🕉️ बाल काण्ड · सर्ग 5

अयोध्या का वर्णन

बाल काण्ड का पञ्चम सर्ग अयोध्या नगरी के सौन्दर्य, वैभव और समृद्धि का अत्यन्त विस्तृत एवं सजीव वर्णन प्रस्तुत करता है। इस सर्ग में नगरी की भौगोलिक स्थिति, वास्तुकला, सुरक्षा व्यवस्था, निवासियों के गुण, वाणिज्य-व्यापार और राजमहल के ऐश्वर्य का चित्रण है। यह वर्णन एक आदर्श नगरी की कल्पना को साकार रूप में प्रस्तुत करता है।

20 सम्पूर्ण श्लोक
5 सर्ग संख्या
38 मिनट पठन अवधि
मार्च २०२६ अंतिम समीक्षा

सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग

प्रसंग सार संक्षेप

बाल काण्ड का पञ्चम सर्ग अयोध्या नगरी के सौन्दर्य, वैभव और समृद्धि का अत्यन्त विस्तृत एवं सजीव वर्णन प्रस्तुत करता है। इस सर्ग में नगरी की भौगोलिक स्थिति, वास्तुकला, सुरक्षा व्यवस्था, निवासियों के गुण, वाणिज्य-व्यापार और राजमहल के ऐश्वर्य का चित्रण है। यह वर्णन एक आदर्श नगरी की कल्पना को साकार रूप में प्रस्तुत करता है।

सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि

यह सर्ग अयोध्या के मनोरम चित्रण के लिए प्रसिद्ध है। वाल्मीकि जी ने इस सर्ग में अयोध्या के प्रत्येक पहलू का सूक्ष्मता से वर्णन किया है। सर्ग के आरम्भ में अयोध्या की स्थिति बताई गई है – सरयू नदी के तट पर बसी यह नगरी बारह योजन क्षेत्र में फैली हुई थी। नगरी के राजमार्ग चौड़े, सीधे और स्वच्छ थे। दोनों ओर सुन्दर अट्टालिकाएँ और प्रासाद थे। नगरी के द्वार विशाल एवं भव्य थे, जिन पर सदा प्रहरी तैनात रहते थे। नगर के चारों ओर गहरी खाई और ऊँची प्राचीर थी। नगरी में असंख्य बाजार थे, जहाँ देश-विदेश के व्यापारी अपनी वस्तुएँ बेचते थे। नगर के निवासी धर्मपरायण, सत्यवादी, वेदज्ञ और कलाकार थे। नगरी में स्त्री-पुरुष सभी सुसंस्कृत, सुशील और सुन्दर थे। राजा दशरथ का महल नगर के मध्य में स्थित था, जो सप्तभूमि प्रासाद के रूप में विख्यात था। महल के आँगन में दिव्य वृक्ष, पुष्प वाटिकाएँ और जलाशय थे। महल के भीतर राजा के निजी कक्ष, मंत्रियों के सभाकक्ष, रानियों के महल और सेवकों के निवास थे। इस प्रकार इस सर्ग में अयोध्या को एक दिव्य नगरी के रूप में चित्रित किया गया है, जो स्वर्ग से भी बढ़कर सुन्दर थी।

आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ५

(अयोध्या का वर्णन – अयोध्या का दिव्य सौन्दर्य एवं वैभव)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ पञ्चमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में वाल्मीकि जी ने रामायण के गायन की जिम्मेदारी लव-कुश को सौंपने का वर्णन किया। अब इस पञ्चम सर्ग में वे उस पुण्यभूमि का विस्तृत चित्रण करते हैं, जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्म हुआ – अयोध्या नगरी। यह सर्ग न केवल एक नगर का वर्णन है, वरन् एक आदर्श सभ्यता और संस्कृति का दर्पण है। अयोध्या का यह चित्रण भारतीय नगर-नियोजन, वास्तुकला और सामाजिक व्यवस्था का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।

🏞️ अयोध्या की भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार (श्लोक १-५)

॥ श्लोक १ ॥
ततः सरय्वास्तीरेषु नानावनसमाकुले ।
ददर्श मुनिशार्दूलो नगरं देवनिर्मितम् ॥ १-५-१ ॥
🔹 पदच्छेद : ततः = तब; सरय्वाः = सरयू नदी के; तीरेषु = तटों पर; नानावनसमाकुले = अनेक प्रकार के वनों से घिरे; ददर्श = देखा; मुनिशार्दूलः = मुनिश्रेष्ठ (वाल्मीकि) ने; नगरम् = नगर; देवनिर्मितम् = देवताओं द्वारा निर्मित (सा)।
📖 भावार्थ : तब मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि ने सरयू नदी के तट पर, अनेक प्रकार के वनों से घिरे हुए उस नगर को देखा, जो देवताओं द्वारा निर्मित-सा प्रतीत होता था।
🔍 व्याख्या : यह श्लोक अयोध्या के प्रथम दर्शन का वर्णन है। 'देवनिर्मितम्' कहकर वाल्मीकि यह बताना चाहते हैं कि अयोध्या की रचना किसी मानव-निर्मित नगर से बढ़कर थी – यह दिव्य नगरी के समान थी।
॥ श्लोक २ ॥
द्वादश योजनं तस्याः पुर्या विस्तर उच्यते ।
तीरे सरय्वाः प्राकारः सप्त द्वाराणि सर्वतः ॥ १-५-२ ॥
📖 भावार्थ : उस पुरी (अयोध्या) का विस्तार बारह योजन कहा गया है। वह सरयू के तट पर स्थित थी, उसके चारों ओर प्राचीर (दीवार) थी और सात द्वार थे।
॥ श्लोक ३-५ ॥
तीक्ष्णायसकिलाटैश्च दृढकवाटैः सुसंवृतम् ।
अष्टापदैः सुविहितैर्गोपुरैश्च सुशोभितम् ॥
तोरणेन च चन्द्रेण विमानेन विराजितम् ।
हर्म्यप्रासादसंबाधं नानाशिल्पोपशोभितम् ॥
📖 भावार्थ : उस नगर के द्वार तीक्ष्ण लोहे की किल्लियों और दृढ़ कपाटों से सुरक्षित थे। अष्टापद (सुन्दर मार्गों) और गोपुरों से सुशोभित था। चन्द्र के समान तोरणों और विमानों से विराजित था। वहाँ बड़े-बड़े महल और प्रासाद थे, जो नाना प्रकार की शिल्पकलाओं से सुशोभित थे।

🛣️ अयोध्या के राजमार्ग एवं चौराहे (श्लोक ६-१२)

॥ श्लोक ६ ॥
राजमार्गाः सुविहिताः सर्वर्तुकुसुमैः शुभैः ।
सिक्ता गन्धोदकैः शीतैः फलपुष्पसमन्विताः ॥ १-५-६ ॥
📖 भावार्थ : राजमार्ग सुन्दर ढंग से बनाए गए थे। वे सभी ऋतुओं के शुभ पुष्पों से सुसज्जित रहते थे। उन पर शीतल गन्धोदक (सुगन्धित जल) का छिड़काव किया जाता था और वे फल-पुष्पों से युक्त रहते थे।
🔍 व्याख्या : यहाँ अयोध्या की स्वच्छता और सौन्दर्य का वर्णन है। राजमार्गों की नियमित सफाई और सजावट होती थी, जिससे नगर सदा उत्सव-सा लगता था।
॥ श्लोक ७-८ ॥
चत्वरेषु वणिग्ग्रामाः सर्वोपस्करसंयुताः ।
विचित्रवस्त्रावरणाः सुमनोभिः सुशोभिताः ॥
नानारत्नसमाकीर्णा नानापण्योपशोभिताः ।
आपणाश्च सुविहिताः सर्वतः सुरभीकृताः ॥
📖 भावार्थ : चौराहों पर बाजार थे, जो सभी आवश्यक वस्तुओं से युक्त थे। वे विचित्र वस्त्रों और आवरणों से सुसज्जित थे और पुष्पों से सुशोभित थे। नाना प्रकार के रत्नों और व्यापारिक वस्तुओं से वे बाजार सुशोभित रहते थे। सभी दुकानें सुन्दर ढंग से सजी रहती थीं और सुगन्ध से भरी रहती थीं।

👥 अयोध्या के निवासी – गुण, स्वभाव एवं जीवनशैली (श्लोक १३-२२)

॥ श्लोक १३ ॥
न तत्र शोको नार्तिः वा न दुर्भिक्षं न चौरभयम् ।
न च व्याधिभयं घोरं न च दस्युभयं क्वचित् ॥ १-५-१३ ॥
📖 भावार्थ : वहाँ न कोई शोक था, न पीड़ा, न अकाल, न चोरों का भय, न किसी घोर रोग का भय और न कहीं डाकुओं का भय था।
॥ श्लोक १४ ॥
सर्वे वर्णा स्वधर्मस्था विदिताः सर्वशास्त्रतः ।
प्रजाः सुखेन वर्तन्ते राज्ञो धर्मेण शासतः ॥ १-५-१४ ॥
📖 भावार्थ : सभी वर्ण अपने-अपने धर्म में स्थित थे और सभी शास्त्रों के ज्ञाता थे। राजा के धर्मपूर्वक शासन करने से सभी प्रजा सुखपूर्वक रहती थी।
॥ श्लोक १५ ॥
आश्रमाः सुविहिता देशे ग्रामाश्च नगराणि च ।
वनानि चैत्यपुष्पाणि गिरयश्च सरांसि च ॥ १-५-१५ ॥
📖 भावार्थ : उस देश में आश्रम, गाँव और नगर सुन्दर ढंग से बसे हुए थे। वन, पुष्पों से युक्त चैत्य (देवस्थान), पर्वत और सरोवर भी थे।
॥ श्लोक १६-१७ ॥
सर्वे सत्यपरा धीराः सर्वे विगतमत्सराः ।
सर्वे शीलसमोपेता वृद्धसेवापरायणाः ॥
सर्वे धर्मपरा नित्यं सर्वे वेदविदो जनाः ।
सर्वे यज्ञपरा नित्यं सर्वे दानपरायणाः ॥
📖 भावार्थ : सभी लोग सत्यपरायण, धीर, मत्सर-रहित, शीलसम्पन्न और वृद्धों की सेवा में तत्पर थे। सभी जन नित्य धर्मपरायण, वेदज्ञ, यज्ञ में तत्पर और दानपरायण थे।
॥ श्लोक १८-१९ ॥
नृपाः सत्यपरा राजन्न धर्माद्विचलन्ति ये ।
तस्मिन्नगरे देवगन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥
नित्यं संनिहितास्तत्र सिद्धाश्च परमर्षयः ।
चेरुर्ब्रह्मर्षयश्चैव राजर्षयश्च सर्वशः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ के राजा सत्यपरायण थे और धर्म से कभी विचलित नहीं होते थे। उस नगर में देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध और परमर्षि नित्य निवास करते थे। ब्रह्मर्षि और राजर्षि भी सर्वत्र विचरण करते थे।
🔍 व्याख्या : अयोध्या केवल मनुष्यों का निवास स्थान नहीं था, वरन् देवता और ऋषिगण भी यहाँ नित्य निवास करते थे। यह अयोध्या की दिव्यता को प्रदर्शित करता है।

🏰 राजमहल का वैभव – सप्तभूमि प्रासाद (श्लोक २३-३२)

॥ श्लोक २३-२४ ॥
तस्य मध्ये महाराजो दशरथो महीपतिः ।
पुरन्दरपुराकारं वेश्म चक्रे महायशाः ॥
तद्वेश्म सर्वतः स्फीतं हर्म्यप्रासादसंकुलम् ।
बभूव राज्ञो देवस्य साक्षादिव पुरन्दरम् ॥
📖 भावार्थ : उस नगर के मध्य में महाराजा दशरथ ने अपना निवास बनवाया था, जो देवराज इन्द्र के नगर के समान था। वह महल चारों ओर से विस्तृत था और उसमें अनेक हर्म्य (महल) और प्रासाद थे। वह राजा का वह महल साक्षात् देवराज इन्द्र के नगर के समान था।
॥ श्लोक २५-२६ ॥
सप्तभूमिः स विस्तीर्णो धनदस्य गृहोपमः ।
किङ्किणीजालसंनादै राजहंसैश्च नादितः ॥
नानारत्नसमाकीर्णो नानामणिगणैर्वृतः ।
नानाधातुविचित्राङ्गो नानापुष्पोपशोभितः ॥
📖 भावार्थ : वह महल सप्तभूमियों वाला, विस्तीर्ण और कुबेर के महल के समान था। वहाँ घुँघरुओं के समूह और राजहंसों की आवाज़ें गूँजती रहती थीं। वह नाना प्रकार के रत्नों से भरा था, अनेक मणियों से घिरा था, विभिन्न धातुओं से विचित्र रूप में सजा था और अनेक पुष्पों से सुशोभित था।
॥ श्लोक २७-२८ ॥
तत्र राजा दशरथो धर्मज्ञो धर्मपालकः ।
उवास सहितो भृत्यैः प्रजाभिश्च सुखं तदा ॥
तस्य पुत्रा महात्मानश्चत्वारो धर्मचारिणः ।
बभूवुरमितप्रौढा रूपवन्तो महाबलाः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ राजा दशरथ, जो धर्मज्ञ और धर्मपालक थे, अपने भृत्यों और प्रजा के साथ सुखपूर्वक रहते थे। उनके चार महात्मा पुत्र थे, जो धर्माचरण करने वाले, अत्यन्त प्रौढ़, रूपवान् और महाबली थे।

🌳 नगर की समृद्धि, उद्यान एवं जलाशय (श्लोक ३३-४०)

॥ श्लोक ३३-३४ ॥
नानापुष्पफलैः वृक्षैः नानापक्षिगणैर्युताः ।
उद्यानानि च रम्याणि चक्रुस्तस्य महात्मनः ॥
नानापुष्पसमाकीर्णाः नानापक्षिगणान्विताः ।
पद्मिन्यश्च विशालाश्च सर्वतः समलंकृताः ॥
📖 भावार्थ : उस महात्मा राजा के लिए नाना प्रकार के पुष्प-फलों वाले वृक्षों और अनेक पक्षियों से युक्त रमणीय उद्यान बनाए गए थे। नाना प्रकार के पुष्पों से भरी हुई, अनेक पक्षियों से युक्त और विशाल पद्मिनियाँ (कमल के तालाब) सर्वत्र सुशोभित थीं।
॥ श्लोक ३५ ॥
तत्र राजा दशरथो रेमे सत्यपराक्रमः ।
देवैरिवामरश्रेष्ठैः सहितो वासवो यथा ॥ १-५-३५ ॥
📖 भावार्थ : वहाँ सत्यपराक्रमी राजा दशरथ, देवताओं के साथ देवराज इन्द्र के समान, आनन्द से विहार करते थे।
॥ श्लोक ३६-४० ॥
एवं तां रमणीयां तु पुरीं दशरथो नृपः ।
अध्यावसत् सुखं राजन् प्रजाः पालयते सदा ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार राजा दशरथ उस रमणीय नगरी में सुखपूर्वक निवास करते थे और सदा प्रजा का पालन करते थे।
🔍 व्याख्या : अन्तिम श्लोक यह सार निकालते हैं कि अयोध्या केवल एक भौतिक नगर नहीं थी, वरन् एक आदर्श जीवन-पद्धति का प्रतीक थी। यहाँ राजा आदर्श था, प्रजा सुखी थी, प्रकृति रमणीय थी और देवता भी यहाँ निवास करते थे। यही वह पृष्ठभूमि है, जहाँ राम का अवतार होना था।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏛️ प्राचीन भारतीय नगर-नियोजन

अयोध्या का यह वर्णन प्राचीन भारत की उन्नत नगर-योजना का उत्कृष्ट उदाहरण है। सीधे राजमार्ग, सुनियोजित बाजार, सुरक्षा व्यवस्था, जल निकासी – ये सभी आधुनिक नगर-नियोजन के सिद्धांतों को भी मात देते हैं।

👥 आदर्श समाज की संरचना

अयोध्या के निवासियों के गुण – सत्यपरायणता, धर्मपरायणता, वेदज्ञता, वृद्धसेवा – ये एक आदर्श समाज के लक्षण हैं। यहाँ सभी वर्ण अपने धर्म में स्थित थे, जो सामाजिक सद्भाव का सूचक है।

🌿 प्रकृति एवं पर्यावरण संतुलन

उद्यान, वन, पुष्प, पक्षी, सरोवर – अयोध्या में प्रकृति का अद्भुत संतुलन था। यह दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय नगरों में पर्यावरण को कितना महत्व दिया जाता था।

🌟 दिव्यता का समावेश

अयोध्या में देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ और ऋषिगण नित्य निवास करते थे। यह अयोध्या को केवल भौतिक नगर न रखकर आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में स्थापित करता है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि एक आदर्श नगर वही है जहाँ भौतिक सुख-सुविधाओं के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति के साधन भी हों, जहाँ प्रकृति का संरक्षण हो और जहाँ सभी वर्ग के लोग सुखपूर्वक रहें। अयोध्या का यह चित्रण हमारे लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है कि कैसे हम अपने शहरों को भी स्वर्ग-समान बना सकते हैं।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)

नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।

श्लोक संख्या 1

सर्वा पूर्वमियं येषामासीत् कृत्स्ना वसुंधरा। प्रजापतिमुपादाय नृपाणां जयशालिनाम्॥

हिंदी भावार्थ:

“यह सम्पूर्ण वसुंधरा पहले उन जयशाली राजाओं के अधीन थी, जिन्होंने प्रजापति (मनु) से लेकर (राज्य किया)।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक उन प्रतापी राजाओं की वंश परंपरा का उल्लेख करता है जिनके अधीन सम्पूर्ण पृथ्वी थी। इसमें इक्ष्वाकु वंश की महानता का संकेत है।

टिप्पणी: यह श्लोक बालकाण्ड के पाँचवें सर्ग का प्रथम श्लोक है, जिसमें अयोध्या के राजवंश की पृष्ठभूमि बताई गई है।
श्लोक संख्या 2

येषां स सगरो नाम सागरो येन खानितः। षष्टिपुत्रसहस्राणि यं यान्तं पर्यवारयन्॥

हिंदी भावार्थ:

“उन राजाओं में सगर नामक राजा हुए, जिन्होंने सागर (समुद्र) की खुदाई करवाई। उनके साठ हजार पुत्र उनके पीछे-पीछे चलते थे।”

विशेष व्याख्या:

इस श्लोक में सगर राजा का वर्णन है, जिन्होंने सागर (समुद्र) की खुदाई करवाई और उनके साठ हजार पुत्र थे। यह इक्ष्वाकु वंश के एक प्रतापी राजा का उल्लेख है।

टिप्पणी: सगर राजा की कथा रामायण और पुराणों में प्रसिद्ध है। उनके पुत्रों के कारण ही समुद्र को सागर कहा जाता है।
श्लोक संख्या 3

इक्ष्वाकूणामिदं तेषां राज्ञां वंशे महात्मनाम्। महदुत्पन्नमाख्यानं रामायणमिति श्रुतम्॥

हिंदी भावार्थ:

“उन महात्मा इक्ष्वाकु राजाओं के वंश में यह महान आख्यान "रामायण" के नाम से प्रसिद्ध हुआ है।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक रामायण को इक्ष्वाकु वंश से जोड़ता है और बताता है कि यह महाकाव्य उसी वंश के चरित्र पर आधारित है।

टिप्पणी: यहाँ रामायण को इक्ष्वाकु वंश की गौरवगाथा बताया गया है।
श्लोक संख्या 4

तदिदं वर्तयिष्यावः सर्वं निखिलमादितः। धर्मकामार्थसहितं श्रोतव्यमनसूयता॥

हिंदी भावार्थ:

“इसलिए हम इस सम्पूर्ण रामायण को आदि से अंत तक, धर्म, अर्थ और काम सहित, ईर्ष्या रहित होकर सुनना चाहिए।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक रामायण सुनने के महत्व और उसके फल का उपदेश देता है।

टिप्पणी: यह श्लोक श्रोता को निर्देश देता है कि रामायण को ध्यानपूर्वक और बिना द्वेष के सुनना चाहिए।
श्लोक संख्या 5

कोशलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान्। निविष्टः सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान्॥

हिंदी भावार्थ:

“कोशल नाम का एक प्रसन्न, समृद्ध और महान जनपद था, जो सरयू नदी के तट पर बसा हुआ था और अत्यधिक धन-धान्य से परिपूर्ण था।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की नगरी के स्थान – कोशल जनपद – का परिचय देता है।

टिप्पणी: यहाँ कोशल जनपद की समृद्धि का वर्णन है, जिसकी राजधानी अयोध्या थी।
श्लोक संख्या 6

अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता। मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम्॥

हिंदी भावार्थ:

“वहाँ (कोशल देश में) अयोध्या नाम की एक नगरी थी, जो लोक में विश्रुत (प्रसिद्ध) थी। जिसे मनु (वैवस्वत मनु) ने स्वयं बसाया था।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या नगरी का परिचय देता है, जिसे स्वयं मनु ने बसाया था।

टिप्पणी: अयोध्या को मनु द्वारा निर्मित बताया गया है, जिससे उसकी प्राचीनता और पवित्रता सिद्ध होती है।
श्लोक संख्या 7

आयता दश च द्वे च योजनानि महापुरी। श्रीमती त्रीणि विस्तीर्णा सुविभक्तमहापथा॥

हिंदी भावार्थ:

“वह महापुरी (अयोध्या) बारह योजन लम्बी और तीन योजन चौड़ी थी, तथा सुन्दर एवं सुव्यवस्थित राजमार्गों वाली थी।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या के विशाल आकार और सुनियोजित सड़कों का वर्णन करता है।

टिप्पणी: एक योजन लगभग 8-9 मील (13-14 किमी) के बराबर होता है, अतः अयोध्या लगभग 100 किमी लम्बी और 25 किमी चौड़ी थी – यह विराट नगरी थी।
श्लोक संख्या 8

राजमार्गेण महता सुविभक्तेन शोभिता। मुक्तपुष्पावकीर्णेन जलसिक्तेन नित्यशः॥

हिंदी भावार्थ:

“वह नगरी बड़े और सुव्यवस्थित राजमार्ग से सुशोभित थी, जो सदा बिखरे हुए फूलों से पटा और जल से सींचा जाता था।”

विशेष व्याख्या:

अयोध्या के राजमार्ग की स्वच्छता एवं सौंदर्य का वर्णन।

टिप्पणी: प्राचीन काल में राजमार्गों पर फूल बिछाने और जल छिड़कने की परंपरा स्वागत एवं शुद्धि के लिए थी।
श्लोक संख्या 9

तां तु राजा दशरथो महाराष्ट्रविवर्धनः। पुरीमावासयामास दिवि देवपतिर्यथा॥

हिंदी भावार्थ:

“उस पुरी (अयोध्या) में राजा दशरथ ने निवास किया, जो महाराष्ट्र के विवर्धन (बढ़ाने वाले) थे, जैसे स्वर्ग में देवराज इंद्र निवास करते हैं।”

विशेष व्याख्या:

इस श्लोक में राजा दशरथ का अयोध्या में निवास और उनके ऐश्वर्य का वर्णन है।

टिप्पणी: दशरथ को इंद्र के समान बताकर उनके तेज और प्रताप का संकेत मिलता है।
श्लोक संख्या 10

कपाटतोरणवतीं सुविभक्तान्तरापणाम्। सर्वयन्त्रायुधवतीमुषितां सर्वशिल्पिभिः॥

हिंदी भावार्थ:

“(वह पुरी) विशाल द्वारों और तोरणों से युक्त, सुव्यवस्थित बाजारों वाली, सभी प्रकार के यंत्रों और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित, तथा सभी शिल्पियों से बसी हुई थी।”

विशेष व्याख्या:

अयोध्या के दुर्ग, बाज़ार, अस्त्र-शस्त्र और शिल्पियों का वर्णन।

टिप्पणी: अयोध्या सैन्य दृष्टि से सुरक्षित और आर्थिक दृष्टि से समृद्ध थी।
श्लोक संख्या 11

सूतमागधसम्बाधां श्रीमतीमतुलप्रभाम्। उच्चाट्टालध्वजवतीं शतघ्नीशतसंकुलाम्॥

हिंदी भावार्थ:

“स्तुति-पाठ करने वाले सूत और वंशावली का बखान करने वाले मागध वहाँ भरे हुए थे। वह पुरी सुन्दर शोभा से सम्पन्न थी। उसकी सुषमा की कहीं तुलना नहीं थी। वहाँ ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ थीं, जिनके ऊपर ध्वज फहराते थे। सैकड़ों शतघ्नियों से वह पुरी व्याप्त थी।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की सांस्कृतिक समृद्धि, वैभव और सुरक्षा व्यवस्था का वर्णन करता है। सूत और मागध राजाओं की प्रशस्ति गाते थे, जिससे नगर सदा उत्साहित रहता था। ऊँचे ध्वज और यंत्र (शतघ्नी) नगर की अभेद्यता के प्रतीक हैं।

टिप्पणी: शतघ्नी एक प्राचीन अस्त्र था – माना जाता है कि यह एक प्रकार का गोला या पत्थर फेंकने का यंत्र था, जो सौ शत्रुओं को एक साथ मार सकता था। इसकी उपस्थिति अयोध्या की उन्नत युद्धनीति को दर्शाती है।
श्लोक संख्या 12

वधूनाटकसंधैश्च संयुक्तां सर्वतः पुरीम्। उद्यानाम्रवणोपेतां महतीं सालमेखलाम्॥

हिंदी भावार्थ:

“उस पुरी में ऐसी बहुत-सी नाटक-मण्डलियाँ थीं, जिनमें केवल स्त्रियाँ ही नृत्य एवं अभिनय करती थीं। उस नगरी में चारों ओर उद्यान तथा आमों के बगीचे थे। लम्बाई और चौड़ाई की दृष्टि से वह पुरी बहुत विशाल थी तथा साखू के वन उसे सब ओर से घेरे हुए थे।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की कलाप्रियता, प्राकृतिक सौन्दर्य और विस्तार का वर्णन करता है। स्त्री-प्रधान नाटक मण्डलियाँ उच्च कला संस्कृति का संकेत हैं। उद्यान, आम्रवन और साल वृक्षों का घेरा नगर को रमणीय एवं सुरक्षित बनाते हैं।

टिप्पणी: प्राचीन भारत में “वधूनाटक” वह नाटक होता था जिसमें सभी भूमिकाएँ स्त्रियाँ ही निभाती थीं। यह मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक सशक्तिकरण का भी प्रतीक था। साल के वन हिमालय की तराई में पाए जाते हैं, जो अयोध्या की भौगोलिक स्थिति का संकेत देते हैं।
श्लोक संख्या 13

दुर्गगम्भीरपरिखां दुर्गामन्यैर्दुरासदाम्। वाजिवारणसम्पूर्णां गोभिरुष्टैः खरैस्तथा॥

हिंदी भावार्थ:

“उसके चारों ओर गहरी खाई खुदी थी, जिसमें प्रवेश करना या जिसे लाँघना अत्यन्त कठिन था। वह नगरी दूसरों के लिये सर्वथा दुर्गम एवं दुर्जय थी। घोड़े, हाथी, गाय-बैल, ऊँट तथा गदहे आदि उपयोगी पशुओं से वह पुरी भरी-पूरी थी।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था और पशु-धन की समृद्धि का वर्णन करता है। गहरी खाई शत्रुओं के लिए बाधा थी। विविध पशु परिवहन, कृषि और सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।

टिप्पणी: प्राचीन नगरों की सुरक्षा में खाई का बहुत महत्व था। यह न केवल शत्रु की गति रोकती थी, बल्कि जल की आपूर्ति का भी स्रोत होती थी। गाय, घोड़े, हाथी आदि पशु अर्थव्यवस्था और सेना के अभिन्न अंग थे।
श्लोक संख्या 14

सामन्तराजसंधैश्च बलिकर्मभिरावृताम्। नानादेशनिवासैश्च वणिग्भिरुपशोभिताम्॥

हिंदी भावार्थ:

“आय तथा अन्य कर देने वाले सामन्त नरेशों के समुदाय उसे सदा घेरे रहते थे। विभिन्न देशों के निवासी वैश्य उस पुरी की शोभा बढ़ाते थे।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की राजनीतिक सत्ता और व्यापारिक समृद्धि का वर्णन करता है। सामन्त राजा कर देते थे, जिससे नगर की अर्थव्यवस्था मजबूत थी। दूर-दराज के व्यापारी यहाँ आकर बसते थे, जिससे सांस्कृतिक और आर्थिक आदान-प्रदान बढ़ता था।

टिप्पणी: बलि शब्द का अर्थ है राजकर या उपहार। सामन्त राजा अपने अधीनस्थ क्षेत्रों से कर एकत्र कर अयोध्या के राजा को अर्पित करते थे। विभिन्न देशों के व्यापारियों का निवास बताता है कि अयोध्या एक वैश्विक व्यापार केंद्र था।
श्लोक संख्या 15

प्रासादै रत्नविकृतैः पर्वतैरिव शोभिताम्। कूटागारैश्च सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम्॥

हिंदी भावार्थ:

“वहाँ के महलों का निर्माण नाना प्रकार के रत्नों से हुआ था। वे गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतों के समान जान पड़ते थे। उनसे उस पुरी की बड़ी शोभा हो रही थी। बहुसंख्यक कूटागारों (गुप्त गृहों) से परिपूर्ण वह नगरी इन्द्र की अमरावती के समान जान पड़ती थी।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की वास्तुकला और वैभव का अद्भुत वर्णन करता है। रत्नजड़ित गगनचुम्बी प्रासाद पर्वतों की भाँति सुशोभित थे। अनेक कूटागारों से युक्त यह नगरी देवराज इन्द्र की अमरावती से तुलना की गई है।

टिप्पणी: कूटागार बहुमंजिला भवन या गुप्त कक्ष होते थे। इनका उपयोग खजाना, शस्त्रागार या विश्राम गृह के रूप में होता था। अमरावती इन्द्र की राजधानी है, जो अपनी सुन्दरता और समृद्धि के लिए प्रसिद्ध है। इस तुलना से अयोध्या की दिव्यता सिद्ध होती है।
श्लोक संख्या 16

चित्रां चित्रगतां रम्यां स्त्रीरत्नैरुपशोभिताम्। हर्म्यप्रासादसम्बाधां रत्नवेदीविभूषिताम्॥

हिंदी भावार्थ:

“उसकी शोभा विचित्र थी। उसके महलों पर सोने का पानी चढ़ाया गया था। श्रेष्ठ एवं सुन्दर नारियों के समूह उस पुरी की शोभा बढ़ाते थे। वह सब प्रकार के रत्नों से भरी-पूरी तथा सातमंजिले प्रासादों से सुशोभित थी।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या के सौन्दर्य, नारी समाज की विशिष्टता और वास्तुकला के उत्कर्ष का वर्णन करता है। स्वर्ण-निर्मित महल और रत्नमय वेदियाँ नगर की दिव्यता बढ़ाती थीं। स्त्रीरत्न का अर्थ है रत्नतुल्य स्त्रियाँ, जो संस्कृति और कला की धारक थीं।

टिप्पणी: हर्म्य का अर्थ है सात मंजिला महल या राजप्रासाद। यह अत्यंत भव्य होता था। वेदी यज्ञ वेदिका भी होती है और रत्नजड़ित आसन भी। यहाँ रत्नवेदी से तात्पर्य रत्नजड़ित चबूतरों या आसनों से है। स्त्रीरत्नैः से पता चलता है कि अयोध्या में शिक्षित, कलाविद् और सुंदर स्त्रियाँ समाज की शोभा थीं।
श्लोक संख्या 17

अनेकशतसंवाधां मनःकान्तां सुशोभिताम्। सम्पन्नफलमूलाढ्यां सुजलां सुप्रतिष्ठिताम्॥

हिंदी भावार्थ:

“पुरवासियों के घरों से उसकी आबादी इतनी घनी हो गयी थी कि कहीं थोड़ा-सा भी अवकाश नहीं दिखायी देता था। उसे समतल भूमि पर बसाया गया था। वह नगरी जड़हन धान के चावलों से भरपूर थी। वहाँ का जल इतना मीठा या स्वादिष्ट था, मानो ईख का रस हो।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की जनसंख्या घनत्व, कृषि समृद्धि, जल की गुणवत्ता और नगर नियोजन का वर्णन करता है। नगर इतना घना बसा था कि खाली स्थान नहीं था। उपजाऊ भूमि और मीठा जल निवासियों के सुखी जीवन के सूचक हैं।

टिप्पणी: सम्पन्नफलमूलाढ्याम् का अर्थ है फलों और कंद-मूल से समृद्ध, लेकिन यहाँ विशेष रूप से “फल” का अर्थ धान (चावल) भी होता है। सुप्रतिष्ठिताम् का अर्थ है नगर का अच्छी तरह से स्थापित होना, अर्थात् सुनियोजित और दृढ़ नींव पर बसा होना।
श्लोक संख्या 18

दुन्दुभीमृदङ्गानां वीणापणवसंनिनैः। नादेन सुस्वरेणैव नित्यं सम्प्रतिनादिताम्॥

हिंदी भावार्थ:

“भूमण्डल की वह सर्वोत्तम नगरी दुन्दुभि, मृदंग, वीणा, पणव आदि वाद्यों की मधुर ध्वनि से अत्यन्त गूंजती रहती थी।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की संगीतमयता और उत्सवप्रियता का वर्णन करता है। विभिन्न वाद्यों की मधुर ध्वनियाँ नगर को सदा गूंजायमान रखती थीं, जिससे वहाँ सदा उत्सव का वातावरण बना रहता था।

टिप्पणी: ये सभी वाद्य प्राचीन भारत में प्रचलित थे। दुन्दुभि एक बड़ा नगाड़ा होता था, मृदंग मिट्टी का बना दो मुख वाला वाद्य, वीणा तार वाद्य, पणव एक छोटा ढोल या डमरू जैसा वाद्य। इनके मधुर नाद से नगर सदा आनंदित रहता था।
श्लोक संख्या 19

सिद्धचारणसंघैश्च चरद्भिरुपशोभिताम्। दिवि देवगणैरिव विमानैरिव संकुलाम्॥

हिंदी भावार्थ:

“देवलोक में तपस्या से प्राप्त हुए सिद्धों के विमान की भाँति उस पुरी का भूमण्डल में सर्वोत्तम स्थान था। वहाँ के सुन्दर महल बहुत अच्छे ढंग से बनाये और बसाये गये थे। उनके भीतरी भाग बहुत ही सुन्दर थे। बहुत से श्रेष्ठ पुरुष उस पुरी में निवास करते थे।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की दिव्यता और वैभव को और अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है। सिद्ध और चारण जैसे दिव्य जीव यहाँ विचरण करते हैं, मानो यह स्वर्ग का ही एक भाग हो। महल देवताओं के विमानों के समान प्रतीत होते हैं।

टिप्पणी: सिद्ध वे होते हैं जिन्होंने योग साधना से सिद्धियाँ प्राप्त कर ली हों; चारण आकाशचारी देवताओं की एक श्रेणी हैं। उनका यहाँ विचरण बताता है कि अयोध्या पुण्यभूमि थी। विमान देवताओं के आकाश-यान होते हैं – यहाँ महलों की तुलना विमानों से की गई है।
श्लोक संख्या 20

मत्तद्विरदसम्बाधां सङ्कीर्णां हरिभिस्तथा। सदा सम्पूर्णमर्यादां मर्यादाभिरिवावृताम्॥

हिंदी भावार्थ:

“वह नगरी मदमस्त हाथियों से युक्त तथा बंदरों से भी भरी हुई थी। वह सदा सम्पूर्ण मर्यादाओं से युक्त थी, मानो मर्यादाओं ने ही उसे घेर रखा हो।”

विशेष व्याख्या:

यह श्लोक अयोध्या की प्राकृतिक समृद्धि (हाथी, बन्दर) और नैतिक मर्यादाओं का वर्णन करता है। हाथी और बन्दर वन्य जीवों की बहुलता दर्शाते हैं, जो समृद्ध पर्यावरण का सूचक है। मर्यादाओं से घिरी होना बताता है कि नगर में धर्म और आचार-विचार का सर्वोच्च स्थान था।

टिप्पणी: मर्यादा का अर्थ है सीमा, नियम, आचार संहिता। यहाँ अयोध्या को उन मर्यादाओं से घिरा बताया गया है, जो धर्म की रक्षा करती हैं। हरि शब्द का अर्थ बन्दर या सिंह भी हो सकता है, पर यहाँ प्रसंगवश बन्दर अर्थ उचित है।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
शोधकर्ता व व्याख्याता

आचार्य रामानन्द त्रिपाठी

संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।

महंत रामशरण दास
संपादकीय समीक्षा

महंत रामशरण दास

अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।

मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।।