सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
अगस्त्य ऋषि राम को सुकेश के तीन पुत्रों – माल्यवान, सुमाली और माली – की कथा सुनाते हैं। ये तीनों महान राक्षस हुए, जिन्होंने तपस्या करके ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किए और लंका पर शासन किया।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – उत्तरकाण्ड – सर्ग ५
(सुकेश के तीन पुत्रों की कथा)
🔆 प्रस्तावना : पिछले सर्ग में राक्षसों की उत्पत्ति और सुकेश तक की वंशावली बताई गई। अब अगस्त्य ऋषि राम को सुकेश के तीन पुत्रों – माल्यवान, सुमाली और माली – की कथा सुनाते हैं, जिनके वंश में रावण ने जन्म लिया।
📜 श्लोक १-५ : सुकेश के तीन पुत्र और उनकी तपस्या
माल्यवान् सुमाली च माली च राक्षसोत्तमाः॥
ते वयः प्राप्य धर्मज्ञास्तपस्तेपुः सुदारुणम्।
गन्धमादनमाश्रित्य पर्वतं रजतोपमम्॥
फलाहारास्तु वर्षाणां सहस्रमनिलाशनाः।
ततश्चान्यानि वर्षाणि निराहाराः स्थिताः परे॥
तेषां तपोभिरुग्रैस्तु सन्तुष्टो भगवान् विधिः।
ब्रह्मा लोकगुरुः साक्षात्प्रादुरासीद्विहायसा॥
उवाच च वरं वत्सा वृणुध्वं यदभीप्सितम्।
प्रीतोऽहं तपसा युष्माद्दास्यामि वरमुत्तमम्॥
📜 श्लोक ६-१० : वरदान और लंका की प्राप्ति
ऊचुः प्रीतमनसो वाक्यं ब्रह्माणं लोकभावनम्॥
वरं वृणीमहे ब्रह्मन् यदि तुष्टो भवान् प्रभो।
अवध्याः स्याम भूतानां देवानामृषिणां तथा॥
ब्रह्मा प्राह ततो वत्सा भविष्यति न संशयः।
अवध्याः सर्वभूतानां देवानामृषिणां तथा॥
विश्वकर्माणमाहूय ब्रह्मा लोकपितामहः।
उवाच रचयामास लङ्कां तेषां निवेशनम्॥
विश्वकर्मा ततो लङ्कां सुविभक्तां सुशोभनाम्।
चकार मणिरत्नाढ्यां सर्वकामफलप्रदाम्॥
📜 श्लोक ११-१५ : लंका में शासन और उनका विनाश
बलेन महता युक्ता विजित्य च दिशो दश॥
देवान् ऋषींश्च राजन्यान् बाधन्ते स्म निशाचराः।
ततस्ते देवताः सर्वे ब्रह्माणं शरणं ययुः॥
ब्रह्मा प्रोवाच देवांस्तान् मयैते रक्षिताः पुरा।
अद्यप्रभृति वै यूयं यतध्वं तद्वधाय च॥
ततो विष्णुं समाहूय देवाः प्रोचुः प्रणम्य तम्।
राक्षसान् नाशयस्वेति त्रैलोक्यहितकारक॥
विष्णुस्तथेति संगृह्य ययौ लङ्कां त्वरान्वितः।
जघान समरे वीरान् माल्यवत्प्रमुखान् बहून्॥
ते विनष्टा महावीर्या विष्णुना प्रभविष्णुना।
शेषास्तु राक्षसाः केचिद्विचेरुर्धरणीतले॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
🏯 लंका का ऐतिहासिक महत्व
इस सर्ग में लंका नगरी के निर्माण और उसके प्रथम राक्षस निवासियों का वर्णन है। लंका सोने की नगरी थी, जिसे विश्वकर्मा ने बनाया था। बाद में यह कुबेर को मिली और फिर रावण ने छीन ली।
⚔️ विष्णु का अवतार और राक्षसों का विनाश
यहाँ विष्णु ने राक्षसों का वध किया। यह संकेत है कि विष्णु हर युग में राक्षसों का नाश करते हैं। राम स्वयं विष्णु के अवतार हैं, इसलिए यह कथा राम के रावण वध की पृष्ठभूमि तैयार करती है।
🧬 रावण के पूर्वज
माल्यवान, सुमाली और माली रावण के नाना (मातामह) हैं। इनकी कथा से रावण की वंशावली पूरी होती है। सुमाली की पुत्री कैकसी ने विश्रवा से विवाह किया और रावण को जन्म दिया।
📜 ब्रह्मा के वरदान की सीमा
ब्रह्मा के वरदान से राक्षस अवध्य थे, परंतु विष्णु ने उनका वध कर दिया। यह दर्शाता है कि भगवान की शक्ति के सामने वरदान भी टिक नहीं सकते।
🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार और अत्याचार का अंत निश्चित है। चाहे कितने भी बलशाली और वरदान प्राप्त क्यों न हों, धर्म की रक्षा के लिए भगवान सदा अवतार लेते हैं।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।