🕉️ अयोध्या काण्ड · सर्ग 69

सुतीक्ष्ण ऋषि द्वारा राम की पूजा

इस सर्ग में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम में पधारने तथा ऋषि द्वारा भक्तिपूर्वक उनकी पूजा अर्चना का वर्णन है। सुतीक्ष्ण ऋषि राम के दर्शन से परम धन्य हो जाते हैं और अतिथि सत्कार करते हैं।

0 सम्पूर्ण श्लोक
69 सर्ग संख्या
22 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

इस सर्ग में भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम में पधारने तथा ऋषि द्वारा भक्तिपूर्वक उनकी पूजा अर्चना का वर्णन है। सुतीक्ष्ण ऋषि राम के दर्शन से परम धन्य हो जाते हैं और अतिथि सत्कार करते हैं।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

चित्रकूट से प्रस्थान कर राम वन में आगे बढ़ते हैं। वे सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम पहुँचते हैं, जो अगस्त्य ऋषि के शिष्य हैं। सुतीक्ष्ण ऋषि तपस्या में लीन थे, किन्तु राम के आगमन की सूचना पाकर वे अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और उनका उचित सत्कार करते हैं। वे राम को फल-मूल अर्पित करते हैं, सीता जी के लिए भोजन की व्यवस्था करते हैं और रात्रि विश्राम का आग्रह करते हैं। राम ऋषि के प्रेम और भक्ति से अभिभूत होकर वहाँ कुछ समय व्यतीत करते हैं तथा अगले दिन आगे बढ़ने की आज्ञा माँगते हैं। सुतीक्ष्ण उन्हें अगस्त्य ऋषि के आश्रम जाने का मार्ग बताते हैं।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ६९

(सुतीक्ष्ण ऋषि द्वारा राम की पूजा – भक्त का भगवान से मिलन)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथैकोनसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : चित्रकूट से आगे बढ़ते हुए राम, सीता और लक्ष्मण दण्डकारण्य में प्रवेश करते हैं। वहाँ उनकी भेंट महर्षि अगस्त्य के शिष्य सुतीक्ष्ण ऋषि से होती है। यह सर्ग उस भक्ति और आतिथ्य का अद्भुत वर्णन करता है जो सुतीक्ष्ण ने प्रभु राम के प्रति प्रकट किया।

🌿 सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम में प्रवेश (श्लोक १-७)

॥ श्लोक १ ॥
ततो रामः सह भ्रात्रा वैदेह्या च समन्वितः ।
सुतीक्ष्णाश्रममासाद्य ददर्श मुनिपुङ्गवम् ॥
🔹 पदच्छेद : ततः, रामः, सह, भ्रात्रा, वैदेह्या, च, समन्वितः, सुतीक्ष्णाश्रमम्, आसाद्य, ददर्श, मुनिपुङ्गवम् ।
📖 भावार्थ : तदनन्तर राम, लक्ष्मण और सीता के साथ सुतीक्ष्ण ऋषि के आश्रम में पहुँचे और वहाँ उन श्रेष्ठ मुनि के दर्शन किए।
🔍 व्याख्या : राम का यह आगमन दण्डकारण्य के तपोवन में होता है, जहाँ अनेक ऋषि-मुनि निवास करते हैं। सुतीक्ष्ण उनमें प्रमुख हैं।
॥ श्लोक २ ॥
तान् दृष्ट्वा मुनिशार्दूलः प्रहर्षोत्फुल्ललोचनः ।
उवाच मधुरं वाक्यं पूजयन् राघवं तदा ॥
📖 भावार्थ : उन राम को देखकर श्रेष्ठ मुनि सुतीक्ष्ण के नेत्र हर्ष से खिल उठे और वे प्रसन्नतापूर्वक राघव की पूजा करते हुए मधुर वचन बोले।

🙏 सुतीक्ष्ण का भव्य स्वागत और आतिथ्य (श्लोक ८-१५)

॥ श्लोक ८ ॥
स्वागतं ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ।
इदं फलमूलं च गृहाण सह सीतया ॥
🔹 पदच्छेद : स्वागतम्, ते, नरश्रेष्ठ, दिष्ट्या, प्राप्तः, असि, राघव, इदम्, फलमूलम्, च, गृहाण, सह, सीतया ।
📖 भावार्थ : हे नरश्रेष्ठ राघव! आपका स्वागत है। सौभाग्य से आप पधारे हैं। कृपया सीता सहित यह फल-मूल ग्रहण करें।
🔍 व्याख्या : ऋषि ने तपस्या द्वारा एकत्र किए गए फल-मूल भगवान को अर्पित किए – यह सच्ची भक्ति की निशानी है।
॥ श्लोक १२ ॥
रामः प्रीतमनाः श्रीमान् प्रतिगृह्य मुनेर्वचः ।
उवास तत्र भगवान् सुतीक्ष्णसत्रे सत्कृतः ॥
📖 भावार्थ : श्रीमान् भगवान् राम मुनि के वचनों को सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उनका सत्कार स्वीकार कर वहाँ सुतीक्ष्ण के आश्रम में निवास किया।

💬 राम-सुतीक्ष्ण संवाद और अगस्त्य का मार्गदर्शन (श्लोक १६-२५)

॥ श्लोक १८ ॥
सुतीक्ष्णस्तु तदा राममुवाच प्रणतात्मवान् ।
भवान्मे परमं धाम भवान्मे परमा गतिः ॥
🔹 पदच्छेद : सुतीक्ष्णः, तु, तदा, रामम्, उवाच, प्रणतात्मवान्, भवान्, मे, परमम्, धाम, भवान्, मे, परमा, गतिः ।
📖 भावार्थ : तब सुतीक्ष्ण ने विनम्र होकर राम से कहा – आप ही मेरे परम धाम हैं, आप ही मेरी परम गति हैं।
🔍 व्याख्या : यह वाक्य भक्त की पूर्ण समर्पण भावना को दर्शाता है। ऋषि राम में ही सब कुछ देखते हैं।
॥ श्लोक २२ ॥
रामः प्रोवाच धर्मात्मा श्रूयतां मुनिपुङ्गव ।
अगस्त्याश्रममिच्छामि द्रष्टुं त्वत्प्रियकाम्यया ॥
📖 भावार्थ : धर्मात्मा राम ने कहा – हे मुनिश्रेष्ठ! सुनिए, मैं आपके प्रिय की इच्छा से अगस्त्य ऋषि के आश्रम को देखना चाहता हूँ।
🔍 व्याख्या : राम का यह कथन उनकी विनम्रता और ऋषियों के प्रति आदर को प्रकट करता है।

🚶 प्रस्थान और सुतीक्ष्ण का आशीर्वाद (श्लोक २६-३०)

॥ श्लोक २८ ॥
सुतीक्ष्णस्त्वब्रवीद्वाक्यं रामं प्राञ्जलिरव्ययम् ।
गच्छ तात यथाकामं अगस्त्यो वै महातपाः ॥
📖 भावार्थ : सुतीक्ष्ण ने हाथ जोड़कर अव्यय राम से कहा – हे तात! आप यथाकाम चलिए, महातपस्वी अगस्त्य वहाँ विराजते हैं।
॥ श्लोक ३० ॥
एवमुक्त्वा महातेजा रामं प्रीतमना मुनिः ।
प्रायात् सुतीक्ष्णो भगवान् पुनराश्रममेव च ॥
📖 भावार्थ : ऐसा कहकर महातेजस्वी मुनि सुतीक्ष्ण राम से अत्यन्त प्रसन्न हुए और पुनः अपने आश्रम को लौट गए।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🙌 भक्त और भगवान का आदर्श मिलन

यह सर्ग दर्शाता है कि किस प्रकार एक सच्चा भक्त (सुतीक्ष्ण) भगवान (राम) को पाकर धन्य हो जाता है। राम भी भक्त के प्रेम में बँधकर उसके आश्रम में निवास करते हैं।

🧘 गुरु-परम्परा का महत्त्व

सुतीक्ष्ण अगस्त्य ऋषि के शिष्य हैं और वे राम को अपने गुरु के आश्रम की ओर निर्देशित करते हैं। यह गुरु-शिष्य परम्परा और आज्ञा पालन का सुन्दर उदाहरण है।

🌱 वनवास में धर्म की रक्षा

राम वनवास में भी ऋषियों के धर्म और तपस्या की रक्षा के लिए प्रयत्नशील हैं। यहाँ सुतीक्ष्ण से मिलना उनके वनवास के धार्मिक उद्देश्य को और स्पष्ट करता है।

📜 आगामी काण्ड की भूमिका

इस सर्ग में अगस्त्य ऋषि का उल्लेख आगामी घटनाओं (खर-दूषण वध, सीता हरण आदि) की पृष्ठभूमि तैयार करता है। अगस्त्य ही राम को दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करेंगे।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि सच्चा आतिथ्य केवल भोजन या वस्तुओं से नहीं, बल्कि हृदय के भाव से होता है। सुतीक्ष्ण ऋषि ने राम को जो प्रेम और सम्मान दिया, वही सच्ची पूजा है। भगवान भी ऐसे भक्तों के हृदय में सदा वास करते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे एकोनसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।