ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
यजुर्वेद चार वेदों में तृतीय है। इसे "कर्मकांड का वेद" कहा जाता है। यह वेद यज्ञों और अनुष्ठानों में प्रयुक्त मंत्रों एवं विधियों का संग्रह है। यजुर्वेद दो प्रमुख शाखाओं में विभक्त है – शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता) और कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता)।
यजुर्वेद के मंत्र यज्ञ के विभिन्न अवसरों पर ऋत्विजों द्वारा उच्चारित किए जाते हैं। इसमें यज्ञों की रचना, हवि, देवताओं का आह्वान, और यज्ञ फल का वर्णन है। शुक्ल यजुर्वेद में ४० अध्याय हैं, जिनमें "शिव संकल्प सूक्त", "श्री रुद्रम्" (नमकम) प्रसिद्ध हैं। कृष्ण यजुर्वेद में तैत्तिरीय संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद (तैत्तिरीय उपनिषद) सम्मिलित हैं।
यजुर्वेद केवल यज्ञीय विधियों का संग्रह नहीं है; इसमें दार्शनिक रहस्य भी छिपे हैं। "ईशावास्य उपनिषद" शुक्ल यजुर्वेद के अंतिम अध्याय से ली गई है, जो ज्ञान और कर्म के समन्वय का अद्वितीय उपदेश देती है। यजुर्वेद का अध्ययन कर्मकांड और आध्यात्मिक ज्ञान दोनों के लिए आवश्यक है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल मंत्रों के साथ यज्ञ विधियों की व्याख्या दी गई है। यह संस्करण यज्ञ करने वालों, पुरोहितों और वैदिक अध्ययन करने वालों के लिए उपयोगी है।