सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
लंका दहन के बाद क्रोधित होकर रावण अपने पाँच पराक्रमी सेनापतियों – विरूपाक्ष, यूपाक्ष, दुर्धर, प्रघस और बाष्कल – को हनुमान को पकड़ने के लिए भेजता है। हनुमान इन सभी का वध कर देते हैं, जिससे रावण का क्रोध और भी बढ़ जाता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – सुन्दरकाण्ड – सर्ग ४६
(रावण द्वारा पाँच सेनापतियों को भेजना – हनुमान का युद्ध)
🔆 प्रस्तावना : हनुमान जी द्वारा लंका दहन के बाद रावण क्रोध से भर उठता है। वह अपने श्रेष्ठ योद्धाओं को बुलाकर उन्हें हनुमान को पकड़ने का आदेश देता है। इस सर्ग में पाँच पराक्रमी सेनापतियों के आक्रमण और हनुमान द्वारा उनके वध का रोमांचक वर्णन है।
🔥 रावण का क्रोध और सेनापतियों का आदेश (श्लोक १-१०)
विरूपाक्षं च यूपाक्षं दुर्धरं च महाबलम् ॥
प्रघसं च महावीर्यं बाष्कलं च महारथम् ।
एते पञ्च महावीर्या राक्षसाः कामरूपिणः ॥
गच्छध्वं त्वरितं वीरा हनूमन्तं महाकपिम् ।
जीवग्राहं गृहीत्वा वा हत्वा वा युधि निष्ठिताः ॥
प्रणम्य शिरसा चैनमभिजग्मुः कपिं प्रति ॥
ततः प्रववृतुः सर्वे राक्षसाः क्रोधमूर्च्छिताः ।
हनूमन्तं समासाद्य वध्यतामिति चुक्रुशुः ॥
⚔️ पाँच सेनापतियों का युद्ध (श्लोक ११-२०)
न विव्यथे कपिश्रेष्ठो मारुतिर्बलिनां वरः ॥
तानि शस्त्राण्यसंप्राप्तान्यन्तरिक्षे विनेशिरे ।
वेगेन महता युक्तो हनूमान् क्रोधसंयुतः ॥
विरूपाक्षं च यूपाक्षं दुर्धरं च महाबलम् ।
प्रघसं च महावीर्यं बाष्कलं च महारथम् ॥
जघान समरे क्रुद्धो लीलयैव महाकपिः ।
🏆 सेनापतियों का वध और हनुमान की विजय (श्लोक २१-३१)
पुनः सेनापतिं क्रुद्धो हनूमान् समवस्थितः ॥
वधं तेषां निशम्याथ रावणः क्रोधमूर्च्छितः ।
अन्यान् राक्षसवीराणां प्रेषयामास कोपितः ॥
📌 सर्गान्त : इस प्रकार छियालीसवें सर्ग में हनुमान ने रावण द्वारा भेजे गए पाँचों सेनापतियों का वध कर दिया। रावण का क्रोध बढ़ गया और उसने आगे और योद्धा भेजे।
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
⚡ हनुमान का बल
यह सर्ग हनुमान के असीम बल और शौर्य को उजागर करता है। वे अकेले ही पाँच महारथियों का संहार कर देते हैं, जो उनकी दिव्य शक्ति का प्रमाण है।
😡 रावण का क्रोध
रावण का बढ़ता क्रोध उसके अहंकार और पराजय की आशंका को दर्शाता है। यह रामायण के युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
🙏 भक्ति की विजय
हनुमान की विजय रामभक्ति की शक्ति का प्रतीक है। जो प्रभु के कार्य में लीन है, उसे कोई परास्त नहीं कर सकता।
📈 कथा का विकास
यह सर्ग आगे के घटनाक्रम की ओर ले जाता है – अब रावण स्वयं या उसके पुत्र आदि युद्ध में उतरेंगे, जिससे अन्ततः लंका दहन का प्रकरण समाप्त होगा।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हम सीखते हैं कि साहस और भक्ति के आगे बड़ी से बड़ी शक्तियाँ भी नष्ट हो जाती हैं। हनुमान ने अकेले ही रावण की सेना के प्रमुख योद्धाओं को परास्त किया, यह दर्शाता है कि धर्म की रक्षा करने वाले को ईश्वर का बल प्राप्त होता है।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।