पंचामृत (Panchamrit)
पूजा-पाठ और सत्यनारायण कथा में मुख्य रूप से प्रयुक्त होने वाला दिव्य प्रसाद।
आवश्यक सामग्री (टिक करें):
बनाने की सरल विधि:
प्रसाद बनाते समय मन में अशांति या क्रोध के विचार न लाएं। निरंतर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" या गायत्री मंत्र का मानसिक जाप करते हुए भोग तैयार करें। इससे भोजन में सकारात्मक प्राण ऊर्जा का समावेश होता है।
भगवान को भोग लगाने के शास्त्र सम्मत नियम
भगवान को नैवेद्य (भोग) अर्पित करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए:
विष्णु जी और उनके अवतारों (कृष्ण, राम) के भोग में तुलसी का पत्ता डालना अनिवार्य है, अन्यथा भोग स्वीकार नहीं माना जाता।
भोग लगाने के लिए चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी के बर्तनों का उपयोग सर्वोत्तम है। कभी भी स्टील या प्लास्टिक के बर्तनों में भोग न लगाएं।
प्रसाद ग्रहण करने का आध्यात्मिक महत्व
श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो मनुष्य बिना भगवान को समर्पित किए भोजन करता है, वह वास्तव में पाप का भक्षण करता है।
जब हम भोजन पकाने के उपरांत उसे भगवान के चरणों में अर्पित करते हैं, तो उसकी रासायनिक प्रकृति में भी सूक्ष्म बदलाव आता है। यह भक्ति भाव अन्न के भौतिक गुणों को दिव्य प्रसाद में बदल देता है, जिससे मन निर्मल और शांत होता है।
प्रसाद व नैवेद्य संबंधी शंकाएं (FAQs)
संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी
भोग विधि संकलन व संपादन
भक्तिलोक वैदिक पाकशाला विंग (Bhaktilok Vedic Kitchen Wing)
सनातन परम्पराओं में प्रयुक्त होने वाले नैवेद्य, भोग और सात्विक प्रसाद विधियों का प्राचीन ग्रन्थों के आधार पर संकलन करने वाली विंग।
आध्यात्मिक शुचिता समीक्षा
श्रीमती सुधा देवी व्यास (Smt. Sudha Devi Vyas)
पारंपरिक पाक कला व वैदिक आहार विशेषज्ञ। २०+ वर्षों का मंदिर पाकशाला व भंडारा रसोई प्रबंधन अनुभव।
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