🕉️ अयोध्या काण्ड · सर्ग 35

राजदूतों का गिरिव्रज (राजगृह) पहुँचना

राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात वसिष्ठ एवं मंत्रीगण भरत और शत्रुघ्न को वापस बुलाने के लिए दूतों को गिरिव्रज (राजगृह) भेजते हैं। दूत वहाँ पहुँचकर राजकुमारों को अयोध्या लौटने का निमंत्रण देते हैं।

0 सम्पूर्ण श्लोक
35 सर्ग संख्या
29 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

राजा दशरथ की मृत्यु के पश्चात वसिष्ठ एवं मंत्रीगण भरत और शत्रुघ्न को वापस बुलाने के लिए दूतों को गिरिव्रज (राजगृह) भेजते हैं। दूत वहाँ पहुँचकर राजकुमारों को अयोध्या लौटने का निमंत्रण देते हैं।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

यह सर्ग अयोध्या के शोक और आगामी राज्य-संकट के समाधान का वर्णन करता है। राजा दशरथ के स्वर्गवास के बाद, वसिष्ठ और मंत्रीगण भरत और शत्रुघ्न को शीघ्र अयोध्या बुलाने का निर्णय लेते हैं, क्योंकि उनकी अनुपस्थिति में राज्य का भार कैकेयी के पुत्र के रूप में भरत पर ही उचित रूप से आ सकता है, यद्यपि राम वन में हैं। दूतों को शीघ्रता से गिरिव्रज (राजगृह) भेजा जाता है, जहाँ भरत अपने मामा के यहाँ रह रहे हैं। दूत वहाँ पहुँचते हैं, राजमहल में प्रवेश करते हैं, और भरत तथा शत्रुघ्न को अयोध्या लौटने की सूचना देते हैं। भरत को आशंका होती है कि कहीं राम या पिता ने कोई नया निर्णय नहीं लिया है।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ३५

(राजदूतों का गिरिव्रज पहुँचना – भरत के लिए आह्वान)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्गों में राम के वनगमन और राजा दशरथ के स्वर्गवास का वर्णन हुआ। अयोध्या शोकाकुल है और राज्य बिना राजा के है। ऋषि वसिष्ठ एवं मंत्रीगण भरत और शत्रुघ्न को तुरंत बुलाने का निर्णय लेते हैं, जो अपने मामा के यहाँ गिरिव्रज (राजगृह) में हैं। यह सर्ग दूतों की यात्रा और उनके गिरिव्रज पहुँचने की कथा कहता है।

🏃 दूतों का प्रस्थान और गिरिव्रज का मार्ग (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः समेत्य मन्त्रज्ञा वसिष्ठप्रमुखास्तदा ।
दूतान् सम्प्रेषयामासुर्भरतस्य निवेशने ॥
गच्छध्वं भरतं शीघ्रं शत्रुघ्नसहितं प्रियम् ।
आनयध्वं त्वरायुक्ता इत्युक्त्वा मन्त्रिणस्तदा ॥
ते दूता हयमुख्येषु युक्तेषु त्वरितास्तदा ।
प्रययुः कैकयीं देशान् गिरिव्रजमथाब्रुवन् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; समेत्य = एकत्रित होकर; मन्त्रज्ञाः = मंत्रियों ने; वसिष्ठप्रमुखाः = वसिष्ठ के नेतृत्व में; तदा = तब; दूतान् = दूतों को; सम्प्रेषयामासुः = भेजा; भरतस्य निवेशने = भरत के निवास स्थान पर; गच्छध्वम् = जाओ; भरतम् = भरत को; शीघ्रम् = शीघ्र; शत्रुघ्नसहितम् = शत्रुघ्न सहित; प्रियम् = प्रिय को; आनयध्वम् = लाओ; त्वरायुक्ताः = शीघ्रता से; इति = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; मन्त्रिणः = मंत्रियों ने; तदा = तब; ते = वे; दूताः = दूत; हयमुख्येषु = उत्तम घोड़ों पर; युक्तेषु = जुते हुए; त्वरिताः = शीघ्र; तदा = तब; प्रययुः = गए; कैकयीम् देशान् = कैकेयी के देश (केकय) को; गिरिव्रजम् = गिरिव्रज; अथ = तथा; अब्रुवन् = कहा।
📖 भावार्थ : तब वसिष्ठ के नेतृत्व में मंत्रियों ने एकत्रित होकर भरत के निवास स्थान के लिए दूतों को भेजा। उन्होंने कहा, “तुम शीघ्र जाकर भरत और शत्रुघ्न को लेकर आओ।” मंत्रियों के ऐसा कहने पर वे दूत उत्तम घोड़ों पर सवार होकर शीघ्रता से केकय देश की ओर चल पड़े, जहाँ गिरिव्रज नगर स्थित था।
🔍 व्याख्या : यहाँ दूतों की तीव्र गति और मंत्रियों की तत्परता दिखाई गई है, जो राज्य के संकटकालीन निर्णयों की गंभीरता को दर्शाती है।
॥ श्लोक ४-७ ॥
ते गत्वा दूरमध्वानं त्वरिताः स्म वयस्यवः ।
गिरिव्रजं समासाद्य प्रविष्टा नगरोत्तमम् ॥
राजमार्गेण सुश्रोण्या रथ्यया समलङ्कृतम् ।
ददृशुः पुरुषव्याघ्रा भरतस्य निवेशनम् ॥
तत्र तौ राजपुत्रौ तु ददृशुः सुसमाहितौ ।
भरतं शत्रुघ्नं च पूजयामासुरादृताः ॥
📖 भावार्थ : वे दूत बहुत दूर का मार्ग शीघ्रता से पार कर गिरिव्रज पहुँचे और उस उत्तम नगर में प्रवेश किया। सुन्दर सड़कों और चौराहों से सुसज्जित राजमार्ग से होते हुए वे भरत के निवास स्थान पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने दोनों राजकुमारों – भरत और शत्रुघ्न – को देखा और उनका आदरपूर्वक अभिवादन किया।

🤝 भरत-शत्रुघ्न से भेंट और अयोध्या का निमंत्रण (श्लोक ८-१५)

॥ श्लोक ८-१२ ॥
ततः प्रहृष्टवदनो भरतः शत्रुघ्नमब्रवीत् ।
अयोध्यातो नरश्रेष्ठ दूता ह्येते समागताः ॥
अवश्यं कार्यमस्माकं राज्ञा दशरथेन वै ।
श्रूयतां यदि वा वाच्यं यद्वा वक्ष्यन्ति मन्त्रिणः ॥
एवमुक्त्वा तु धर्मज्ञो भरतः शत्रुघ्नेन सः ।
दूतान् पप्रच्छ कुशलं राज्ञो दशरथस्य च ॥
कच्चिद्राजा सुखं राज्ये भरतस्य पिता महान् ।
कच्चिद्रामः सुखं राज्ये लक्ष्मणश्च महाबलः ॥
कच्चित्सुमित्रा कौसल्या कैकेयी च यशस्विनी ।
वर्तन्ते सुखमस्माकं मातरः पितरं विना ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्न मुख वाले भरत ने शत्रुघ्न से कहा, “हे नरश्रेष्ठ! ये दूत अयोध्या से आए हैं। निश्चय ही राजा दशरथ का कोई कार्य होगा। सुनना चाहिए कि वे क्या कहते हैं या मंत्री क्या कहना चाहते हैं।” ऐसा कहकर धर्मज्ञ भरत ने शत्रुघ्न सहित दूतों से राजा दशरथ के कुशलक्षेम पूछे। “क्या हमारे पिता महाराज दशरथ राज्य में सुखपूर्वक हैं? क्या राम, लक्ष्मण और सभी माताएँ – कौसल्या, सुमित्रा, कैकेयी – कुशलपूर्वक हैं?”
🔍 व्याख्या : भरत का सर्वप्रथम पिता, भाई और माताओं का कुशल पूछना उनके स्नेह और कर्तव्यपरायणता को दर्शाता है। वे अब भी राम को राज्य में ही मानते हैं।
॥ श्लोक १३-१५ ॥
एवं पृष्टास्तु ते दूता भरतेन महात्मना ।
प्रत्यूचुः प्राञ्जलो वाक्यं भरतं प्रति नारद ॥
कुशलं सर्वमित्येव राज्ञो दशरथस्य च ।
भविष्यति च ते राज्यमिति दूता वचोऽब्रुवन् ॥
अयोध्यायां त्वरा कार्या राजकार्यार्थसिद्धये ।
इति श्रुत्वा भरतस्त्वरितो ययौ ।
📖 भावार्थ : महात्मा भरत द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उन दूतों ने हाथ जोड़कर भरत से कहा, “सब कुशल है। राजा दशरथ भी कुशल हैं। और आपका राज्य सुखपूर्वक चल रहा है।” दूतों ने आगे कहा, “अयोध्या में राजकीय कार्य की सिद्धि के लिए शीघ्र चलने की आवश्यकता है।” यह सुनकर भरत शीघ्रता से (जाने को तैयार हो गए)।

🐎 भरत की संदिग्धता और प्रस्थान (श्लोक १६-२४)

॥ श्लोक १६-२० ॥
ततः प्रहृष्टमनसौ भरतः शत्रुघ्नस्तथा ।
दूतवाक्येन सहसा प्रस्थितौ नगरं प्रति ॥
तौ रथेन महार्हेण प्रयातौ कैकयीं प्रति ।
स्वस्ति व्रजेति दूतैस्तौ पूजितौ पुरुषर्षभौ ॥
अथापश्यन् महाबाहू गिरिव्रजमनुत्तमम् ।
पुरं मगधराजस्य वसुपूर्णं मनोरमम् ॥
📖 भावार्थ : तब प्रसन्न मन से भरत और शत्रुघ्न दूतों के वचन सुनकर तुरन्त अयोध्या के लिए प्रस्थित हुए। वे दोनों पुरुषर्षभ उत्तम रथ पर सवार हुए और दूतों द्वारा “कुशलपूर्वक जाओ” आशीर्वाद देकर पूजित किए गए। फिर उन महाबाहुओं ने मगधराज के उस उत्तम गिरिव्रज नगर को देखा जो धन-धान्य से परिपूर्ण और मनोरम था।
॥ श्लोक २१-२४ ॥
तत्र राजा हिरण्यनाभो भरतं प्रत्यपूजयत् ।
तस्मात्प्रतिग्रहं गृह्य भरतः शत्रुघ्नस्तथा ॥
अयोध्यां प्रययौ शीघ्रं चिन्तयन्नृपतेः प्रियम् ।
किं नु वक्ष्यति धर्मज्ञः पिता दशरथो मम ।
रामो वा राजशार्दूलः किं कार्यमिति चिन्तयन् ॥
📖 भावार्थ : वहाँ के राजा हिरण्यनाभ ने भरत का आदर-सत्कार किया। उनसे विदा लेकर भरत और शत्रुघ्न अयोध्या की ओर शीघ्र बढ़ चले। मार्ग में भरत सोचते रहे: “मेरे धर्मज्ञ पिता दशरथ क्या कहेंगे? या राम क्या कार्य बताएँगे?” इस प्रकार चिन्ता में डूबे हुए वे अयोध्या की ओर अग्रसर हुए।
🔍 व्याख्या : भरत का मन अज्ञात कारण से व्याकुल है। दूतों ने राजा के कुशल की बात कही थी, पर भरत को आभास हो जाता है कि कुछ असामान्य घटित हुआ है। यह उनके सूक्ष्म अंतर्ज्ञान और पितृभक्ति को दर्शाता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🌐 राजनयिक संदेशवाहक

इस सर्ग में दूतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे न केवल सूचना देते हैं, बल्कि संकटकाल में राजकुमारों को शीघ्र लाने का दायित्व भी निभाते हैं। यह प्राचीन भारतीय प्रशासन में दूत-व्यवस्था के महत्व को दर्शाता है।

💔 भरत का अंतर्द्वन्द्व

भरत का मन अज्ञात भय से ग्रस्त है। वे पिता और राम से अत्यधिक स्नेह करते हैं। यह चिन्ता उनके कोमल हृदय और आगामी दुःखद सत्य की ओर संकेत करती है।

🏰 गिरिव्रज (राजगृह) का ऐतिहासिक सन्दर्भ

गिरिव्रज, वर्तमान राजगीर (बिहार), मगध साम्राज्य की प्राचीन राजधानी थी। इसका वर्णन पौराणिक साहित्य में मिलता है। यहाँ भरत का अपने मामा के यहाँ रहना कौटुम्बिक संबंधों को भी उजागर करता है।

⏳ अगले सर्ग की ओर

यह सर्ग भरत की वापसी यात्रा और अयोध्या के दुःखद दृश्य की पृष्ठभूमि तैयार करता है। अगले सर्ग में भरत का अयोध्या आगमन और राम के वनगमन तथा पिता की मृत्यु का समाचार सुनकर उनका शोक वर्णित होगा।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि संकट के समय शीघ्र निर्णय और कुशल दूत-व्यवस्था अत्यंत आवश्यक होती है। साथ ही, पारिवारिक संबंधों में विश्वास और स्नेह ही संकट को सहने की शक्ति देते हैं। भरत की चिन्ता हमें सिखाती है कि प्रियजनों के प्रति सजगता और चिंता स्वाभाविक है, परंतु धैर्यपूर्वक सत्य का सामना करना चाहिए।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे पञ्चत्रिंशः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।