सर्ग का संक्षिप्त परिचय एवं प्रसंग
प्रसंग सार संक्षेप
राम की विशाल वानर सेना लंका का घेरा डालती है। रावण अपने मंत्रियों के साथ विचार-विमर्श करता है और विभीषण सीता को लौटाने की सलाह देते हैं, पर रावण क्रोधित होकर युद्ध का निश्चय करता है।
सर्ग की विस्तृत पृष्ठभूमि
आध्यात्मिक व्याख्या एवं कथा
📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – युद्धकाण्ड – सर्ग १०
(लंका का घेरा और रावण का विचार-विमर्श)
🔆 प्रस्तावना : समुद्र पार करके राम की विशाल वानर सेना लंका के समीप आ पहुँची है। चारों ओर से नगरी घिर गई है। रावण अपने महल से वानरों की असंख्य सेना देखकर चिंतित होता है और मंत्रियों की सभा बुलाता है। यह सर्ग रावण के दरबार में हुए विचार-विमर्श और विभीषण के बुद्धिमत्तापूर्ण उपदेश का वर्णन करता है।
🏞️ लंका का घेरा (श्लोक १-१०)
लङ्कामभ्यद्रवन् सर्वे सुग्रीववचनात् तदा ॥
ददृशुस्ते पुरीं लङ्कां रावणेन सुरक्षिताम् ।
गोपुराणि च सर्वाणि परिखाश्च सभित्तिकाः ॥
तामालोक्य पुरीं रम्यां रावणस्य निवेशनम् ।
न्यवेदयन्त सुग्रीवं रामं च विगतज्वरम् ॥
अभ्ययात् सहसा सेनां व्यूह्य लङ्कां दिदृक्षया ॥
दृष्ट्वा तु वानरान् सर्वान् लङ्कां समभितः स्थितान् ।
चिन्तयामास राजेन्द्रो रावणो राक्षसेश्वरः ॥
🏛️ रावण की मंत्रणा सभा (श्लोक ११-२०)
उवाच वचनं राजा प्रहस्तं मन्त्रिणां वरम् ॥
किं भवन्तो मन्यन्तेऽद्य वानराः सागराम्बराः ।
बलेनाप्रतिमा लोके हनूमान् यस्य पूर्वजः ॥
सुग्रीवो वानरेन्द्रश्च यस्य सचिव ईदृशः ।
किं कार्यमिति मे ब्रूत समाहितमना इह ॥
किं भीताः स्मो वानरेभ्यो देवेभ्योऽपि न चिन्तयेत् ॥
अहमेको रणे हन्यां सर्वानेव सवानरान् ।
न भयं विद्यते राजन् राक्षसेन्द्र कथंचन ॥
एवं ब्रुवति प्रहस्ते विरूपाक्षोऽब्रवीद्वचः ।
उचितं राक्षसेन्द्रस्य युद्धमेव न संशयः ॥
🕉️ विभीषण का उपदेश (श्लोक २१-२८)
उवाच रावणं वाक्यं हितं परमदुर्लभम् ॥
श्रूयतां वचनं राजन् यद्ब्रवीमि हितं तव ।
रामेण सह संधानं कुरु दाशरथेन च ॥
सीता तस्य महादेवी देया तस्मै महात्मने ।
एष नः शर्मदः कालो यदि त्वं कर्तुमिच्छसि ॥
अन्यथा क्रियमाणे तु विनाशः समुपस्थितः ।
न हि रामं समर्थास्ते सुरा अपि निर्जितुम् ॥
भ्रातरं प्रत्युवाचेदं परुषं वाक्यमर्थवत् ॥
धिग् धिग् विभीषणं पापं यो मित्रध्रुग् दुराशयः ।
रिपुणा सह संधानं वाञ्छते कुलपांसनः ॥
⚔️ युद्ध का निश्चय (श्लोक २९-३२)
सज्जीकुरु बलं सर्वं चतुरङ्गं समन्ततः ॥
द्वारि द्वारि नियुज्यन्तां राक्षसाः क्रूरकर्मिणः ।
रामस्य वानरैः सार्धं युद्धार्थं त्वरितं कुरु ॥
इत्याज्ञप्य तदा राजा विवेश स्वगृहं तदा ।
राक्षसाश्च महावीर्याः समाजग्मुः समन्ततः ॥
🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व
👑 रावण का अहंकार
रावण के अहंकार ने उसे विभीषण के हितकारी वचनों को अस्वीकार करने पर विवश कर दिया। वह शांति के बजाय युद्ध को प्राथमिकता देता है, जो उसके पतन का कारण बनता है।
💡 विभीषण की नीति
विभीषण धर्म और नीति का मार्ग दिखाते हैं। वे रावण को समझाते हैं कि राम से मित्रता ही कल्याणकारी है, किंतु रावण उनकी बात नहीं मानता।
🧠 मंत्रियों की भूमिका
रावण के मंत्री प्रहस्त और विरूपाक्ष युद्ध के पक्ष में हैं, जो रावण के क्रोध और अहंकार को और बढ़ाते हैं। वे यथार्थ से परे केवल बल का घमंड दिखाते हैं।
🌊 आगामी युद्ध की पृष्ठभूमि
यह सर्ग युद्ध की अनिवार्यता को स्थापित करता है। अब दोनों सेनाएँ आमने-सामने हैं, और महासंग्राम का मार्ग प्रशस्त हो चुका है।
🎯 शिक्षा : हितकारी सलाह को सुनना और अहंकार त्यागना ही कल्याण का मार्ग है। विभीषण का उपदेश रावण को बचा सकता था, किन्तु रावण ने अपने विनाश को निमंत्रण दे दिया।
सर्ग के पावन श्लोक (मूल पाठ व अर्थ)
नीचे महर्षि वाल्मीकि रचित इस सर्ग के सभी श्लोक, उनके मूल देवनागरी छंद, सरल हिंदी अनुवाद एवं व्याख्या सहित प्रस्तुत किए गए हैं।
इस सर्ग के श्लोक वर्तमान में अद्यतन किए जा रहे हैं। कृपया कुछ समय पश्चात देखें।
आचार्य रामानन्द त्रिपाठी
संस्कृत वाङ्मय एवं वाल्मीकि रामायण के शोधार्थी। संदर्भ-आधारित एवं प्रामाणिक ग्रंथों के अध्ययन का २०+ वर्षों का अनुभव।
महंत रामशरण दास
अयोध्या वेद पीठ के वयोवृद्ध धर्माचार्य। उपलब्ध शास्त्रीय संदर्भों के आधार पर सामग्री का अंतिम प्रमाणीकरण।