🕉️ अयोध्या काण्ड · सर्ग 72

अगस्त्य द्वारा राम को इंद्र का धनुष देना

इस सर्ग में महर्षि अगस्त्य श्रीराम का आतिथ्य करते हैं और उन्हें इंद्र का दिव्य धनुष तथा अन्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं। ऋषि राम को दण्डकारण्य के राक्षसों से युद्ध के लिए तैयार करते हैं और उन्हें पंचवटी जाने का सुझाव देते हैं।

0 सम्पूर्ण श्लोक
72 सर्ग संख्या
29 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

इस सर्ग में महर्षि अगस्त्य श्रीराम का आतिथ्य करते हैं और उन्हें इंद्र का दिव्य धनुष तथा अन्य दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान करते हैं। ऋषि राम को दण्डकारण्य के राक्षसों से युद्ध के लिए तैयार करते हैं और उन्हें पंचवटी जाने का सुझाव देते हैं।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

वनवास के दौरान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण महर्षि अगस्त्य के आश्रम में पहुँचते हैं। अगस्त्य ऋषि उनका अत्यंत आदर सत्कार करते हैं और उनके कुशल-क्षेम की जानकारी लेते हैं। वे राम को दण्डकारण्य के राक्षसों के अत्याचारों से अवगत कराते हैं। फिर महर्षि अगस्त्य श्रीराम को इंद्र का दिव्य धनुष भेंट करते हैं, जो पहले इंद्र ने स्वयं उन्हें सौंपा था। इसके साथ ही वे राम को एक अक्षय तूणीर (असीम बाणों वाला तरकश) और एक दिव्य खड्ग भी प्रदान करते हैं। ये अस्त्र राम को राक्षसों के संहार में सहायता करेंगे। अगस्त्य राम को पंचवटी जाकर निवास करने की सलाह देते हैं, क्योंकि वह स्थान रमणीय एवं ऋषियों के लिए उपयुक्त है। राम उनकी आज्ञा लेकर पंचवटी के लिए प्रस्थान करते हैं। यह सर्ग राम के वनवासी जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाता है, जहाँ उन्हें दैवीय अस्त्र प्राप्त होते हैं, जिनका उपयोग आगे राक्षसों से युद्ध में होगा।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – अयोध्याकाण्ड – सर्ग ७२

(अगस्त्य द्वारा राम को इंद्र का धनुष देना – दिव्य अस्त्रों की प्राप्ति)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ द्विसप्ततितमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : चित्रकूट से प्रस्थान कर भगवान राम, लक्ष्मण और सीता दण्डकारण्य की ओर बढ़ते हैं। मार्ग में अनेक ऋषियों के आश्रमों में आतिथ्य प्राप्त करते हुए वे अंततः महर्षि अगस्त्य के आश्रम में पहुँचते हैं। अगस्त्य, जो दक्षिण दिशा के अधिपति माने जाते हैं, राम का भव्य स्वागत करते हैं और उन्हें राक्षसों के विनाश के लिए दिव्य अस्त्र प्रदान करते हैं। यह सर्ग राम के वनवास के उस चरण का सूत्रपात करता है, जो आगे चलकर रावण वध तक जाता है।

🏕️ अगस्त्य आश्रम में स्वागत (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १-३ ॥
ततः प्रयातः काकुत्स्थः सह भ्रात्रा महायशाः ।
अगस्त्याश्रममासाद्य ददर्श परमर्षिभिः ॥
तं दृष्ट्वा राघवं प्राप्तमगस्त्यो भगवानृषिः ।
पूजयामास धर्मात्मा प्रीत्या परमया युतः ॥
उवाच च महातेजा रामं प्राञ्जलिरव्ययः ।
स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि राघव ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = उसके बाद; प्रयातः = गये; काकुत्स्थः = राम; सह = साथ; भ्रात्रा = भाई के; महायशाः = महान यशस्वी; अगस्त्याश्रमम् = अगस्त्य के आश्रम को; आसाद्य = पाकर; ददर्श = देखा; परमर्षिभिः = परम ऋषियों से; तम् = उनको; दृष्ट्वा = देखकर; राघवम् = राघव को; प्राप्तम् = आये हुए; अगस्त्यः = अगस्त्य; भगवान् = पूज्य; ऋषिः = ऋषि; पूजयामास = पूजा की; धर्मात्मा = धर्मात्मा; प्रीत्या = प्रेम से; परमया = उत्तम; युतः = युक्त; उवाच च = और बोले; महातेजाः = महान तेजस्वी; रामम् = राम से; प्राञ्जलिः = हाथ जोड़कर; अव्ययः = अविनाशी; स्वागतम् = स्वागत है; ते = तुम्हारा; महाबाहो = हे महाबाहो; दिष्ट्या = सौभाग्य से; प्राप्तः = आये; असि = हो; राघव = हे राघव।
📖 भावार्थ : तत्पश्चात् महायशस्वी राम लक्ष्मण के साथ अगस्त्य ऋषि के आश्रम को गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने अनेक महर्षियों से युक्त उस आश्रम को देखा। भगवान अगस्त्य ने आये हुए राघव को देखकर अत्यंत प्रेम से पूजा की। महातेजस्वी धर्मात्मा अगस्त्य ने हाथ जोड़कर कहा, "हे महाबाहो राघव! आपका स्वागत है। सौभाग्य से आप यहाँ पधारे।"
🔍 व्याख्या : महर्षि अगस्त्य राम के आगमन से अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वे जानते हैं कि राम का आना इस क्षेत्र के राक्षसों के अंत की शुरुआत है।
॥ श्लोक ४-५ ॥
अर्घ्यं पाद्यं तथा आचमनीयं च यथाविधि ।
प्रतिगृह्य महात्मानौ रामलक्ष्मणौ तदा ॥
उपविष्टौ महात्मानौ सीतया सहितौ तदा ।
अगस्त्यो भगवान् प्रीत्या पप्रच्छ कुशलं तयोः ॥
📖 भावार्थ : तब अगस्त्य ने विधिवत् अर्घ्य, पाद्य और आचमनीय देकर उन महात्माओं राम-लक्ष्मण का सत्कार किया। वे सीता सहित आसन पर विराजमान हुए। भगवान अगस्त्य ने प्रेमपूर्वक उनका कुशल-क्षेम पूछा।

👹 राक्षसों के अत्याचार (श्लोक ६-१०)

॥ श्लोक ६-८ ॥
अगस्त्य उवाच –
इमे वसन्ति दुष्टात्मा राक्षसा बलदर्पिताः ।
तापसान् बाधमाना वै दण्डकारण्यवासिनः ॥
खरस्त्रिशिरसा चैव दूषणेन च राघव ।
बाध्यन्ते तापसा नित्यं राक्षसैर्भीमविक्रमैः ॥
तान् हत्वा राक्षसान् वीर कुरु क्षेमं तपस्विनाम् ।
एतदर्थमिह प्राप्तो भवान् देव कृपानिधिः ॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा – हे राघव, इस दण्डकारण्य में दुष्टात्मा, बल से दर्पित राक्षस निवास करते हैं, जो तापसों को सताते हैं। खर, त्रिशिरा और दूषण के साथ वे भीमविक्रमी राक्षस नित्य ऋषियों को पीड़ित करते हैं। हे वीर, उन राक्षसों का वध करके तपस्वियों को क्षम प्रदान करो। हे देव, कृपानिधे! आप इसी कार्य के लिए यहाँ आये हैं।
🔍 व्याख्या : अगस्त्य राम को राक्षसों के आतंक से अवगत कराते हैं और उनके वध का आग्रह करते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि राम अवतार हैं।

🏹 इंद्र का धनुष एवं अक्षय तूणीर (श्लोक ११-१८)

॥ श्लोक ११-१५ ॥
अगस्त्य उवाच –
इदं धनुर्दिव्यमिन्द्रस्य भार्गव ।
शक्रेण दत्तं मम राघवाय ते ।
प्रयच्छामि त्वां महाबाहो सबाणम् ।
अक्षय्यौ च तूणीरौ खड्गं च दिव्यम् ॥
एतेन धनुषा वीर निहनिष्यसि राक्षसान् ।
सबाणावक्षयौ चोभौ तूणीरौ भवतो ध्रुवम् ॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा – हे भार्गव (राम)! यह दिव्य धनुष इंद्र का है, जो स्वयं इंद्र ने मुझे दिया था। हे महाबाहो! मैं वह धनुष बाण सहित तुम्हें प्रदान करता हूँ। और ये दो अक्षय तूणीर तथा यह दिव्य खड्ग भी लो। हे वीर, इस धनुष से तुम राक्षसों का संहार करोगे। ये दोनों अक्षय तूणीर निश्चय ही तुम्हारे लिए अक्षय बाणों से परिपूर्ण रहेंगे।
🔍 व्याख्या : इंद्र का धनुष अत्यंत शक्तिशाली है। इसका मिलना राम के राक्षसों से युद्ध में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। अक्षय तूणीर का अर्थ है कि उनमें बाण कभी समाप्त नहीं होंगे।
॥ श्लोक १६-१८ ॥
गृहाणेदं महाबाहो खड्गं परमभास्वरम् ।
येन त्वं निहनिष्यामि राक्षसान् कामरूपिणः ॥
रामः प्रतिगृह्य तेजस्वी धनुषा च सबाणकम् ।
अगस्त्यं परिपप्रच्छ वनवासं यथाविधि ॥
📖 भावार्थ : "हे महाबाहो! इस अत्यंत तेजस्वी खड्ग को भी धारण करो, जिससे तुम कामरूपी राक्षसों का वध कर सकोगे।" तेजस्वी राम ने धनुष और बाणों को ग्रहण किया और फिर अगस्त्य से वनवास के उचित नियमों के विषय में पूछा।

🚩 पंचवटी गमन का निर्देश (श्लोक १९-२८)

॥ श्लोक १९-२३ ॥
अगस्त्य उवाच –
अतः परतरं राम स्थानं पञ्चवटी महत् ।
रमणीयं च पुण्यं च गोदावर्या समीपतः ॥
तत्र सीता त्वया सार्धं लक्ष्मणेन च राघव ।
वत्स्यति विगतज्वारा पुष्पिता च सदा वने ॥
तत्र गत्वा महाबाहो वासं कुरु यथासुखम् ।
न हि तत्र भयं किंचिद्राक्षसेभ्यो भविष्यति ॥
रामस्त्वगस्त्यवचनं श्रुत्वा प्रीतमनाः तदा ।
प्रणम्य शिरसा चैव प्रतस्थे पञ्चवटीं प्रति ॥
📖 भावार्थ : अगस्त्य ने कहा – हे राम, यहाँ से आगे पंचवटी नामक एक उत्तम स्थान है, जो गोदावरी के समीप अत्यंत रमणीय एवं पवित्र है। हे राघव, वहाँ तुम सीता और लक्ष्मण के साथ निर्भय होकर निवास कर सकते हो। वह वन सदा पुष्पित-फलित रहता है। हे महाबाहो, वहाँ जाकर सुखपूर्वक वास करो। वहाँ राक्षसों से तुम्हें कोई भय नहीं होगा। अगस्त्य के वचन सुनकर राम अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्हें शिर से प्रणाम कर वे पंचवटी की ओर प्रस्थित हुए।
🔍 व्याख्या : पंचवटी का उल्लेख यहाँ किया गया है। यहीं आगे चलकर सीता हरण और राम-रावण युद्ध की नींव पड़ेगी।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏹 दिव्य अस्त्रों का महत्व

इस सर्ग में राम को इंद्र का धनुष, अक्षय तूणीर और दिव्य खड्ग प्राप्त होते हैं। ये अस्त्र केवल शारीरिक नहीं, बल्कि दैवीय शक्तियों के प्रतीक हैं। यह राम के असुरों से युद्ध के लिए पूर्णत: सुसज्जित होने का द्योतक है।

🙏 गुरु का आशीर्वाद

महर्षि अगस्त्य जैसे सिद्ध पुरुष का आशीर्वाद और मार्गदर्शन राम के धर्मयुद्ध को वैधता और शक्ति प्रदान करता है। ऋषियों का सहयोग राम के अवतारी पुरुष होने की पुष्टि करता है।

🌳 पंचवटी का चयन

पंचवटी राम के वनवास का अगला पड़ाव है। यह स्थान गोदावरी तट पर स्थित है और यहीं रावण की बहन शूर्पणखा से भेंट होगी, जो आगे की घटनाओं का मूल बनती है। अगस्त्य का यह सुझाव अत्यंत सामयिक और भविष्यद्रष्टा है।

⚔️ राक्षस संहार की तैयारी

अगस्त्य सीधे तौर पर राम को राक्षसों के वध के लिए प्रेरित करते हैं। इससे स्पष्ट है कि राम का वनवास केवल पिता के वचन पालन तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका उद्देश्य धर्म की रक्षा और अधर्मियों का नाश भी है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में जब भी हम किसी कठिन कार्य पर आगे बढ़ते हैं, तो गुरुजनों का आशीर्वाद और उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान एवं साधन हमें सफलता दिलाते हैं। राम ने अगस्त्य का सम्मान किया और उनके निर्देशानुसार चले, जिससे उनका मार्ग प्रशस्त हुआ।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डे द्विसप्ततितमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।