पौराणिक परिचय, उत्पत्ति एवं आध्यात्मिक महत्व
सनातन धर्म में एकादशी का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'कामदा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, यह एकादशी सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली और समस्त पापों का नाश करने वाली है। पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को इस एकादशी का माहात्म्य सुनाया था। यह दिन भगवान वासुदेव की आराधना के लिए समर्पित है। इस व्रत का प्रभाव इतना गहरा है कि यह ब्रह्महत्या जैसे महापाप को भी नष्ट करने में सक्षम है। प्राचीन काल में राजा दिलीप और महर्षि वशिष्ठ के संवाद के माध्यम से इस व्रत की महिमा का वर्णन मिलता है। यह एकादशी न केवल भौतिक सुखों की प्राप्ति कराती है, बल्कि मोक्ष का मार्ग भी प्रशस्त करती है। जो भक्त श्रद्धापूर्वक इस दिन भगवान वासुदेव का पूजन करते हैं, उनके जीवन से अंधकार दूर हो जाता है और वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के अधिकारी बनते हैं। इस दिन का व्रत करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
ललित और ललिता गंधर्व की प्रेम गाथा और श्राप का कारण
प्राचीन काल में भोगवती नामक एक अत्यंत समृद्ध और सुंदर नगर था। उस नगर में पुंडरीक नामक राजा राज्य करते थे। उस नगर की सुंदरता का वर्णन करना असंभव था, जहाँ गंधर्व, किन्नर और अप्सराएं निवास करती थीं। उसी नगर में ललित नामक एक अत्यंत सुंदर और कलाप्रिय गंधर्व रहता था। ललित की पत्नी का नाम ललिता था, जो अत्यंत रूपवती और पतिव्रता थी। दोनों का प्रेम अटूट था। एक दिन ललित राजदरबार में गान कर रहा था, तभी उसका ध्यान अपनी पत्नी ललिता की ओर चला गया। अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक आसक्ति के कारण ललित का सुर और ताल बिगड़ गया। राजा पुंडरीक ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर ललित को श्राप दे दिया कि वह एक नीच राक्षस बन जाए। राजा के श्राप से ललित तुरंत ही एक भयंकर राक्षस में परिवर्तित हो गया। उसकी काया विशाल हो गई और वह अत्यंत कुरूप हो गया। ललिता अपने पति की यह दशा देखकर अत्यंत दुखी हुई और विलाप करने लगी। वह अपने पति के साथ वनों में भटकती रही, लेकिन अपने पति के प्रति उसका प्रेम कम नहीं हुआ। वह निरंतर अपने पति की मुक्ति के लिए उपाय खोजती रही।
श्रृंगी ऋषि का आश्रम और मुक्ति का मार्ग
अपने पति की मुक्ति के लिए ललिता भटकते हुए विंध्याचल पर्वत पर स्थित महर्षि श्रृंगी के आश्रम में पहुँची। महर्षि श्रृंगी साक्षात ब्रह्म के समान तेजस्वी थे। ललिता ने उनके चरणों में गिरकर अपने पति की दुर्दशा का वर्णन किया और उनसे उद्धार का मार्ग पूछा। महर्षि श्रृंगी ने अपनी दिव्य दृष्टि से सब कुछ जान लिया। उन्होंने ललिता को चैत्र शुक्ल पक्ष की 'कामदा एकादशी' का व्रत करने का परामर्श दिया। ऋषि ने कहा कि यदि तुम श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान वासुदेव का व्रत करोगी, तो तुम्हारे पति को अवश्य ही इस राक्षस योनि से मुक्ति मिलेगी। ललिता ने महर्षि के वचनों को शिरोधार्य किया और पूरे विधि-विधान से कामदा एकादशी का व्रत किया। एकादशी के अगले दिन, द्वादशी तिथि को ललिता ने भगवान वासुदेव के समक्ष प्रार्थना की कि उसके व्रत का पुण्य फल उसके पति को प्राप्त हो। जैसे ही ललिता ने यह संकल्प लिया, भगवान की कृपा से ललित का राक्षस रूप तत्काल समाप्त हो गया और वह पुनः अपने दिव्य गंधर्व स्वरूप में लौट आया। दोनों ने महर्षि श्रृंगी का धन्यवाद किया और पुनः अपने लोक को प्रस्थान किया।
सम्पूर्ण पाठ विधि, नियम, शुभ मुहूर्त एवं सावधानियां
कामदा एकादशी का व्रत करने के लिए दशमी तिथि से ही सात्विक नियमों का पालन करना चाहिए। एकादशी के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके पश्चात भगवान वासुदेव की प्रतिमा या चित्र के समक्ष बैठकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। पूजा में धूप, दीप, नैवेद्य, ऋतु फल और तुलसी दल का प्रयोग अनिवार्य है। भगवान को पंचामृत से स्नान कराकर उनका श्रृंगार करना चाहिए। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर जप करना अत्यंत फलदायी होता है। इस दिन अन्न का त्याग करना चाहिए और यदि संभव हो तो निर्जला व्रत रखें, अन्यथा फलाहार किया जा सकता है। रात्रि में जागरण कर भगवान के भजनों और कथा का श्रवण करना चाहिए। द्वादशी तिथि को ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिए। इस दिन किसी की निंदा न करें, क्रोध से बचें और मन को पूर्णतः भक्ति में लीन रखें। यह व्रत मन की शुद्धि और आत्मिक शांति का सर्वोत्तम साधन है।
यह पावन पौराणिक कथा एवं व्रत विधान उपलब्ध धार्मिक शास्त्रों (पद्म पुराण, स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, श्रीमद्भागवत एवं अन्य प्रामाणिक संदर्भों) के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा शोध एवं समीक्षा उपरांत सरल हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य सनातन धर्म की अमूल्य परंपराओं एवं नैतिक शिक्षाओं का जन-जन तक प्रसार करना है।
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