सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
सुन्दरकाण्ड के दशम सर्ग में हनुमान् लंका में प्रवेश कर रावण के भवन में जाते हैं। वहाँ वे रावण की शय्या पर उसे मन्दोदरी सहित सोता देखते हैं और सीता को न पाकर आगे खोजने का निश्चय करते हैं।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग १०
(हनुमान् का रावण के भवन में प्रवेश – रावण का शयन-वैभव)
🔆 प्रस्तावना : समुद्र लाँघकर लंका में प्रविष्ट हनुमान् रात्रि के समय रावण के भवन में जाते हैं। वहाँ वे अद्भुत वैभव, रावण के दरबार और अन्तःपुर का निरीक्षण करते हैं। रावण को मन्दोदरी सहित सोता देख वे क्षणभर को उसे सीता समझ बैठते हैं, किन्तु तुरन्त विवेक से काम लेते हुए पुनः सीता की खोज प्रारम्भ करते हैं।
🌴 हनुमान् का लंका में प्रवेश और रावण-भवन की ओर गमन (श्लोक १-६)
ददर्श हनुमान् वीरो वितानशतसंकुलम् ॥
स सौधाग्रैर्विचित्रैश्च ज्वलन्निव विभाति च ।
नानारत्नसमुद्भासैः प्रासादैरुपशोभितम् ॥
तत्र गीतं च नृत्तं च वादित्राणां च निस्वनः ।
प्रशान्तः सर्व एवासीत् प्रसुप्ते निशि राक्षसे ॥
🏰 रावण के भवन का वैभव और सभा-भवन (श्लोक ७-१५)
ददर्श हेमपर्यङ्कं रत्नजालविभूषितम् ॥
तस्मिन् पर्यङ्कमुख्ये तु महार्हास्तरणास्तृते ।
सुष्वाप स महातेजा राक्षसेन्द्रो महाबलः ॥
तं च स्त्रियः समासाद्य सर्वतः पर्यवारयन् ।
विचित्राभरणा हृष्टा यथा शक्रं दिवौकसः ॥
प्रदीप्तमिव तद्वेश्म निशीथे समदृश्यत ॥
न त्वेव सीता तत्रासीत् सर्वलक्षणसंयुता ।
वैदेही जनकात्मजा रामपत्नी यशस्विनी ॥
💤 रावण का शयन और मन्दोदरी का दर्शन (श्लोक १६-२५)
ददर्श हनुमान् सुप्तं मन्दोदर्या समन्वितम् ॥
तां दृष्ट्वा हनुमान् वीरो मन्दोदरीमनिन्दिताम् ।
अमन्यत तदा सीतां रावणं चान्तिके स्थितम् ॥
सीतेयं रावणस्याङ्के सुप्ता भर्तुरनन्तरम् ।
नूनं कामवशं प्राप्ता रामं त्यक्त्वा नरर्षभम् ॥
नैषा सीतेति संचिन्त्य बुद्ध्या पर्यचिन्तयत् ॥
नैषा रामस्य महिषी रावणाङ्कगता शुभा ।
भवितुं युक्तरूपा हि साध्वी सीता पतिव्रता ॥
पतिं हित्वा तु रामं सा रावणं नैव मंस्यते ।
कथं हि रावणं प्राप्ता सीता रामपरायणा ॥
🔍 भ्रम निवृत्ति और सीता की खोज जारी (श्लोक २६-३३)
अन्यत्र गन्तुं मनसा चक्रे यत्नं सुदुःखितः ॥
क्व नु सीता भवेदत्र क्व वा तां द्रक्ष्यते कपिः ।
इति संचिन्त्य मनसा प्रययावन्तरं पुनः ॥
ततः प्रासादमुख्येषु सीतामन्वेषते कपिः ।
न चापश्यत तत्रापि वैदेहीं जनकात्मजाम् ॥
न किन्नरेषु नागेषु न मनुष्येषु क्वचित् ॥
सीतादर्शनमासाद्य हनुमान् विस्मयं गतः ।
ततो रामस्य महिषीं नापश्यद्धनुमान् कपिः ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे दशमः सर्गः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🕊️ हनुमान् का विवेक
मन्दोदरी को देखकर क्षणिक भ्रम के बावजूद हनुमान् तुरन्त सही निर्णय लेते हैं। यह उनके तीक्ष्ण बुद्धि और रामभक्ति का प्रमाण है। वे जानते हैं कि सीता पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए रावण के समीप नहीं रह सकतीं।
🏰 रावण का ऐश्वर्य
इस सर्ग में रावण के भवन का विस्तृत वर्णन है। यह दर्शाता है कि रावण अत्यन्त वैभवशाली और बलशाली था, फिर भी उसके पापों के कारण उसका पतन निश्चित था। हनुमान् इस वैभव से प्रभावित नहीं होते।
🌑 रात्रि का सन्नाटा
रात्रि के सम्पूर्ण सन्नाटे में हनुमान् का अकेले भवन में भ्रमण करना उनके साहस और आत्मविश्वास को दर्शाता है। वे किसी भी स्थिति में अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होते।
🔱 सीता की खोज का संकल्प
सीता को न पाकर हनुमान् निराश नहीं होते, वरन् पुनः खोज जारी रखते हैं। यह दृढ़ संकल्प और कर्तव्यनिष्ठा का आदर्श उदाहरण है।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें सीख मिलती है कि परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, हमें विवेक से काम लेना चाहिए। भ्रम की स्थिति में सत्य को पहचानने की शक्ति विकसित करनी चाहिए। हनुमान् की तरह हमें अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहना चाहिए और निरन्तर प्रयास करते रहना चाहिए।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।