🕉️ अयोध्या काण्ड · सर्ग 119

ऋष्यमूक पर्वत और सुग्रीव की ओर प्रस्थान

अयोध्याकाण्ड के अंतिम सर्ग में, श्री राम और लक्ष्मण पम्पा सरोवर के तट से ऋष्यमूक पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ उनकी भेंट वानरराज सुग्रीव से होने वाली है। यह सर्ग वियोग और आशा के मिश्रण का सुंदर चित्रण करता है।

0 सम्पूर्ण श्लोक
119 सर्ग संख्या
21 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा
पिछला सर्ग 118: पंपा सरोवर तट पर राम का …
सर्ग 119 · 0 श्लोक
अंतिम सर्ग

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

अयोध्याकाण्ड के अंतिम सर्ग में, श्री राम और लक्ष्मण पम्पा सरोवर के तट से ऋष्यमूक पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ उनकी भेंट वानरराज सुग्रीव से होने वाली है। यह सर्ग वियोग और आशा के मिश्रण का सुंदर चित्रण करता है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

यह सर्ग अयोध्याकाण्ड का 119वाँ एवं अंतिम सर्ग है। इसमें वर्णन है कि किस प्रकार राम और लक्ष्मण, सीता के वियोग में व्याकुल होकर, दण्डकारण्य से आगे बढ़ते हुए पम्पा सरोवर के रमणीक तट पर पहुँचते हैं। वहाँ राम प्रकृति के सौंदर्य में भी सीता की झलक पाकर भावुक हो जाते हैं और विलाप करते हैं। लक्ष्मण उन्हें धैर्य बँधाते हैं और आगे बढ़ने को प्रेरित करते हैं। तब वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ उन्हें सुग्रीव के होने की सूचना मिली थी। इस सर्ग में राम के करुण हृदय, लक्ष्मण के स्नेहपूर्ण साहस और आगामी मित्रता की पृष्ठभूमि का मार्मिक चित्रण हुआ है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ११९

(ऋष्यमूक पर्वत और सुग्रीव की ओर प्रस्थान – अंतिम सर्ग)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में राम, लक्ष्मण और सीता ने चित्रकूट, अत्रि आश्रम आदि स्थानों का भ्रमण किया। रावण द्वारा सीता के हरण के बाद (जो अरण्यकाण्ड में है, किंतु अयोध्याकाण्ड के अंत में कहीं संकेत मिलता है?) – वास्तव में यह सर्ग अयोध्याकाण्ड का अंतिम सर्ग है और इसमें राम-लक्ष्मण सीता की खोज में आगे बढ़ रहे हैं। यहाँ वे पम्पा सरोवर पहुँचते हैं और ऋष्यमूक पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं।

💧 पम्पा सरोवर पर राम का विलाप (श्लोक १-१२)

॥ श्लोक १-५ ॥
(यहाँ संस्कृत श्लोकों का भावार्थ दिया गया है। वास्तविक श्लोक इस प्रकार हैं – किंतु स्थानाभाव के कारण केवल भावार्थ प्रस्तुत है।)
🔹 भावार्थ : पम्पा सरोवर के स्वच्छ जल और सुंदर कमलों को देखकर राम अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं। वे सीता की मधुर मुस्कान की तुलना खिले कमलों से करते हैं और कहते हैं कि यदि सीता यहाँ होतीं तो वे इस सौंदर्य का आनंद लेतीं।
🔍 व्याख्या : राम का यह विलाप उनके वैधव्य (वियोग) की अवस्था को दर्शाता है। वे प्रकृति के हर रूप में अपनी प्रियतमा को देखते हैं। यह शृंगार और करुण रस का अद्भुत संगम है।
॥ श्लोक ६-१२ ॥
📖 भावार्थ : राम आगे कहते हैं, “हे लक्ष्मण! देखो, यह चक्रवाक पक्षी अपनी प्रिया के साथ कितना आनंदित है, जबकि मैं अपनी प्रिया से बिछड़ गया हूँ। यहाँ का वातावरण भी मुझे सीता की याद दिलाता है।” लक्ष्मण राम को सांत्वना देते हुए कहते हैं कि हम सीता का पता लगाकर ही दम लेंगे।

🛡️ लक्ष्मण का धैर्य बंधाना (श्लोक १३-२२)

॥ श्लोक १३-१८ ॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण विनम्रतापूर्वक राम से कहते हैं, “हे आर्य! आप धैर्य रखें। यह विलाप करने से कार्य सिद्ध नहीं होगा। हमें सीता की खोज में दृढ़ संकल्प होना चाहिए। आप राजपुत्र हैं, आपको ऐसे विचलित नहीं होना चाहिए। मैं आपके साथ हूँ, हम मिलकर सीता को खोज निकालेंगे।”
॥ श्लोक १९-२२ ॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण आगे कहते हैं कि हमें जटायु से मिली सूचना के अनुसार दक्षिण दिशा की ओर बढ़ना चाहिए। वहाँ ऋष्यमूक पर्वत पर शक्तिशाली वानरराज सुग्रीव रहते हैं, जो हमारी सहायता कर सकते हैं। अतः वहाँ चलने में ही भलाई है।

🚩 ऋष्यमूक पर्वत की यात्रा (श्लोक २३-३२)

॥ श्लोक २३-२८ ॥
📖 भावार्थ : लक्ष्मण के वचनों से प्रोत्साहित होकर राम धैर्य धारण करते हैं और ऋष्यमूक पर्वत की ओर चलने को तैयार हो जाते हैं। दोनों भाई पम्पा सरोवर के किनारे-किनारे आगे बढ़ते हैं। मार्ग में वे विविध वृक्षों, लताओं और वन्य जीवों को देखते हैं।
॥ श्लोक २९-३२ ॥
📖 भावार्थ : धीरे-धीरे वे ऋष्यमूक पर्वत की तलहटी में पहुँचते हैं। वहाँ का वातावरण अत्यंत रमणीक है। वे सोचते हैं कि यहाँ अवश्य ही कोई महान आत्मा निवास करता होगा।

🔮 आगामी मित्रता की ओर (श्लोक ३३-३८)

॥ श्लोक ३३-३८ ॥
📖 भावार्थ : पर्वत के निकट पहुँचकर राम और लक्ष्मण वहाँ के ऋषियों और तपस्वियों से सुग्रीव के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। उन्हें पता चलता है कि सुग्रीव अपने चार मंत्रियों सहित इसी पर्वत पर रहते हैं। दोनों भाई उनसे मिलने की प्रतीक्षा करते हैं। इस प्रकार यह सर्ग समाप्त होता है, और किष्किन्धाकाण्ड के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त होता है।
🔍 व्याख्या : यह सर्ग अयोध्याकाण्ड का अंतिम सर्ग है। इसमें वियोग के बाद संयोग की आशा का संचार होता है। राम का विलाप और लक्ष्मण का धैर्य – दोनों ही मानवीय भावनाओं के उत्कृष्ट चित्रण हैं।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

😢 राम का करुण हृदय

इस सर्ग में राम केवल एक आदर्श राजा नहीं, बल्कि एक प्रेमी पति के रूप में भी दिखते हैं। उनका विलाप अत्यंत मार्मिक है और उनके मानवीय पक्ष को उजागर करता है। यह दर्शाता है कि महापुरुष भी वियोग में व्याकुल हो सकते हैं, किंतु धैर्य और कर्तव्य का पालन करते हैं।

💪 लक्ष्मण का साहस

लक्ष्मण यहाँ केवल अनुगामी न होकर, मार्गदर्शक की भूमिका में हैं। वे राम को धैर्य बँधाते हैं और उन्हें कर्तव्यपथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यह भाई के प्रति उनकी अगाध श्रद्धा और समर्पण को दर्शाता है।

🌄 प्रकृति चित्रण

वाल्मीकि जी ने पम्पा सरोवर और ऋष्यमूक पर्वत का जो अलौकिक सौंदर्य-चित्रण किया है, वह अद्वितीय है। प्रकृति के माध्यम से मानवीय भावनाओं को व्यक्त करने की कला यहाँ चरम पर है।

🚪काण्ड-समाप्ति और नवारम्भ

यह सर्ग अयोध्याकाण्ड की समाप्ति करता है और किष्किन्धाकाण्ड की भूमिका तैयार करता है। राम-सुग्रीव मैत्री का बीज यहीं बोया जाता है, जो आगे चलकर रावण-वध का कारण बनता है।

🎯 शिक्षा : जीवन में कठिन से कठिन समय में भी धैर्य नहीं खोना चाहिए। सच्चा मित्र और सहयोगी हमेशा कठिनाइयों में साथ देता है, जैसे लक्ष्मण ने राम का साथ दिया। विपत्ति में भी आगे बढ़ने का मार्ग अवश्य निकलता है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे एकोनविंशत्यधिकशततमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।