर्णन मिलता है। साथ ही, गणेश जी, सूर्यदेव, शिवजी और देवी की उपासना पद्धतियाँ भी दी गई हैं। नारद पुराण में ज्योतिष (फलित ज्योतिष) का भी विस्तृत खंड है, जिसमें ग्रहों के शुभ-अशुभ प्रभाव और उपाय बताए गए हैं।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल श्लोकों के साथ सरल भाषा में अर्थ दिया गया है। यह पुराण उन साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है जो व्रत-त्योहारों की विधि, तीर्थों का महत्व और भक्ति मार्ग की गहरी समझ प्राप्त करना चाहते हैं।