एकादशी देवी / श्री हरि पौराणिक व्रत कथा संदर्भ एवं व्याख्या सहित

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा, पूजा विधि एवं महत्व

सम्पूर्ण उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा, पूजा विधि, नियम एवं माहात्म्य। Read complete Utpanna Ekadashi Vrat Katha with puja vidhi & spiritual importance in Hindi.

पावन श्रेणियाँ:
सभी कथाएँ भगवान विष्णु भगवान शिव श्री कृष्ण लीला श्री राम कथा माँ दुर्गा श्री गणेश श्री हनुमान एकादशी व्रत
Advertisement

पौराणिक परिचय, उत्पत्ति एवं आध्यात्मिक महत्व

सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ है। एकादशी तिथि भगवान श्री विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इसे पापों का नाश करने वाली तथा मोक्ष प्रदान करने वाली महातिथि माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि सभी व्रतों में एकादशी का व्रत करने से मनुष्य के पूर्वजन्मों के समस्त संचित पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे भगवान वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है। मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस पावन तिथि का महत्व इसलिए भी अद्वितीय है क्योंकि इसी दिन प्रत्यक्ष रूप से एकादशी देवी का प्राकट्य श्री विष्णु के शरीर से हुआ था। पद्म पुराण और स्कंद पुराण जैसे महान ग्रंथों में इस व्रत का अत्यंत सुंदर और विस्तृत वर्णन मिलता है। जब-जब पृथ्वी पर अधर्म और पाप का भार बढ़ता है तथा मनुष्य मोह-माया के जाल में फंसकर अपने कर्तव्य मार्ग से भटक जाता है, तब-तब भगवान श्री हरि विभिन्न रूपों और व्रतों के माध्यम से मानव जाति का मार्गदर्शक बनकर उन्हें उद्धार का मार्ग दिखाते हैं। एकादशी का व्रत केवल उपवास रखना भर नहीं है, बल्कि यह भौतिक बंधनों से मुक्त होकर अपनी आत्मा को परमात्मा के चरणों में समर्पित करने का एक दिव्य अवसर है। जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति भाव से उत्पन्ना एकादशी का व्रत रखता है, उसे अश्वमेघ यज्ञ और राजसूय यज्ञ करने के समान पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। इस व्रत के माहात्म्य को सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिल जाता है। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—सभी युगों में एकादशी व्रत का प्रभाव अचूक और शाश्वत माना गया है। कलियुग में तो इसे भवसागर से पार उतरने के लिए नौका के समान बताया गया है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन को एकादशी के माहात्म्य के बारे में बताते हुए कहा था कि जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न ग्रहण नहीं करता, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अंततः मेरे परम धाम को प्राप्त होता है। उत्पन्ना एकादशी इस श्रृंखला की प्रथम कड़ी है, क्योंकि इसी तिथि से एकादशी व्रतों की शुरुआत हुई थी और एकादशी देवी ने प्रकट होकर दुष्ट राक्षसों का संहार किया था।

उत्पन्ना एकादशी के प्राकट्य की पौराणिक कथा और मुर राक्षस का वध

पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार, सत्ययुग में मुर नामक एक अत्यंत बलशाली, क्रूर और अजेय राक्षस हुआ करता था। वह राक्षस इतना अधिक शक्तिशाली था कि उसने देवराज इंद्र, अग्नि देव, वरुण, वायु और यमराज समेत सभी देवी-देवताओं को पराजित कर स्वर्ग लोक पर अधिकार जमा लिया था। मुर राक्षस के आतंक से त्रस्त होकर सभी देवता भयभीत हो गए और अपने प्राण बचाने के लिए इधर-उधर भटकने लगे। तब सभी देवताओं ने मिलकर जगत के पालनहार भगवान विष्णु की शरण लेने का निर्णय किया और क्षीरसागर पहुंचे। वहां जाकर देवताओं ने भगवान श्री हरि की स्तुति की और अपनी व्यथा सुनाई। देवताओं ने कहा, हे प्रभु! मुर नामक राक्षस ने हम सभी को हमारे स्थानों से निष्कासित कर दिया है और स्वर्ग पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है। अब आप ही हमारे एकमात्र रक्षक हैं, कृपया इस संकट से हमारी रक्षा कीजिए। देवताओं की करुण पुकार सुनकर भगवान श्री विष्णु को अत्यंत दया आई और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे स्वयं उस दुष्ट राक्षस का संहार करेंगे। इसके पश्चात भगवान विष्णु ने राक्षस मुर के साथ भीषण युद्ध आरंभ कर दिया। यह युद्ध कई वर्षों तक चलता रहा। भगवान विष्णु के प्रहारों से मुर राक्षस की सेना नष्ट होने लगी, परंतु मुर राक्षस अपनी मायावी शक्तियों के बल पर निरंतर युद्ध में बना रहा। भगवान विष्णु ने जब देखा कि साधारण अस्त्र-शस्त्रों से इस राक्षस का वध करना संभव नहीं है, तब उन्होंने योगनिद्रा का आश्रय लेने का निश्चय किया। भगवान विष्णु बद्रिकाश्रम चले गए और वहां एक सुंदर और विशाल गुफामध्ये विश्राम करने के लिए लेट गए। राक्षस मुर भगवान विष्णु का पीछा करते हुए उस गुफा तक पहुंच गया और सोते हुए भगवान को मारने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा, तभी भगवान के शरीर से एक अत्यंत तेजोमय और दिव्य कन्या प्रकट हुई। उस कन्या के शरीर से निकलती हुई दिव्य कांति से संपूर्ण गुफा प्रकाशित हो गई। उस कन्या ने अपने अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर राक्षस मुर को युद्ध के लिएललकारा। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ और उस देवी ने अपने एक ही प्रहार से राक्षस मुर का सिर धड़ से अलग कर दिया। जब भगवान विष्णु की नींद खुली और उन्होंने देखा कि राक्षस मुर मारा जा चुका है और उनके शरीर से उत्पन्न हुई कन्या उनके सामने खड़ी है, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। भगवान ने उस कन्या से कहा कि हे देवी! तुमने मेरी योगनिद्रा अवस्था में मेरी रक्षा की है और इस दुष्ट राक्षस का वध किया है, इसलिए आज से तुम 'एकादशी' के नाम से त्रिलोकी में पूजित होगी। जो भी मनुष्य तुम्हारा व्रत करेगा, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे और उसे मेरी परम भक्ति प्राप्त होगी। तभी से मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के रूप में मनाया जाने लगा।

सम्पूर्ण पाठ विधि, नियम, शुभ मुहूर्त एवं सावधानियां

उत्पन्ना एकादशी का व्रत अत्यंत विधि-विधान और पवित्रता के साथ किया जाता है। व्रत के नियमों का पालन दशमी तिथि की रात्रि से ही आरंभ हो जाता है। दशमी तिथि को व्रती को सूर्यास्त के पश्चात भोजन नहीं करना चाहिए और सात्विक आहार का ही सेवन करना चाहिए। एकादशी के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान-ध्यान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके पश्चात भगवान श्री विष्णु और एकादशी देवी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संकल्प लेते समय मन में पूर्ण श्रद्धा और समर्पण होना चाहिए। घर के पूजा स्थल या ईशान कोण में एक चौकी स्थापित करें और उस पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान श्री विष्णु तथा माता एकादशी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। इसके बाद भगवान का गंगाजल से अभिषेक करें। पूजा में भगवान को पीले वस्त्र, पीले पुष्प, गंध, अक्षत, रोली, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। एकादशी के दिन भगवान श्री विष्णु को तुलसी दल अवश्य अर्पित किया जाना चाहिए, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान भोग स्वीकार नहीं करते हैं। भोग में मौसमी फल, मिष्ठान, पंचामृत और सात्विक व्यंजनों का उपयोग करना चाहिए। पूजा के दौरान 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर जाप करना चाहिए। इसके साथ ही उत्पन्ना एकादशी की पौराणिक कथा का पाठ करना या सुनना अत्यंत फलदायी माना जाता है। दिनभर उपवास रखना चाहिए और यदि स्वास्थ्य अनुमति न दे तो फलाहार किया जा सकता है, परंतु अन्न का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए। एकादशी की रात्रि में भगवान का जागरण करना और भजन-कीर्तन करना विशेष पुण्यकारी माना जाता है। रात्रि के समय सोने से बचना चाहिए और अपना अधिकांश समय भगवान के स्मरण में बिताना चाहिए। व्रत के अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को सूर्योदय के पश्चात ब्राह्मणों को भोजन कराने और दान-दक्षिण देने के बाद ही व्रत का पारण करना चाहिए। पारण का समय पंचांग के अनुसार बहुत महत्वपूर्ण होता है, इसलिए द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले ही व्रत खोल लेना चाहिए। पारण के समय सबसे पहले तुलसी पत्र का सेवन करना चाहिए और उसके बाद सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए।

सम्पूर्ण फलश्रुति, धार्मिक लाभ एवं प्रभाव

उत्पन्ना एकादशी का व्रत केवल शारीरिक शुद्धि का साधन नहीं है, बल्कि यह आत्मा के रूपांतरण और चेतना के उत्थान का एक अत्यंत शक्तिशाली आध्यात्मिक अनुष्ठान है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, मनुष्य द्वारा जाने-अनजाने में किए गए पापों का प्रायश्चित करने के लिए एकादशी से बढ़कर कोई दूसरा उपाय नहीं है। ब्रह्महत्या, स्वर्ण चोरी, मदिरापान और गुरु-निंदा जैसे महापाप भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाते हैं। जब कोई साधक उत्पन्ना एकादशी के दिन अन्न का त्याग करता है, तो उसकी इंद्रियां उसके वश में होने लगती हैं। अन्न के त्याग से शरीर का तामसिक और राजसिक प्रभाव कम होता है और सात्विक वृत्तियों का विकास होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में बार-बार इस बात पर बल दिया है कि संयमित जीवन ही आध्यात्मिक प्रगति का आधार है। एकादशी व्रत मनुष्य को यह सिखाता है कि किस प्रकार अपनी वासनाओं और जीव्हा के स्वाद पर नियंत्रण पाया जाए। जब मनुष्य अपनी जीव्हा को नियंत्रित कर लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होने लगती है और वह ईश्वर की ओर उन्मुख होता है। इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आरोग्य का वास होता है। पितरों की तृप्ति के लिए भी एकादशी का व्रत बहुत लाभकारी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि उत्पन्ना एकादशी का व्रत करने से साधक के पूर्वज यदि किसी योनि में कष्ट पा रहे होते हैं, तो उन्हें भी मुक्ति और सद्गति प्राप्त होती है। समाज में धर्म, सत्य और सदाचार की स्थापना के लिए इस व्रत का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। जो परिवार नियमित रूप से एकादशी का व्रत करते हैं, उनके घर में कभी भी अन्न और धन की कमी नहीं होती। क्लेश, वैमनस्य और नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है और सकारात्मक तथा दिव्य ऊर्जा का संचार होता है। इस प्रकार उत्पन्ना एकादशी का यह पावन व्रत मानव जीवन को कृतार्थ करने वाला और मोक्ष के द्वार खोलने वाला महाव्रत है।

Advertisement
संपादकीय नीति एवं प्रामाणिकता संदर्भ

यह पावन पौराणिक कथा एवं व्रत विधान उपलब्ध धार्मिक शास्त्रों (पद्म पुराण, स्कंद पुराण, भविष्य पुराण, श्रीमद्भागवत एवं अन्य प्रामाणिक संदर्भों) के आधार पर भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा शोध एवं समीक्षा उपरांत सरल हिंदी भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य सनातन धर्म की अमूल्य परंपराओं एवं नैतिक शिक्षाओं का जन-जन तक प्रसार करना है।

D
Deepak Kumar Bind

भक्तिलोक के वरिष्ठ धार्मिक शोधकर्ता एवं पौराणिक कथा संपादक। सनातन धर्म, व्रत-त्योहारों, वैदिक अनुष्ठानों और भक्ति परंपराओं पर प्रामाणिक सामग्री प्रस्तुत करने हेतु समर्पित।

संबंधित पावन कथाएँ (Related Kathas)

सभी कथाएँ देखें →

भक्ति विचार एवं टिप्पणियाँ (0)

🕉️ प्रथम टिप्पणीकर्ता बनें और अपने पावन विचार साझा करें।
लिंक कॉपी हो गया है!