ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
सामवेद चार वेदों में द्वितीय है। इसे "वेदों का गान" या "संगीत का वेद" कहा जाता है। सामवेद में १८७५ मंत्र हैं, जिनमें से अधिकांश ऋग्वेद से लिए गए हैं, किन्तु उनका उच्चारण गायन के लिए विशेष स्वरों (सामगान) में किया जाता है। सामवेद के मंत्रों को "साम" कहते हैं।
सामवेद दो भागों में विभक्त है – पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक। पूर्वार्चिक में ऋग्वेद के मंत्रों को ग्रामेयगान (गाँवों में गाए जाने वाले) और आरण्यकगान (वनों में गाए जाने वाले) के रूप में विभाजित किया गया है। उत्तरार्चिक में साम का प्रयोग यज्ञों और विशेष अनुष्ठानों के लिए किया जाता है।
सामवेद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसने भारतीय संगीत की नींव रखी। सात स्वर (सा, रे, ग, म, प, ध, नि) का उल्लेख सर्वप्रथम सामवेद में मिलता है। यह वेद यज्ञों में ऋत्विजों द्वारा गाया जाता था। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं – "वेदानां सामवेदोऽस्मि" (मैं वेदों में सामवेद हूँ)।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल साम मंत्रों के साथ गान की विधि और अर्थ दिया गया है। यह संस्करण संगीत प्रेमियों, वैदिक अनुष्ठान करने वालों और शोधार्थियों के लिए अमूल्य है।