ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
न्यायसूत्र महर्षि गौतम द्वारा रचित भारतीय दर्शन का प्राचीनतम ग्रंथ है। यह न्याय दर्शन का मूल ग्रंथ है, जो तर्कशास्त्र, प्रमाणशास्त्र, और वाद-विवाद की पद्धति पर केंद्रित है। न्यायसूत्र में पाँच अध्याय हैं, प्रत्येक अध्याय में दो आह्निक (खंड) हैं। कुल ५२८ सूत्र हैं।
न्याय दर्शन के अनुसार प्रमाण (प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द) के माध्यम से सत्य का ज्ञान होता है। इसमें प्रमेय (ज्ञेय पदार्थ), संशय, प्रयोजन, दृष्टांत, सिद्धांत, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितंडा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रहस्थान आदि विषयों का विस्तृत विश्लेषण है। न्यायसूत्र ने भारतीय तर्कशास्त्र की नींव रखी और बाद के सभी दार्शनिक ग्रंथों को प्रभावित किया।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल सूत्रों के साथ सरल भाषा में व्याख्या दी गई है। यह ग्रंथ दर्शनशास्त्र के छात्रों, तर्कशास्त्रियों, और शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।