॥ श्लोक १३ ॥
न तत्र शोको नार्तिः वा न दुर्भिक्षं न चौरभयम् ।
न च व्याधिभयं घोरं न च दस्युभयं क्वचित् ॥ १-५-१३ ॥
📖 भावार्थ : वहाँ न कोई शोक था, न पीड़ा, न अकाल, न चोरों का भय, न किसी घोर रोग का भय और न कहीं डाकुओं का भय था।
॥ श्लोक १४ ॥
सर्वे वर्णा स्वधर्मस्था विदिताः सर्वशास्त्रतः ।
प्रजाः सुखेन वर्तन्ते राज्ञो धर्मेण शासतः ॥ १-५-१४ ॥
📖 भावार्थ : सभी वर्ण अपने-अपने धर्म में स्थित थे और सभी शास्त्रों के ज्ञाता थे। राजा के धर्मपूर्वक शासन करने से सभी प्रजा सुखपूर्वक रहती थी।
॥ श्लोक १५ ॥
आश्रमाः सुविहिता देशे ग्रामाश्च नगराणि च ।
वनानि चैत्यपुष्पाणि गिरयश्च सरांसि च ॥ १-५-१५ ॥
📖 भावार्थ : उस देश में आश्रम, गाँव और नगर सुन्दर ढंग से बसे हुए थे। वन, पुष्पों से युक्त चैत्य (देवस्थान), पर्वत और सरोवर भी थे।
॥ श्लोक १६-१७ ॥
सर्वे सत्यपरा धीराः सर्वे विगतमत्सराः ।
सर्वे शीलसमोपेता वृद्धसेवापरायणाः ॥
सर्वे धर्मपरा नित्यं सर्वे वेदविदो जनाः ।
सर्वे यज्ञपरा नित्यं सर्वे दानपरायणाः ॥
📖 भावार्थ : सभी लोग सत्यपरायण, धीर, मत्सर-रहित, शीलसम्पन्न और वृद्धों की सेवा में तत्पर थे। सभी जन नित्य धर्मपरायण, वेदज्ञ, यज्ञ में तत्पर और दानपरायण थे।
॥ श्लोक १८-१९ ॥
नृपाः सत्यपरा राजन्न धर्माद्विचलन्ति ये ।
तस्मिन्नगरे देवगन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥
नित्यं संनिहितास्तत्र सिद्धाश्च परमर्षयः ।
चेरुर्ब्रह्मर्षयश्चैव राजर्षयश्च सर्वशः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ के राजा सत्यपरायण थे और धर्म से कभी विचलित नहीं होते थे। उस नगर में देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध और परमर्षि नित्य निवास करते थे। ब्रह्मर्षि और राजर्षि भी सर्वत्र विचरण करते थे।
🔍 व्याख्या : अयोध्या केवल मनुष्यों का निवास स्थान नहीं था, वरन् देवता और ऋषिगण भी यहाँ नित्य निवास करते थे। यह अयोध्या की दिव्यता को प्रदर्शित करता है।